लखनऊ : यूपी के बाहर सपा का पीडीए का मुद्दा फुस्स होकर रह गया, न जातिगत जनगणना और न पिछड़ों, दलितों अल्पसंख्यकों को आगे बढ़ाने की बात काम आई। मध्य प्रदेश में जहां सपा खासी जोरशोर से लड़ी और कांग्रेस से भी तल्खी हो गई, वहां सपा की यह कवायद धरी की धरी रह गई। उसने 46 प्रत्याशी उतार दिए, लेकिन आधा प्रतिशत वोट भी नहीं मिला।
असल में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने दो तीन के मध्य प्रदेश दौरे में तमाम जनसभाओं में पीडीए (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) के हक का मुद्दा उछाला और जातिगत आरक्षण की बात की। यही नहीं सपा ने वहां भाजपा के साथ साथ कांग्रेस को भी निशाने पर रखा लेकिन मध्य प्रदेश की जनता को पीडीए का मुद्दा नहीं भाया। वहां मोदी शिवराज के मैजिक के आगे जब कांग्रेस की नहीं चली तो सपा के लिए कुछ बड़ा कर पाना दूर की कौड़ी ही था।
सपा ने कुछ सीटें राजस्थान व छत्तीसगढ़ में लड़ी थीं। इसके जरिए वह समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का दर्जा दिलाने का जरिया मान रहे थे लेकिन मंसूबा भी फिलहाल पूरा होता नहीं दिख रहा। पीडीए की सियासत यूपी के बाहर नहीं चली लेकिन अब इसका परीक्षण तो यूपी में होगा। जहां सपा की मजबूत जमीन है पर लोकसभा चुनाव में भाजपा के आक्रामक चुनाव अभियान के सामने वह पीडीए में कितना चुम्बकीय आकर्षण पैदा कर पाते हैं, जिससे जनता पीडीए की तरफ खिंची चली जाए यह आगे तय होगा।
मध्य प्रदेश में हो गई थी कमलनाथ अखिलेश यादव में तल्खी
मध्य प्रदेश में सपा चाहती थी कि कांग्रेस उसे छह सीटें छोड़ दे लेकिन शुरुआती सहमति के बाद अचानक कांग्रेस ने उन सीटों पर भी प्रत्याशी उतार दिए। इसके बाद दोनों ओर से बयानबाजी शुरू हो गई तो कमलनाथ ने कह दिया अरे छोड़ो अखिलेश- वखिलेश…. जबकि अखिलेश ने कांग्रेस को धोखेबाज तक बताया। इसके बाद अखिलेश ने 46 सीटों पर प्रत्याशी उतार दिए। सपा अगर बेहतर करती तो वह लोकसभा चुनाव हो तो कांग्रेस पर मध्य प्रदेश में भी एक दो सीटे देने के लिए कह सुन सकती थी लेकिन अब नतीजो से सपा का यह मंसूबर भी धरा रह गया।







