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Home राज्य

शिवपाल की ‘ढाई चाल’ में कितने कमाल…कितने बवाल?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 30, 2022
in राज्य, विशेष
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Shivpal's
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फीफा वर्ल्ड कप 2022 में सऊदी अरब ने अर्जेंटीना को हराया. अगले ही दिन जापान ने जर्मनी को हरा दिया. अर्जेंटीना और जर्मनी दोनों विश्व चैम्पियन रह चुके हैं. हालांकि, फाइनल अभी बाक़ी है. नतीजा कुछ भी हो, लेकिन ये दोनों घटनाएं खेल के मैदान में बड़े उलट-फेर के रूप में दर्ज हो गईं. ठीक वैसे ही जैसे मैनपुरी उपचुनाव से ठीक पहले शिवपाल यादव ने अखिलेश का दामन थाम लिया है. उनकी उस इस सियासी चाल का अंतिम नतीजा मैनपुरी के चुनाव नतीजों के बाद ही सामने आएगा, लेकिन ट्रेलर अभी से दिखने लगा है.

मैनपुरी उपचुनाव के नतीजे कैसे होंगे, इससे ज़्यादा चर्चा इस बात पर हो रही है कि चाचा शिवपाल का चुनाव बाद क्या होगा? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि, शिवपाल ने अपने राजनीतिक करियर की रेस में समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद अखिलेश से हाथ मिलाने पर दूसरी बार फैसला लिया है. 2022 के चुनाव से पहले वो अपना जनरथ लेकर वोट यात्रा पर निकले थे, लेकिन उनका अंतिम पड़ाव गठबंधन पर आकर ख़त्म हुआ. फिर चुनाव जीतने के बाद अखिलेश यादव से लगातार उनकी दूरियां बढ़ती रहीं. अब मैनपुरी उपचुनाव से पहले एक बार फिर उन्होंने अपनी पार्टी (प्रसपा) से ज़्यादा ‘परिवार’ को अहमियत दी है. इसमें अखिलेश का कोई नुक़सान नहीं है, लेकिन सवाल ये है कि शिवपाल यादव का क्या फ़ायदा है?

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दरअसल, दूसरी बार अखिलेश के साथ गठबंधन करने के बाद शिवपाल के लिए राजनीतिक रास्ते सीमित हो गए हैं. एक वजह ये भी हो सकती है कि वो प्रसपा का बेहतर भविष्य ना देख पा रहे हों. इसके अलावा बड़े भाई मुलायम सिंह यादव के गढ़ में अगर सपा उनकी वजह से हार गई है, तो जिस यादव बिरादरी की वो सियासत करते हैं, वो भी उनसे दूर हो सकते हैं. ऐसे में ‘परिवार’ या पार्टी (सपा) में उनके लिए किसी तरह की कोई जगह नहीं बचती. शायद इसीलिए, उन्होंने एक ही झटके में मैनपुरी उपचुनाव में अखिलेश के साथ गठबंधन करते हुए डिंपल यादव को जिताने का संकल्प ले लिया.

अखिलेश से दूर जाते-जाते BJP से कैसे दूर हो गए शिवपाल?
यूपी विधानसभा चुनाव 2022 से क़रीब ढाई महीने पहले दिसंबर 2021 में अखिलेश यादव और शिवपाल यादव की एक तस्वीर आई थी. दोनों गठबंधन कर चुके थे. तब तक उतनी देर नहीं हुई थी. क्योंकि, शिवपाल पूरे प्रदेश में जनरथ पर सवार होकर प्रसपा और अपने पक्ष में माहौल को खंगाल रहे थे. उधर, अखिलेश यादव ये आकलन कर रहे थे कि चाचा की अलग सियासी मुहिम चलने से सपा को कितना नुक़सान होगा. बहरहाल, दोनों ने बंद कमरे में समझौता किया और पूरे प्रदेश में अपने दम पर बहुमत हासिल करने का दावा करने वाले शिवपाल सिर्फ़ एक विधानसभा सीट (जसवंत नगर) पर मान गए. अपनी परंपरागत सीट पर वो बड़े मार्जिन से एक बार फिर चुनाव जीते. लेकिन, उसके बाद से लगातार अखिलेश यादव से उनकी दूरियां बढ़ने लगीं. क्योंकि, अखिलेश जानते थे कि सरकार होती तो चाचा को कहीं एडजस्ट कर देते, लेकिन अब विपक्ष की सियासत में चाचा अगर ज़्यादा क़रीब रहे तो संगठन में फिर से खेमेबंदी हो सकती है.

राजनीति के चौसर में बयानों के हथियार चलने लगे. कभी शिवपाल नाराज़गी ज़ाहिर करते, तो कभी अखिलेश पलटवार करते. नौबत यहां तक आ पहुंची कि अखिलेश को कहना पड़ा- अगर इतनी परेशानी है तो शिवपाल सपा छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? जवाब में शिवपाल ने कहा- मुझसे इतनी परेशानी है तो पार्टी से निकाल क्यों नहीं देते? लेकिन, राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थाई नहीं होती. इसी का सबूत देते हुए जो चाचा-भतीजे एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, वो दोनों मैनपुरी उपचुनाव से पहले ऐसे एक हुए, जैसे उनके बीच कभी कुछ हुआ ही ना हो.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिवपाल यादव के अखिलेश के साथ बनते-बिगड़ते और फिर बनते रिश्तों पर उन्हें जब पेंडुलम कह दिया, तो जवाब अखिलेश ने दिया. यानी अखिलेश जानते हैं कि मैनपुरी उपचुनाव में गढ़ बचाने के लिए शिवपाल यादव का साथ बने रहना बेहद ज़रूरी है. इसीलिए, प्रत्याशी फाइनल होने से लेकर डिंपल के नामांकन तक सबकुछ अखिलेश ने रामगोपाल यादव समेत अपने क़रीबी लोगों के साथ तय किया, जबकि चाचा शिवपाल को बाद में बुलाया. फिर भी शिवपाल यादव ने बिना किसी लाग-लपेट के सपा का साथ देने की शपथ ले ली. ऐसा इसलिए, क्योंकि शिवपाल जानते हैं कि उनका और सपा का वोटबैंक एक ही है. इसमें भी जब बात मुलायम या उनके कुनबे की आएगी तो यादव वोटबैंक और समर्थकों के बीच असमंजस की स्थिति होगी, फिर भी अंतिम फायदा सपा को ही होगा. क्योंकि, यादव और OBC वोटबैंक की सियासत की बुनियाद मुलायम और सपा के नाम से ही जानी जाती है.

विस्तार का दावा करते-करते सिमट क्यों जाते हैं शिवपाल?
शिवपाल यादव ने मैनपुरी उपचुनाव में जिस तरह BJP से दामन छुड़ाया है, उसमें तात्कालिक तौर पर उन्होंने अपना फ़ायदा देखा है. वो जानते हैं कि मुलायम परिवार से अलग होकर ना तो संगठन और ना ही चुनावी सियासत में कामयाब हो सकते हैं, इसीलिए बार-बार सपा से अलग अपने रसूख को विस्तार देने का दावा करते हैं. इसके कुछ समय बाद सिमटकर सपा और अखिलेश के इर्द-गिर्द नज़र आने लगते हैं. दरअसल, शिवपाल यादव ने हमेशा मुलायम सिंह यादव का हमसाया बनकर सियासत की है. थिंक टैंक मुलायम होते थे और मिशन को अंजाम देने का काम शिवपाल करते थे. शिवपाल ने कभी मांगा नहीं और ना ही मुलायम ने कभी ये समझा कि शिवपाल उनके उत्तराधिकारी हो सकते हैं. इसीलिए, 2016 में जब पार्टी में उत्तराधिकारी के लिए भिड़ंत होने लगी, तो मुलायम देखते रहे शिवपाल की तरफ़ लेकिन वो थे अखिलेश की तरफ़.

शिवपाल को ये एहसास हुआ कि वो सपा का चेहरा और ब्रेन नहीं सिर्फ़ हाथ-पैर थे. इसलिए पार्टी से अलग होकर उन्हें ना तो वो स्वीकार्यता मिली और ना ही वैसा विस्तार, जिसका वो दावा कर रहे थे. इसीलिए अगस्त 2018 में पार्टी का गठन करने के बाद से अब तक प्रसपा की पहचान स्थापित नहीं हो सकी है. पार्टी में वन मैन लीडरशिप है, जो शिवपाल के आस-पास केंद्रित है और सियासी विस्तार के नाम पर शिवपाल ख़ुद जसवंत नगर तक सीमित होकर रह गए हैं. विश्लेषक ये भी मानते हैं कि अगर मैनपुरी लोकसभा में जसवंत नगर विधानसभा सीट शामिल नहीं होती, तो अखिलेश किसी भी सूरत में शिवपाल को वापस नहीं बुलाते. बहरहाल, विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से अखिलेश अपने फायदे नुक़सान की गहराई समझ चुके हैं, लेकिन शिवपाल अब तक ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो पूरी तरह सरेंडर करके सपा में पूर्ण रूप से शामिल हो जाएं या फिर भतीजे के साथ कभी दूर कभी पास वाला खेल जारी रखें. इसीलिए, वो अपनी राजनीतिक हस्ती का एहसास करने के लिए अपने दम पर विस्तार का दावा करते हैं, लेकिन जब बात कुनबे की आती है, तो वो सिमटकर परिवार की ओर चले जाते हैं.

चुनाव बाद शिवपाल ‘चेहरा’ बनेंगे या ‘मोहरा हो जाएंगे?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानसभा में अपने भाषण में शिवपाल सिंह यादव का नाम लेकर कई बार अखिलेश पर हमला बोल चुके हैं. अक्सर शिवपाल को चाचा कहकर संबोधित कर चुके हैं. अखिलेश को शिवपाल से राजनीति सीखने की सलाह भी दे चुके हैं. शिवपाल को शास्त्री मार्ग पर बड़ा बंगला दिलाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. उन्हें Z श्रेणी की सुरक्षा दिलाने की पटकथा लिख चुके हैं. लेकिन, अब शिवपाल ने जब शतरंज में घोड़े की तरह अपनी ढाई चाल दिखाई है. यानी दो कदम BJP की ओर और फिर एक कदम तिरछी चाल चलते हुए अचानक अखिलेश की ओर चले गए हैं. उनकी इस चाल के बाद मुख्यमंत्री योगी ने अपने हमलों के लिए सबसे बड़ा टारगेट उन्हें ही बनाया है. पेंडुलम, फुटबॉल और ना जाने क्या क्या कहा है. इसके अलावा गोमती रिवर फ्रंट मामले में उनके खिलाफ CBI जांच की संस्तुति भी कर दी है. उनकी सुरक्षा Z से Y श्रेणी की कर दी है.

ज़ाहिर है, CM योगी की ओर दोस्ती का जो हाथ शिवपाल ने बढ़ाया था, उसे वापस खींचने की क़ीमत BJP ज़रूर वसूल करेगी. इसलिए, मैनपुरी उपचुनाव के अंजाम से ज़्यादा दिलचस्प ये होगा कि नतीजों के बाद शिवपाल का अंजाम क्या होगा? अखिलेश उन्हें पुराने घर (सपा) में नई भूमिका सौंपेंगे या एक बार फिर शिवपाल को बेआबरू होकर घर लौटना पड़ेगा. हालांकि, इस बार शिवपाल मायूस लौटे तो उनके पास चलने के लिए कोई चाल नहीं होगी, वो सिर्फ़ मोहरे की भूमिका में आ जाएंगे.

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