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Home राष्ट्रीय

अकेले कांग्रेस ने नहीं लड़ी आजादी की लड़ाई

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 23, 2022
in राष्ट्रीय, विशेष
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अवधेश कुमार


कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी बयान पर बीजेपी का तीखा विरोध स्वाभाविक है। खरगे ने कहा कि आजादी दिलाने में कांग्रेस के नेताओं ने कुर्बानी दी, लेकिन उनका (बीजेपी नेताओं का) तो ‘कुत्ता’ भी नहीं मरा। खरगे ने कुत्ता शब्द का इस्तेमाल कर दिया, नहीं तो कांग्रेस सहित कई पार्टियों के नेता कहते रहे हैं कि बीजेपी का स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। कुछ यह भी कह देते हैं कि संघ अंग्रेजों के पक्ष में था।

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स्वतंत्रता संघर्ष का मंच

– 15 अगस्त, 1947 से पूर्व कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष का एक व्यापक मंच थी। स्वतंत्रता संघर्ष करने वाले दूसरी विचारधाराओं के लोग भी कांग्रेस के मंच से काम करते थे।

– कांग्रेस के नेता हिंदू महासभा की आलोचना करते हैं, लेकिन तब कोई व्यक्ति एक साथ हिंदू महासभा और कांग्रेस दोनों का सदस्य हो सकता था। यहां तक कि अध्यक्ष भी। पंडित मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे और कांग्रेस के भी।

– वर्तमान कांग्रेस तब के कांग्रेस के उन नेताओं का नाम नहीं लेती, जिनकी विचारधारा को हिंदुत्ववादी या सांप्रदायिक मानती है। बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय, दोनों उन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रतिनिधि थे जो हिंदुत्व और धर्म-अध्यात्म के आधार पर भारत का विचार करते थे। क्या इनका आजादी के आंदोलन में योगदान नहीं था?

– डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता भी कांग्रेस के साथ ही स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय थे। क्या कांग्रेस ऐसे नेताओं की भूमिका स्वीकार करती है?

गुमनाम सेनानी

वास्तव में छोटे-बड़े कई संगठन और संगठनों से परे लाखों की संख्या में ऐसी विभूतियां थीं, जिन्होंने अपने-अपने स्तर पर आजादी की लड़ाई में योगदान किया, बलिदान दिया। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर उन गुमनाम स्वतंत्र सेनानियों का योगदान सामने लाया जा रहा है। जितने सेनानियों के विवरण आ रहे हैं, वे बताते हैं कि कोई एक संगठन या कुछ नेता स्वतंत्रता का श्रेय नहीं ले सकते। अब स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में कुछ दूसरे पक्ष।

– भारत का स्वतंत्रता संघर्ष कांग्रेस की स्थापना के पहले लंबे कालखंड से चलता रहा।

– अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष भी 1756-57 में प्लासी युद्ध के साथ आरंभ हो गया था। जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन का विस्तार होता गया, उसके विरुद्ध विद्रोह और संघर्ष भी बढ़ता गया।

– कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और उसके अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर आवाज बनने की शुरुआत बीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध से हुई, जब 1905 में बंग-भंग आंदोलन हुआ।

– 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का सच क्या था? कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। फिर आंदोलन पूरे भारत में कैसे फैला? जगह-जगह लोगों ने स्वतः प्रेरणा से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाया और आंदोलन अहिंसक भी नहीं रहा। कहने का यह अर्थ नहीं कि 1942 का आंदोलन कांग्रेस का नहीं था। कांग्रेस के स्थानीय सदस्य उसमें शामिल थे, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी आंदोलन कर रहे थे जो कांग्रेस के सदस्य नहीं थे।

आरएसएस की भूमिका

जहां तक का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रश्न है तो उसने संगठन के रूप में आंदोलन में भाग नहीं लिया, लेकिन स्वयंसेवक स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्षरत रहे और उनमें से कइयों ने बलिदान भी दिया।

– संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार अपने कोलकाता अध्ययन के दौरान तब के सबसे बड़े क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सदस्य थे।

– वहां से आने के बाद उन्होंने खिलाफत आंदोलन से असहमति रखते हुए भी असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए।

– 1929 में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने के बाद डॉ. हेडगेवार ने सभी शाखाओं पर तिरंगा झंडा फहराने का संदेश दिया और तिरंगा फहराया गया।

– नमक सत्याग्रह के लिए डॉ. हेडगेवार ने सरसंघचालक पद से कुछ समय के लिए स्वयं को अलग किया और डॉ. परांजपे को जिम्मेदारी सौंपकर स्वयंसेवकों के साथ निकल पड़े।

कांग्रेस ने की सम्मान सभा

सच यह है कि तब कांग्रेस डॉ. हेडगेवार का समर्थन करती थी। कुछ उदाहरण देखिए।

– असहयोग आंदोलन में जेल से आने के बाद कांग्रेस ने डॉ. हेडगेवार के सम्मान में सभा आयोजित की। इसको मोतीलाल नेहरू सहित कई कांग्रेसी नेताओं ने संबोधित किया।

– 1930 में जंगल सत्याग्रह के दौरान जब डॉ. हेडगेवार को उनके 10 साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया और 9 माह की सजा सुनाई गई तो वहां कांग्रेस के नेताओं ने उनके समर्थन में रैली का आयोजन किया।

– सेंट्रल प्रॉविंस और बरार पुलिस की रिपोर्ट को देखें तो उसमें लिखा है कि डॉ. हेडगेवार की भागीदारी के कारण अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन को गति मिली।

– राजनीतिक आंदोलनों में संघ के बढ़-चढ़कर भाग लेने का परिणाम यह हुआ कि सेंट्रल प्रॉविंस की सरकार ने 15/16 दिसंबर 1932 को एक सर्कुलर के जरिए सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों से दूर रहने और इसका सदस्य बनने आदि को लेकर चेतावनी दी। सेंट्रल प्रॉविंस की प्रांतीय विधानसभा में कांग्रेस के लोगों ने ही इसे चुनौती दी। विधानसभा में संघ की प्रशंसा हुई और सर्कुलर वापस हुआ।

– द्वितीय विश्व युद्ध में जब संघ ने ब्रिटिश सरकार को समर्थन देने से इनकार किया तो 2 जून, 1940 को गृह विभाग ने सेंट्रल प्रॉविंस सरकार से संघ पर प्रतिबंध लगाने को कहा। तत्कालीन मुख्य सचिव जी एम त्रिवेदी ने कहा कि यह संभव नहीं है तो प्रशिक्षण शिविरों और वर्दी पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश लाया गया। इसके विरोध में स्वयंसेवकों ने भारी संख्या में गिरफ्तारियां दीं।

1942 के आंदोलन के दौरान सेंट्रल प्रॉविंस के चिमूर और आष्टी तहसील में पुलिस कार्रवाई में कई स्वयंसेवकों की मौत हुई, अनेक जेल में डाले गए। साफ है कि कांग्रेस के साथ कई दल, इतिहास के विद्वान और एक्टिविस्ट झूठ फैलाते रहे हैं। यह केवल संघ ही नहीं, दूसरे संगठनों और संगठन से परे काम करने वाले उन लाखों देशभक्तों के साथ भी अन्याय है, जिन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति के लिए संघर्ष किया।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विचारक हैं)

 

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