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Home दिल्ली

एक साथ क्यों टूट रहे हैं इतने सारे जलवायु रिकॉर्ड?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 9, 2023
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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जलवायु रिकॉर्ड
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नई दिल्ली : पिछले कुछ हफ्तों से दुनिया भर में जलवायु के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं. 4 जुलाई दुनिया में अब तक सबसे गर्म दिन था जब उसने ए कदिन पहले ही बने वैश्विक सबसे गर्म औसत दिन का रिकॉर्ड तोड़ा. औसत समुद्री सतह तापमान भी अब तक के रिकॉर्ड किए गए तापमानों में सबसे ज्यादा था. इसी के साथ अंटार्कटिका सागर में बर्फ की मात्रा में सबने निचले स्तर का रिकॉर्ड बनाया. 4 जुलाई को ही विश्व मौसम विभाग ने ऐलान किया कि अल नीनो की शुरुआत हो चुकी है यानि अब वैश्विक तापमान के साथ मौसम और जलवायु के भी नए रिकॉर्ड बनेंगे. लेकिन आखिर जलवायु के इतने सारे नए रिकॉर्ड अचानक क्यों बन क्यों रहे हैं, यह समझना भी जरूरी है.

सार में जलवायु के ये तेवर देखने को कई वजह से मिल रहे हैं. कन्वरशेसन्स में प्रकाशित लेख में मोनाश यूनिवर्सिटी की किम्बरली रीड ने इन रिकॉर्ड तोड़ घटनाओं के होने के पीछे के कारणों की विवेचना करते हुए बताया है कि ग्लोबल वर्मिंग के रहते अल नीनो के हालात ने तापमान बढ़ाने में योगदान दिया है. इसके अलावा वायुमंडल से एरोसॉल्स की कमी की भी एक भूमिका रही है. ये महीन कण सूर्य से आने वाले विकिरण को बिखेरने का काम करते हैं. इन्हीं दोनों की दुनिया में तापमान बढ़ाने के पीछे बड़ी भूमिका रही है.

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अल नीनो का ऐलान तब होता है जब समुद्री सतह का तापमान कटिबंधीय प्रशांत महासागर में ज्यादा गर्म हो जाता है. महासागर की सतह पर औसत से ज्यादा का तापमान जमीन के तापमान को भी औसत से बढ़ाने का काम करता है. इससे पहले 2016 में शक्तिशाली अल नीनो का प्रभाव आया था. लेकिन तब से अब तक हमें 240 अरब टन की कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में फेंक चुके हैं. वहीं अलनीनो अतिरिक्त ऊष्मा पैदा नहीं करता है केवल मौजूदा ऊष्मा को महासागरों से वायुमंडल में पुनर्वितरित करता है.

महासागर पृथ्वी का 70 फीसद हिस्सा घेरते हैं और भारी मात्रा में ऊष्मा को सहेज कर रखते हैं. इसीलिए ग्लोबल वार्मिंग की 90 फीसद से ज्यादा ऊष्मा महासगर अवशोषित किए रहते हैं. इस ऊष्मा को महासागर धाराओं के जरिए पृथ्वी की सतह और महासागरों की गहराई तक पहुंचाते हैं. अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ने वाली व्यापारिक पवनें कमजोर हो जाती हैं और इससे दक्षिण अमेरिका के प्रशांत तटों में ठंड़ा पानी ऊपर नहीं आ पाता है. जिससे महासागर की ऊपरी परतें गर्म हो जाती हैं.

जून 2023 में पूरे प्रशांत महासागर में भूमथ्य रेखा के पर महासागर की ऊपरी 400 मीटर की परत में ज्यादा तापमान पाया गया और इस गरम पानी ने ठंडे पानी को सतह पर आने नहीं दिया जिससे ज्यादा तूफान बनने लगे और इससे वायुमंडल में और ज्यादा ऊष्मा आने लगी. यानि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पिछले कुछ सालों में महासागर में छिपी हुई ऊष्मा अब सतह पर आकर रिकॉर्ड बना रही है.

एक दूसरा कारक अटलांटिक महासागर में एरोसोल की कमी है . एरोसोल महीन कण होते हैं जो सौर विकिरण को वायुमंडल में बिखेरने का काम करते हैं. समतापमंडल में ऐसे एरोसोल बिखेरना ग्लोबल वार्मिंग का उपाय माना जाता है. लेकिन ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करना ज्यादा बेहतर उपाय होगा. उत्तरी अटलांटिक में सहारा रेगिस्तान से आने वाली धूल की कमी से एरोसॉल में कमी रही. इसी तरह से जहाजों से जलने वाले ईंधन से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड का कम उत्सर्जन हुआ. इसके दूरगामी लाभ तो होंगे लेकिन त्वरित प्रभाव में एरोसॉल में कमी हुई जिससे तापमान बढ़ गए.

इसी साल मई में विश्व मौसम विभाग ने ऐलान किया था कि अगले पांच साल के भीतर ही दुनिया का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक काल के स्तर की तुलना में अस्थायी तौर पर 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो जाएगा. यह पूर्वानुमान अलनीनो असर के अनुकूल ही है और इससे यह सभावना बढ़ ही रही है. और इस स्थिति को स्थायी तौर पर पहुंचने में 2030 तक का समय लग सकता है. और सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. लेकिन यह दावा करना अब कठिन होता जा रहा है कि हमने वापसी का बिंदु पार नहीं किया है. हां लेकिन इसके लिए समय जरूर कम होता जा रहा है.

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