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Home राष्ट्रीय

ओडीएफ से आगे-संपूर्ण स्वच्छ भारत की ओर

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 5, 2022
in राष्ट्रीय, विशेष
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ODF Swachh Bharat

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गजेंद्र सिंह शेखावत
केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार


प्रधानमंत्री मोदी के 2 अक्टूबर, 2014 को लाल किले की प्राचीर से खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) भारत निर्माण के स्पष्ट आह्वान के बाद, स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रह गया, बल्कि यह एक जन आंदोलन बन गया। परिणाम दुनिया के सामने है। 2 अक्टूबर, 2019 तक 110 मिलियन शौचालयों का निर्माण हुआ और हमारी 550 मिलियन ग्रामीण आबादी को घरेलू स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच प्राप्त हुई, जिससे भारत ओडीएफ स्थिति और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभावों को हासिल करने में सक्षम हुआ। माननीय प्रधानमंत्री को उल्लेखनीय रूप से बेहतर स्वास्थ्य परिणामों और उसके बाद के आर्थिक लाभ के लिए बिल एंड मेलिंडा गेट फाउंडेशन के ग्लोबल गोल कीपर्स अवार्ड 2019 से सम्मानित किया गया।

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एक स्वस्थ राष्ट्र, एक सशक्त राष्ट्र होता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मजबूत और दूरदर्शी नेतृत्व में, एसबीएम ने भारत को दुनिया की पांचवीं अग्रणी अर्थव्यवस्था बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यूनिसेफ के एक स्वतंत्र अध्ययन में कहा गया है कि ओडीएफ गांवों में रहने वाले औसत परिवार ने प्रति वर्ष 50,000 रुपये का संचयी लाभ अर्जित किया, और नए शौचालय वाले घरों के संपत्ति-मूल्य में एक बार के लिए 19,000 रुपये की वृद्धि देखी गई। औसतन, नए घरेलू शौचालयों की कुल लाभ लागत से 4.7 गुना अधिक पाई गई।
महात्मा गांधी की जयंती- 2 अक्टूबर को स्वच्छ भारत दिवस 2022 मनाने के क्रम में, एसबीएम अपने दूसरे चरण में दो साल से अधिक पूरे कर चुका है और ओडीएफ की उपलब्धि हासिल करने के बाद अब ओडीएफ प्लस के लिए प्रयासरत है। आइए हम इसे आसान शब्दों में समझते हैं- एसबीएम-जी के चरण ढ्ढढ्ढ, ओडीएफ प्लस के मुख्य उद्देश्यों में शामिल हैं- शौचालयों के निर्माण और उपयोग से आगे बढक़र समग्र सार्वभौमिक स्वच्छता की दिशा में शौचालयों का निरंतर उपयोग; हमारे घरों व समुदायों से उत्पन्न जैविक रूप से अपघटित होने वाले और गैर-अपघटित रहने वाले कचरे सहित ठोस एवं तरल अपशिष्ट का पर्यावरण-अनुकूल और आर्थिक रूप से व्यवहार्य प्रबंधन और परिणामत: स्वच्छ परिवेश का निर्माण आदि। यह संपूर्ण स्वच्छता के गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप है और ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन (एसएलडब्ल्यूएम) के लिए समर्पित और विशिष्ट तकनीकी उपायों के माध्यम से स्वच्छता मिशन के चरण ढ्ढढ्ढ के हिस्से के रूप में आजीविका के अवसरों के सृजन से जुड़े हमारे उद्देश्य का भी समर्थन करता है।

देश भर के हजारों गांवों में, ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन अब घरेलू स्तर पर कचरे को गीले एवं सूखे कचरे में अलग-अलग करके और घर– घर जाकर इसके संग्रहण के जरिए से किया जा रहा है। पंचायतों और महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को कंपोस्टिंग और जहां संभव हो वहां बायोगैस के उत्पादन के जरिए गीले कचरे के प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है, जो बाद में आय सृजन का साधन बन जाता है। घरों और विभिन्न संस्थानों से निकले प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन गांवों में फॉरवर्ड लिंकेज की व्यवस्था के साथ संग्रहण एवं अलगाव केंद्रों के जरिए किया जा रहा है। प्लास्टिक कचरे को टुकड़े– टुकड़े में बांट करके उसे उपयुक्त रूपों में परिवर्तित कर दिया जाता है, जिससे इसका सडक़ निर्माण और सीमेंट कारखाने जैसी गतिविधियों में आगे इस्तेमाल संभव हो पाता है। इस क्रम में आजीविका का सृजन होता है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के वंदसे की ग्राम पंचायत में खाद एवं एकत्रित किए गए सूखे कचरे की बिक्री से प्रति माह लगभग 88,000 रुपये मिलते हैं। इसी तरह, 100 केएलडी की क्षमता वाली जल शोधन प्रणाली की सहायता से हरियाणा के कुरक जागीर की ग्राम पंचायत में मछली पालन में इस्तेमाल किए जाने वाले शोधित अपशिष्ट जल के जरिए मछली पालन से सालाना लगभग एक लाख रुपये जुटाए गए हैं। ग्रामीण भारत से रोजाना सामने आने वाली ऐसी कई कहानियों के ये दो प्रतिनिधि उदाहरण भर हैं।

ऐसे ही कई विकल्पों में से एक गोवर्धन योजना भी है। हमारे गांवों को रसोई से निकलने वाले बचे हुए खाद्य पदार्थों, फसलों के अवशेष और बाजार के कचरे सहित पशु एवं अन्य जैव-अपशिष्टों के प्रबंधन की चुनौती का सामना करना पड़ता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने ‘कचरे से कंचन’ बनाने का विचार दिया। इस प्रकार, गोवर्धन योजना के तहत 125 जिलों में लगे 333 गोवर्धन संयंत्र न सिर्फ खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन प्रदान कर रहे हैं और/या कई घरों में रोशनी बिखेर रहे हैं, बल्कि कई लोगों के लिए नौकरी और आय का स्रोत भी सृजित कर रहे हैं। यह वास्तव में एक ‘अपशिष्ट से धन’ की प्रणाली है जो जैव-अपघटित कचरे को संग्रहित करने और कचरे को संसाधनों में बदलने, जीएचजी उत्सर्जन को कम करने व कच्चे तेल के आयात पर हमारी निर्भरता को कम करने, उद्यमशीलता को सुदृढ़ करने और जैविक खेती को बढ़ावा देने में मदद करती है।

घरेलू अपशिष्ट जल (शौचालय से निकलने वाले पानी को छोडक़र), जिन्हें तकनीकी रूप से ‘गंदला पानी’ (ग्रे वाटर) कहा जाता है, के प्रबंधन के लिए सुजलम 1.0 और सुजलम 2.0 अभियान की शुरुआत यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी कि तालाब, झील और नदी जैसे मूल्यवान ग्रामीण प्राकृतिक जल संसाधनों को इस किस्म का अपशिष्ट जल दूषित नहीं करे। मलयुक्त गाद के प्रबंधन के लिए, हम राज्यों को सभी एकल-पिट वाले शौचालयों को दोहरे- पिट वाले शौचालयों में बदलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिनमें शोधन की सुविधा अंतर्निहित होती है। सेप्टिक टैंक जैसे अन्य प्रकार के शौचालयों के लिए, मलयुक्त गाद के शोधन संयंत्रों में सेप्टेज और मल अपशिष्ट के संग्रह, परिवहन व शोधन सहित मलयुक्त गाद की प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।
उपर्युक्त सभी कदमों के अलावा लोगों को सुरक्षित स्वच्छता प्रणालियों और तौर-तरीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु उनके व्यवहार में बदलाव लाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जा रहे हैं।

इसके लिए ‘स्वच्छता ही सेवा (एसएचएस)’ अभियान चलाया जा रहा है जिसमें एसबीएम के तहत वार्षिक स्वच्छता पखवाड़ा मनाया जाना, बेहद पुराने कचरे या अपशिष्ट एवं कचरे की भरमार वाले स्थलों की सफाई पर ध्यान केंद्रित करना, कचरे के निकलने वाले स्थल पर ही उसका पृथक्करण सुनिश्चित करना, कचरा संग्रह एवं पृथक्करण शेड का निर्माण करना, कचरा संग्रह वाहनों को खरीदना, घर-घर जाकर गैर-जैवकीय कचरे का संग्रह करना, जल स्रोतों को साफ रखना, वृक्षारोपण, एकल उपयोग वाली प्लास्टिक (एसयूपी) पर लगाए गए प्रतिबंध को लागू करवाना, इत्यादि शामिल हैं। इस वर्ष 2 करोड़ से भी अधिक लोगों ने श्रमदान के जरिए एसएचएस 2022 में भाग लिया, और 4,60,000 से अधिक पुराने कचरे के ढेरों की पहचान की गई एवं उन्हें साफ किया गया।

पिछले ढाई वर्षों में हमारे समस्त प्रयासों से क्या-क्या हासिल हुआ है मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि 1.14 लाख से भी अधिक गांवों ने स्वयं को ‘ओडीएफ प्लस’ घोषित कर दिया है और लगभग 3 लाख गांवों ने ‘ओडीएफ प्लस’ बनने की अपनी यात्रा शुरू करते हुए ठोस व तरल कचरा निपटान कार्य बाकायदा शुरू कर दिए हैं।

इसके तहत मुख्य लक्ष्य छह लाख ‘ओडीएफ प्लस’ गांवों को बनाना और इसके साथ ही ऐसा करते हुए ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों को रोजगार मुहैया कराना एवं उनका आय स्तर बढ़ाना है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में  देश के जिम्मेदार और गौरवान्वित नागरिकों के रूप में  आइए हम सभी ‘स्वच्छता से स्वाबलंबन’ के अपने प्रयासों के तहत एकजुट हो जाएं और समस्त वैश्विक समुदाय के लिए संपूर्ण स्वच्छता और साफ-सफाई की एक अनुकरणीय मिसाल बन जाएं!

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