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Home राजनीति

लोकसभा चुनाव के बीच राम मंदिर ने कैसे बदली बंगाल की सियासत?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 18, 2024
in राजनीति, राज्य
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Shri Ram temple
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नई दिल्ली. पिछले साल पश्चिम बंगाल रामनवमी के अवसर पर दंगों की आग में झुलस गया था. हावड़ा से लेकर हुगली तक रामनवमी के जुलूस को लेकर हिंसा हुई थी और कई दिनों की मशक्कत के बाद हिंसा पर नियंत्रण लाया गया था, लेकिन इस साल बंगाल में रामनवमी के अवसर पर तस्वीर ही कुछ दूसरी ही है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने पहली बार रामनवमी पर अवकाश का ऐलान किया है. बुधवार को पश्चिम बंगाल के सरकारी कार्यालय से लेकर कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान बंद रहे. लोकसभा चुनाव में जुटे बीजेपी के नेता तो रामनवमी के जुलूस में शामिल होते दिखे ही, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को भी रामनवमी के जुलूस में शामिल होते देखा गया.

इस बार रामनवमी में तृणमूल कांग्रेस की अलग तस्वीर देखने को मिली. बीरभूम से तृणमूल उम्मीदवार शताब्दी रॉय को बुधवार को सिउरी में रामनवमी जुलूस में भाग लेते देखा गया. निवर्तमान सांसद के साथ बीरभूम कोर कमेटी के संयोजक बिकास रॉय चौधरी भी थे. पिछले सालों तक तृणमूल कांग्रेस के नेता वीरभूम में इतने भव्य तरीके से रामनवमी समारोह में भाग लेते कभी नहीं देखा गया था, लेकिन इस चुनाव में टीएमसी नेता पूरे जोश से रामनवमी के जुलूस में हिस्सा ले रहे हैं.

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बता दें कि लंबे इंतजार के बाद अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया गया है और रामलला की मूर्ति प्रतिष्ठापित हुई है. राममंदिर और रामलला को लेकर पूरे देश के लोगों में उत्साह है और बीजेपी इसे लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना रही है. बीजेपी के नेता राममंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में इंडिया गठबंधन के नेताओं के शामिल नहीं होने को हिंदू धर्म और संस्कृति का अपमान करार दे रही है. ऐसे में विपक्षी पार्टी के नेता अपने मतदाताओं को निभाने के लिए रामनवमी के उत्सव का इस्तेमाल कर रहे हैं.

बता दें कि कुछ साल पहले श्रीराम के नारे लगने के बाद ममता बनर्जी उखड़ गईं थीं और खुलेआम राम मंदिर का नाम लगाने वालों को फटकार लगाई थीं. इसी तरह से विक्टोरिया मेमोरियल के पीएम मोदी के साथ कार्यक्रम में जब दर्शकों ने जयश्री राम के नारे लगाए थे, तो ममता बनर्जी गुस्सा गईं थीं और कार्यक्रम को बीच में छोड़कर चली गई थीं. लेकिन अब आखिर क्या कारण है कि बंगाल में मुस्लिमों को लेकर राजनीति करने वाली टीएमसी आज हिंदुओं को लुभाने में जुटी हैं? और टीएमसी के नेता रामनवमी के कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं.

हिंदू वोटों को लुभाने की कवायद
पश्चिम बंगाल की सियासत में यह बात कही जाती है कि बंगाल में सीएम की कुर्सी पर वही बैठता है, जिसे मुस्लिम समुदाय समर्थन करते हैं. राज्य में मुस्लिमों की आबादी करीब 27 फीसदी है, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में बंगाल की सियासत के मिथक को तोड़ दिया है. बंगाल में बीजेपी ने बिना मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश करते हुए राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 पर कब्जा जमा लिया था. कई लोकसभा इलाकों में हिंदुओं ने एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट किया था. ऐसे में तृणमूल कांग्रेस नहीं चाहती है कि फिर से हिंदुओं वोट बीजेपी के खाते में चली जाए.

इसलिए ममता बनर्जी पहले रामनवमी के अवसर पर अवकाश का ऐलान किया और आज रामनवमी के अवसर टीएमसी के नेता जुलूस में शामिल हुए. भाजपा के बीरभूम संगठनात्मक जिला अध्यक्ष ध्रुव साहा का कहना है कि तृणमूल भाजपा की राह पर चलने की बेताब कोशिश कर रही है. उनके शब्दों में तृणमूल को हिंदू वोट पाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. हालांकि, तृणमूल उम्मीदवार इस सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि जय श्री राम का नारा किसी का अनोखा नहीं है. भगवान राम सबके हैं. यह भगवान से प्रार्थना करने का एक मंत्र है.

कांग्रेस-लेफ्ट की दोस्ती, मुस्लिम वाटों के बंटने का खतरा
लोकसभा चुनाव में बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि टीएमसी राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही हैं. टीएमसी हालांकि इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी, लेकिन बंगाल में इंडिया गठबंधन पूरी तरह से बिखर गया है. ऐसे में मुस्लिम वोट के विभाजित होने का खतरा है. यदि मुस्लिम वोट विभाजित होते हैं, तो इसका फायदा किसी न किसी रूप से बीजेपी को होगा. और टीएमसी मुस्लिमों के वोट के बंटने के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई हिंदू वोटों से करना चाहती हैं.

इसके पहले सागरदिघी विधानसभा उपचुनाव में टीएमसी के उम्मीदवार की पराजय हुई थी. हालांकि इस इलाके में मुस्लिमों का बाहुल्य है, लेकिन मुस्लिमों ने खुलकर कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया था. ममता बनर्जी अभी भी सागरदिघी में टीएमसी की पराजय को नहीं भूली हैं. पिछले पंचायत चुनाव में तृणमूल के नेतृत्व वाली तीन विधानसभाओं में से वाम-कांग्रेस ने कई पंचायतों पर कब्जा किया था.

सीएए से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
केंद्र सरकार ने लोकसभा से पहले सीएए लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की है. पिछले लोकसभा चुनाव में सीएए लागू करने के ऐलान से ही राज्य के मतुआ वोट पूरी तरह से बीजेपी में शिफ्ट हो गए थे और मतुआ समुदाय ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था. ऐसे में केंद्र सरकार ने सीएए लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है, तो बंगालादेश से आए हिंदुओं के पूरी तरह से एकजुट होने के आसार हैं. ऐसे में हिंदुओं वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए ममता बनर्जी और टीएमसी लगातार सीएए का विरोध कर रही है. आज भी टीएमसी ने वादा किया है कि यदि इंडिया गठबंधन सत्ता में आई तो सीएए को रद्द किया जाएगा और एनआरसी को समाप्त किया जाएगा. ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध कर रही है और सीएए और एनआरसी को मुस्लिम विरोधी करार दे रही है.

संदेशखाली-भूपतिनगर की घटना से बैकफुट पर टीएमसी
संदेशखाली में महिलाओं पर अत्याचार और ईडी अधिकारियों पर हमले और फिर भपतिनगर में सीबीआई अधिकारियों पर हमले की घटना के बाद टीएमसी बैकफुट पर है. बंगाल हो या फिर देश के अन्य राज्य महिलाएं साइलेंट वोटर मानी जाती हैं और किसी भी उम्मीदवार को जीत दिलाने में आधी आबादी की वोट की अहम भूमिका होती है. ऐसे में संदेशखाली की घटना के बाद राज्य की महिलाएं नाराज हैं और टीएमसी किसी रूप से महिलाओं को और नाराज नहीं करना चाहती हैं.

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