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Home दिल्ली

राम मंदिर मुद्दे पर BJP से मुकाबले में केजरीवाल आगे, बाकी तो बस विरोध कर रहे हैं

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 22, 2024
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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Arvind Kejriwal
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नई दिल्ली : राहुल गांधी की कांग्रेस सहित INDIA ब्लॉक के सभी नेताओं ने अयोध्या के राम मंदिर उद्घाटन समारोह को बीजेपी का राजनीतिक कार्यक्रम बता तो दिया, लेकिन क्या वे सभी अपने स्टैंड को लोगों की नजर में सही साबित भी कर पाये?

कांग्रेस ने समारोह के न्योते को ‘ससम्मान अस्वीकार’ कर अपनी तरफ से बेहद नपी-तुली प्रतिक्रिया देने की कोशिश की थी, लेकिन क्या वे हिंदू वोटर के बीच राजनीतिक तौर पर खुद को दुरूस्त पेश कर सके? ममता बनर्जी और अखिलेश यादव की तो अपनी अलग राजनीतिक लाइन है, लेकिन महाराष्ट्र में राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे उद्धव ठाकरे, मौजूदा माहौल में खुद को सही मोड़ पर पेश कर पाये हैं? फर्ज कीजिये, बीजेपी से नाराज होकर कोई वोटर विकल्प की तलाश में इधर उधर देखता है, तो क्या ये नेता उसे नजर आ रहे होंगे?

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देखा जाये तो विपक्ष के ज्यादातर नेता बीजेपी से राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे वे सिर्फ विरोध कर रहे हैं. कहने को विरोध तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कर रहे हैं, और वो INDIA ब्लॉक के साथ भी हैं, लेकिन उनका विरोध राजनीतिक हिसाब से बाकियों से काफी अलग लगता है – ऐसा क्यों लगता है, जैसे अरविंद केजरीवाल बीजेपी से राजनीतिक मुकाबले की कोशिश कर रहे हैं, और बाकी विपक्षी नेता सिर्फ विरोध की राजनीति कर रहे हैं.

अयोध्या समारोह के न्योते को लेकर प्रतिक्रिया देने में भी अरविंद केजरीवाल ने पूरी राजनीतिक चतुराई दिखाई है, और उसके बाद जो कुछ भी किया वो बाकियों के लिए सबके जैसा ही लगता है. विपक्षी नेताओं को ये कहने का पूरा अधिकार है कि वे अयोध्या के कार्यक्रम को किस नजरिये से देखते हैं, और लोगों के सामने कैसे पेश करते हैं – लेकिन सवाल ये भी तो है बहिष्कार से हासिल क्या हो रहा है? बहिष्कार विरोध का बेहतरीन तरीका होता है, लेकिन राजनीति में फैसले आंदोलन की तरह नहीं लिये जाते.

अगर विपक्ष के बाकी नेताओं की तरह अरविंद केजरीवाल भी स्टैंड लेते तो लगता कि चलो वो आंदोलन के जरिये ही तो राजनीति में आये हैं, धंधा बदल लेने से फितरत थोड़े ही बदल जाएगी. मगर, अयोध्या समारोह को लेकर अरविंद केजरीवाल ने जो परिपक्वता दिखाई है, वो बाकियों के लिए मिसाल हो सकती है – और अगर कोई समझना चाहे तो भविष्य की राजनीतिक झलक भी देखी जा सकती है.

अयोध्या समारोह के न्योते को लेकर विपक्ष के नेताओं के रिएक्शन देखें तो अरविंद केजरीवाल की प्रतिक्रिया पॉलिटिकली करेक्ट लगती है. अरविंद केजरीवाल ने तो अखिलेश यादव की तरह अनजाने लोगों से न्योता लेने से इनकार किया, न निमंत्रण भेजे जाने वाले कूरियर की रसीद मांगी, और न ही ससम्मान अस्वीकार किया.

संवाददाताओं से बातचीत में आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल का कहना था, ‘मुझे एक पत्र मिला… जिसमें कहा गया है कि सुरक्षा कारणों से केवल एक व्यक्ति के लिए ही अनुमति है.’ अरविंद केजरीवाल ने बड़े ही सहज तरीके से समझाया कि व्यक्तिगत निमंत्रण देने के लिए एक टीम को आना था, लेकिन कोई नहीं आया.

फिर बोले, ‘मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रामलला के दर्शन के लिए जाना चाहता हूं… मेरे माता-पिता की भी रामलला के दर्शन की इच्छा है… 22 जनवरी के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद मैं पत्नी, बच्चों और माता-पिता के साथ जाऊंगा.’

अरविंद केजरीवाल ने भी न्योता ससम्मान ही अस्वीकार किया है. अखिलेश यादव और शरद पवार जैसे नेताओं की तरह वो भी मुख्य समारोह के बाद अयोध्या जाने की बात कर रहे हैं – लेकिन अपनी बात कहते वक्त अरविंद केजरीवाल न तो कुछ झुंझलाहट प्रकट करते हैं, न ही कोई शिकायत. वो तो ये भी नहीं कह रहे कि अयोध्या समारोह बीजेपी का राजनीतिक कार्यक्रम है.

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