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Home दिल्ली

क्या दिल्ली में AAP को होने लगा कमजोरी का एहसास?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 3, 2025
in दिल्ली, राजनीति
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आम आदमी पार्टी
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नई दिल्ली। इनकम टैक्स में केंद्र सरकार द्वारा दी गई बड़ी राहत, लगातार 10 साल सत्ता में रहने के कारण आम आदमी पार्टी के प्रति एंटी इनकम्बैंसी और अरविंद केजरीवाल की ईमानदार नेता की छवि पर आबकारी मामले में जेल जाने से लगा बट्टा. ये कुछ ऐसे फैक्टर हैं, जिनका कमोबेश असर दिल्ली विधानसभा चुनाव पर दिखना चाहिए. अरविंद केजरीवाल के ऊटपटांग बयान से यह साबित होता है कि उन्हें भी चुनौतियों के बारे में बेहतर पता है.

दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम चाहे जैसे आएं, पर एक बात अब तक साफ हो चुकी है. विपक्ष की एकता तोड़ने में दिल्ली चुनाव की बड़ी भूमिका मानी जाएगी. लगातार 10 साल से दिल्ली की सत्ता पर आम आदमी पार्टी (AAP) का कब्जा रहा है. कांग्रेस 10 साल तो भाजपा 27 साल से दिल्ली की सत्ता से दूर रही हैं. लोकसभा की सभी सीटों पर लगातार तीसरी बार आम आदमी पार्टी को भाजपा ने शिकस्त दी, लेकिन इस बीच दो बार हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल धूल चटाते रहे हैं.

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भाजपा का जितना शानदार प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में दिखता है, उतनी ही दुर्गति विधानसभा चुनाव में उसकी होती रही है. वोटों का अंतर 18 फीसद दोनों चुनाव में होता है, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को अधिक वोट मिलते हैं तो विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी बाजी मार लेती है.

बदल गया है चुनावी परिदृश्य

हालांकि इस बार दिल्ली का चुनावी परिदश्य बदला नजर आता है. लोकसभा चुनाव में AAP और कांग्रेस की जो ट्यूनिंग थी, वह विधानसभा के चुनाव में खत्म हो चुकी है. भाजपा विरोधी दल बंट चुके हैं. कांग्रेस के राहुल गांधी अपने नेतृत्व वाले इंडिया ब्लाक के साथी दल AAP के दुश्मन बन गए हैं. एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का आलम यह है कि मतदाता भी समझ नहीं पा रहे कि वे कांग्रेस के साथ जाएं या जिस तरह पहले आम आदमी पार्टी के साथ थे, उसके साथ बने रहें. बंगाल की सीएम और टीएमसी नेता ममता बनर्जी अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी हैं. उनके सांसद आम आदमी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार करते रहे हैं.

बंट गई हैं विपक्षी पार्टियां

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से तालमेल बना कर लोकसभा का चुनाव लड़ चुकी समाजवादी पार्टी भी दिल्ली में कांग्रेस के बजाय AAP के साथ खड़ी है. बिहार में महागठबंधन में कांग्रेस को साथ लेकर चलने वाले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी अरविंद केजरीवाल का समर्थन कर दिया है. डीएमके और जेएमएम को छोड़ विपक्ष के लगभग सभी दल प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर अरविंद केजरीवाल के साथ खड़े हैं. भाजपा अपने एक-एक सीट वाले सहयोगियों- जेडीयू और एलजेपीआर के साथ मैदान में डटी है. इन दलों की कोई बड़ी उपस्थिति दिल्ली में कभी नहीं दिखी, लेकिन पूर्वांचली वोटरों पर इनका थोड़ा असर जरूर हो सकता है.

बौखला गए हैं केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल को इस बात का एहसास है कि पिछले दो चुनावों की तरह इस बार मैदान मारना आसान नहीं है. हरियाणा और महाराष्ट्र में मिली कामयाबी से भाजपा का मनोबल बढ़ा हुआ है. आम आदमी पार्टी की मुसीबत यह है कि वह अब तक भाजपा से लड़ती आई है और इस बार कांग्रेस से भी उसे लड़ना पड़ रहा है.

वैसे कांग्रेस बीते 10 साल से हाशिए पर है. उसे न लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिलती और न विधानसभा चुनाव में. पर, इस बार उसने भी पूरा जोर लगा दिया है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने मोर्चा संभाला है. यानी आमने-सामने की होती रही लड़ाई इस बार दिल्ली में त्रिकोणीय हो गई है. इससे अरविंद केरीवाल की घबराहट साफ झलकती है. वे कभी चुनाव आयोग पर फूट पड़ते हैं तो कभी यमुना में जहर मिलाने जैसा बेतुका और हास्यास्पद आरोप लगाते हैं.

भाजपा की रणनीति क्या

भाजपा ने इस बार दिल्ली के तख्त पर काबिज होने के लिए जबरदस्त तैयारी की है. बूथ स्तर तक वोटर से वन टू वन मिलने की उसकी योजना हरियाणा और महाराष्ट्र में कामयाब रही है. इन राज्यों में छह-आठ महीने पहले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा पर जिस तरह विरोधी हावी थे, उससे अलग स्थिति दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में दिखी. यह अन्य कारणों के अलावा भाजपा की कुशल स्ट्रेटजी का नतीजा था. हरियाणा-महाराष्ट्र के पैटर्न पर ही भाजपा दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ रही है.

अरविंद की ताकत जानिए

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की ताकत दो कारणों से लगातार 10 साल बरकरार रही है. अव्वल तो उन्होंने मुफ्त की रेवड़ियों के सहारे लोगों में लोकप्रियता हासिल की और दूसरे उनकी छवि ईमानदार नेता की दिखती रही है. मुफ्त की रेवड़ियों की आदत जिन्हें लग गई है, वे इस पर फोकस करेंगे कि कौन अधिक रेवड़ियां दे रहा है.

भाजपा भी इस बार रेवड़ियों की घोषणा में पीछे नहीं है. उसके कई किस्तों में आए संकल्प पत्र में लोगों के लिए रेवड़ियों की भरमार है. केजरीवाल की ईमानदार नेता की छवि को भी बट्टा लगा है. आबकारी मामले में उनकी और आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को जेल जाना पड़ा. एंटी इनकम्बैंसी का फैक्टर भी है. यानी केजरीवाल की जो मूल जमा पूंजी रही है, उसमें इस बार कमी दिखती है. केजरीवाल के शीश महल पर बेशुमार खर्च से भी उनकी छवि धूमिल हुई है.

भाजपा को उम्मीद क्यों?

भाजपा को पूरी उम्मीद है कि इस बार दिल्ली की सत्ता पर उसे काबिज होने का मौका जनता जरूर देगी. इसके तीन कारण हैं. पहला यह कि अरविंद केजरीवाल की ईमानदार नेता की छवि अब नहीं रही. दूसरे एंटी इनकम्बैंसी और तीसरे इस बार के आम बजट के प्रावधानों से भी भाजपा आशान्वित है. बाकी मेहनत तो सभी कर रहे हैं. हां, इसमें भाजपा का प्रयास थोड़ा अलग इस मामले में है कि मतदाताओं तक पहुंचने के पार्टी ने अपने तमाम तंत्रों के माध्यम से प्रयास किए हैं.

केंद्रीय बजट में 12 लाख की आय को टैक्स फ्री करने की घोषणा से भी दिल्ली के काफी लोग भाजपा के प्रति आकर्षित होंगे. केंद्रीय बजट इस बार मिडिल क्लास के अनुकूल माना जा रहा है. दिल्ली की कुल आबादी में तकरीबन 45 प्रतिशत मिडिल क्लास के लोग है. यानी बजट से मिडिल क्लास बहका तो आम आदमी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है. बहरहाल, 5 फरवरी को वोटिंग होनी है और 8 फरवरी को नतीजों का ऐलान हो जाएगा. आकलन-अनुमान की हकीकत जानने के लिए तब तक इंतजार करना ही बेहतर होगा.

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