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Home राष्ट्रीय

40वें दिन क्यों चांद पर उतर पाएगा चंद्रयान-3, क्यों लगेंगे इतने दिन

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 14, 2023
in राष्ट्रीय
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chandrayaan-3
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नई दिल्ली : चंद्रयान – 3 सफलतापूर्वक आंतरिक कक्षा में स्थापित हो गया. अब इस अंडाकार पथ पर पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए चांद की कक्षा में पहुंचेगा और फिर वहां सतह पर उतरेगा. जिस आंतरिक कक्षा में चंद्रयान -3 फिलहाल परिक्रमा करेगा, वो धरती से 35,000 किलोमीटर दूर है. इसमें वह दिन में 5-6 बार पृथ्वी के चक्कर काटेगा. उसको यहां से चांद की कक्षा में पहुंचने और उसमें उतरने तक 40 दिन क्यों लग जाएंगे. ये सवाल स्वाभाविक है क्योंकि चाहे अमेरिका का चांद का मिशन हो या रूस का-सभी ने अपने अंतरिक्ष यानों को वहां चौथे या पांचवें दिन ही उतार दिया था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि चांद तक की यात्रा बहुत कठिन है. इसके लिए सटीक गणना, सावधानीपूर्वक योजना और अंतरिक्ष भौतिकी की गहरी समझ की जरूरत होती है. पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की कक्षा अण्डाकार है, जिसका अर्थ है कि पृथ्वी से इसकी दूरी बदलती रहती है. अपने निकटतम बिंदु पर, चंद्रमा पृथ्वी से 363,104 किमी दूर है. अपने सबसे दूर बिंदु पर, यह 405,696 किमी दूर है.

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चंद्रयान-2 को कितना समय लगा था

पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की औसत दूरी 384,400 किमी है. चंद्रमा पर यात्रा की योजना बनाते समय वैज्ञानिक इन सभी बातों का ख्याल रखते हैं. चंद्रयान-2 मिशन को चंद्रमा तक पहुंचने में लगभग छह सप्ताह का समय लगा था. सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिए ये प्रक्षेप पथ का परिक्रमा करता रहा. इस यात्रा में अंतरिक्ष यान के उतरने को धीमा करने का जरूरी काम भी शामिल था.

यान को पहले पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से निकाला जाएगा

चंद्रयान-2 मिशन ने यान की गति बढ़ाने और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बचने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल किया था. धीरे-धीरे पृथ्वी से अंतरिक्ष यान की दूरी बढ़ाई गई कि ये गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से बचने में सक्षम हो जाए. जब ये दूर होकर पृथ्वी की गुरुत्वकर्षण शक्ति से परे गया तो चंद्रमा की कक्षा में जाने में सक्षम हो पाया.

चांद की कक्षा में घूमते हुए इसके वहां की सतह पर उतरने के लिए कई आपरेशंस को इसरो के वैज्ञानिकों ने धरती पर बैठे हुए कंट्रोल किया. अंतरिक्ष यान के वेग को कम करने के लिए उसके इंजनों को चालू किया गया. फिर धीरे धीरे उसे चांद के करीब पहुंचाया गया. इसके बाद इसको धीरे से चंद्रमा की सतह पर उतारा गया.

आखिरी स्टेज कही जाती है लैंडिंग बर्न

जब चंद्रयान की गति को आखिरी स्टेज में एकदम कम करके इसे चांद की सतह पर उतारा जाता है तो इसे लैंडिंग बर्न कहा जाता है. इसकी गति इतनी कम कर दी गई कि ये चांद पर उतर सका. चंद्रयान-2 चंद्रमा पर 7 सितंबर, 2019 को उतरा. लेकिन इसके बाद लैंडर विक्रम चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसकी वजह से चंद्रयान ने काम करना बंद कर दिया. रोवर प्रज्ञान तैनात नहीं किया जा पाया.

इसके 23 अगस्त को चांद पर उतरने का अनुमान

इसरो का अनुमान है कि चंद्रयान-03 अब 23 अगस्त को यान 40वें दिन चांद की सतह पर उतरना चाहिए. अब से हर रोज इसरो के वैज्ञानिक कंट्रोल रूम से उसे नियंत्रित करते रहेंगे. उसकी गति को बढ़ाते रहेंगे और उसकी परिक्रमा कक्षा पर नजर रखेंगे.

अपोलो8 को 69 घंटे लगे तो रूसी लूना 34 घंटे में पहुंचा

अगर किसी को इतिहास में पीछे जाना हो, तो अपोलो 8 मिशन चंद्रमा की सबसे तेज़ यात्रा थी, जिसमें 69 घंटे और 8 मिनट लगे. अपोलो 8 के बाद प्रत्येक मिशन को चंद्रमा तक पहुंचने में कम से कम 74 घंटे लगे. अपोलो 17 मिशन चंद्रमा पर उतरने वाला आखिरी मिशन था, जिसमें 86 घंटे और 14 मिनट लगे. 1959 में यूएसएसआर के लूना-2 यान को चंद्रमा तक पहुंचने में केवल 34 घंटे लगे. लेकिन ये सभी रॉकेट बहुत ज्यादा शक्तिशाली थे.

इसलिए इसरो ने किया घुमावदार रास्ते का इस्तेमाल

भारत के रॉकेट इतने शक्तिशाली नहीं हैं कि सीधे चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेज सकें. इसके बजाय इसरो एक घुमावदार मार्ग का उपयोग करता है, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का लाभ उठाता है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि चंद्रमा तक पहुंचने के लिए किसी अंतरिक्ष यान को न्यूनतम 11 किमी/सेकेंड के वेग से यात्रा करनी होगी. वाहन ही इस गति में भूमिका निभाता है. लेकिन प्रोपेलैंट फ्यूल प्रणाली 700 मीटर/सेकेंड की गति देती है. प्रोपेलेंट ईंधन से चलने वाले इंजन उतना ताकतवर नहीं होता. अगर चंद्रयान को ले जाने वाले अंतरिक्ष यान में सैटर्न वी जैसा अधिक शक्तिशाली इंजन होता, तो यह एक ही बार में चंद्रमा तक पहुंचा सकता था. इस ईंधन का खर्च भी बहुत ज्यादा होता है.

बजट कितना है

चंद्रयान 3 के लिए इसरो को दिया गया बजट 615 करोड़ रुपये है, जिसमें लांचिंग का खर्च ही 75 करोड़ रुपये है. चंद्रयान 2 की कुल मिशन लागत 978 करोड़ रुपये थी

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