स्पेशल डेस्क/लखनऊ : उत्तर प्रदेश में लगभग 5,000 परिषदीय स्कूलों के बंद होने की चर्चा हाल के महीनों में जोर पकड़ चुकी है। यह मुद्दा शिक्षा विभाग, सरकार, शिक्षक संगठनों और जनता के बीच बहस का विषय बन गया है। आइए इस स्थिति के कारणों, प्रभावों और संबंधित विवादों को विस्तार से एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा ने इस रिपोर्ट में समझाया हैं।
कम छात्रों के नामांकन !
उत्तर प्रदेश में कई सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बेहद कम है। जून 2025 तक की खबरों के अनुसार, लगभग 5,000 स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं। शिक्षा विभाग ने यू-डायस (UDISE) पोर्टल के आंकड़ों के आधार पर पाया कि कुछ स्कूलों में तो पहली कक्षा में एक भी दाखिला नहीं हुआ, जिससे इन स्कूलों को “जीरो ईयर” घोषित करने की स्थिति बन रही है।
कम नामांकन का प्रमुख कारण अभिभावकों का निजी स्कूलों, विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों, की ओर रुझान है। अभिभावकों का मानना है कि निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और सुविधाएं उपलब्ध हैं।
क्या शिक्षकों की कमी !
लगभग 500 स्कूलों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है, और ये स्कूल शिक्षामित्रों या अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। 2011 के बाद ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में शिक्षकों के तबादले या समायोजन की प्रक्रिया नहीं हुई, जिससे शिक्षकों की असमान वितरण की समस्या बढ़ी। शिक्षकों की कमी के कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई, जिसने अभिभावकों का सरकारी स्कूलों से भरोसा और कम किया।
निजी स्कूलों का बढ़ता प्रभाव
उत्तर प्रदेश में 70,000 से अधिक निजी स्कूल हैं, जिनमें से कई कथित तौर पर प्रभावशाली व्यक्तियों या राजनीतिक नेताओं के स्वामित्व में हैं। निजी स्कूलों की फीस भले ही अधिक हो, लेकिन वे अंग्रेजी माध्यम, स्मार्ट क्लास, और बेहतर बुनियादी ढांचे का दावा करते हैं, जिससे मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार भी इनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
शिक्षा विभाग ने कम नामांकन वाले स्कूलों को नजदीकी स्कूलों में मर्ज करने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना बताया गया है। हालांकि, सरकार ने 27,000 स्कूल बंद करने की खबरों का खंडन किया था, लेकिन 5,000 स्कूलों के मर्जर की चर्चा अभी भी जारी है।
बुनियादी सुविधाओं की कमी
कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, पीने का पानी, और उचित कक्षाएं उपलब्ध नहीं हैं। यह भी अभिभावकों के बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने का एक कारण है। सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम के शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाना चाहते हैं।
शैक्षणिक सत्र 2023-24 में लगभग 23 लाख छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया और न ही किसी अन्य स्कूल में दाखिला लिया। यह ड्रॉपआउट दर सरकारी स्कूलों की स्थिति को और गंभीर बनाती है। आर्थिक तंगी, शिक्षा की गुणवत्ता में कमी, और सामाजिक कारक ड्रॉपआउट के लिए जिम्मेदार हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों पर असर !
स्कूलों के मर्जर से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ेगा, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। नहर, नाले, और हाईवे जैसे भौगोलिक अवरोध इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से गरीब, दलित, और पिछड़े वर्ग के बच्चे प्रभावित होंगे, क्योंकि उनके पास निजी स्कूलों की फीस वहन करने की क्षमता नहीं है।
स्कूलों के मर्जर से शिक्षकों और शिक्षामित्रों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। शिक्षक संगठनों ने इस नीति का विरोध शुरू कर दिया है। कम शिक्षकों के साथ स्कूल चलाने की योजना से शिक्षण की गुणवत्ता पर और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन
यूपीए सरकार द्वारा लाए गए शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) के तहत हर एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल की व्यवस्था की गई थी। स्कूलों का मर्जर इस कानून के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। विपक्षी नेताओं जैसे प्रियंका गांधी और मायावती ने इसे गरीब और वंचित वर्गों के खिलाफ कदम बताया है।
स्कूल बंद करने की खबरों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। कांग्रेस और बसपा ने सरकार पर शिक्षा को निजीकरण करने और गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का आरोप लगाया। कुछ दावों के अनुसार, निजी स्कूलों के मालिकों में भाजपा से जुड़े लोग शामिल हैं, जिसे विपक्ष ने शिक्षा के व्यवसायीकरण से जोड़ा।
क्या हैं सरकार का पक्ष
बेसिक शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा ने 27,000 स्कूल बंद करने की खबरों को निराधार और भ्रामक बताया था। सरकार का दावा है कि “कायाकल्प, निपुण, और प्रेरणा जैसी योजनाओं से शिक्षा में सुधार हो रहा है। कम नामांकन वाले स्कूलों को मर्ज करने का लक्ष्य संसाधनों का बेहतर उपयोग और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना है। मर्जर के दौरान यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बच्चों को नजदीकी स्कूलों में समायोजित किया जाए।
सरकार का कहना है कि “वह ड्रॉपआउट दर कम करने और बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए लगातार काम कर रही है।”
विरोध और प्रतिक्रियाएं
शिक्षक संगठनों ने मर्जर नीति को “स्कूल बंद करने का छिपा प्रयास” करार दिया और इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना है कि यह नीति शिक्षकों की नौकरियों और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा को खतरे में डालेगी। प्रियंका गांधी ने इसे शिक्षा के अधिकार के खिलाफ बताया, जबकि मायावती ने स्कूलों में सुधार की मांग की। स्कूलों के मर्जर से बच्चों की पहुंच और सुरक्षा पर असर पड़ सकता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण की कमी को तुरंत दूर करना मुश्किल है। निजी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता सरकारी स्कूलों के लिए दीर्घकालिक चुनौती है।
स्कूलों को बंद करने के बजाय उनकी स्थिति सुधारने पर ध्यान देना चाहिए, जैसे बुनियादी सुविधाएं, अंग्रेजी माध्यम, और स्मार्ट क्लास शुरू करना। शिक्षकों की भर्ती और नियमित प्रशिक्षण पर जोर देना चाहिए।ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन सुविधाएं बढ़ाकर मर्जर के प्रभाव को कम किया जा सकता है। शिक्षा का अधिकार कानून के अनुरूप हर बच्चे की स्कूल तक पहुंच सुनिश्चित होनी चाहिए।
निजी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता
उत्तर प्रदेश में 5,000 स्कूलों के बंद होने की कगार पर होने की खबरें कम नामांकन, शिक्षकों की कमी, और निजी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता जैसे कारकों का परिणाम हैं। सरकार इसे मर्जर नीति के तहत संसाधनों के बेहतर उपयोग का कदम बता रही है, लेकिन शिक्षक संगठन और विपक्ष इसे शिक्षा के निजीकरण और गरीब बच्चों के अधिकारों पर हमला मानते हैं। इस स्थिति का समाधान स्कूलों की स्थिति सुधारने, शिक्षकों की भर्ती, और ग्रामीण बच्चों की पहुंच सुनिश्चित करने में निहित है।







