देहरादून : उत्तराखंड राज्य बने 23 साल से अधिक का समय हो चुका है लेकिन अब तक रही सरकारें यहां राजधानी का मसला हल नहीं कर पाईं। देहरादून को अस्थायी तो गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया पर स्थायी राजधानी कहां होगी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं। राज्य निर्माण के वक्त ही राजधानी को लेकर निर्णय हो जाता तो न केवल ये मुद्दा खत्म हो गया होता बल्कि अलग अलग जगह विधानसभा भवन बनाने की नौबत भी नहीं आती। इससे राज्य के संसाधनों का बेहतर उपयोग होता व राजधानी नियोजित रूप में नजर आती।
उत्तराखंड को राज्य बनाने की मांग के साथ ही गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग भी शुरू हो गई थी। समूचे राज्य आंदोलन के दौरान लोगों की भावना राजधानी के रूप में गैरसैंण के साथ थी। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद सरकारें, इस मुद्दे को लटकाती रहीं।
…इसलिए हुआ था गैरसैंण का चुनाव
गढ़वाल और कुमाऊं के बीच स्थित होने की वजह से गैरसैंण को शुरू से राज्य की राजधानी बनाए जाने की मांग उठ रही थी। अलग राज्य के लिए हुए आंदोलनों में भी गैरसैंण राजधानी प्रमुख नारे के रूप में रहा। बाबा मोहन उत्तराखंडी गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर तेरह बार अनशन पर बैठे थे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के पीछे पहाड़ी राज्य का संचालन, पर्वतीय क्षेत्र से किए जाने की मंशा थी। राज्यवासियों की यह मंशा आज तक पूरी नहीं हो पाई। इस बीच गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी तो घोषित कर दिया गया लेकिन यहां पर सरकार चंद दिनों के लिए ही पहुंच पाती है।
गैरसैंण में नौ साल में महज 30 दिन चला विधानसभा सत्र
गैरसैंण में विधानसभा सत्र की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। उसके बाद से अब तक वहां महज 30 दिन ही सत्र चला। कोविडकाल में वहां सत्र नहीं हुए। इसके अलावा हर साल सत्र हुए पर उसकी अवधि भी बहुत ज्यादा नहीं रही। ऐसा बहुत ही कम हुआ जब गैरसैंण में सत्र, चार-पांच दिन से अधिक चला हो।







