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Home राष्ट्रीय

38 साल बाद बोफोर्स तोप सौदों की जांच में कितनी आंच?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
March 7, 2025
in राष्ट्रीय
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Bofors gun
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नई दिल्ली: बोफोर्स तोप सौदों की गूंज से भारत के राजनीतिक गलियारों में फिर से कान सुन्न पड़ने वाले हैं. यह वही बोफोर्स तोप हैं जिसकी दलाली खाने का आरोप के चलते राजीव गांधी को 1989 में अपनी सरकार को खोना पड़ गया था. इसका भूत एक बार फिर जाग गया है यूं कहें कि जगा दिया गया है.  सीबीआई ने अमेरिका से लीगल रिक्वेस्ट किया है कि प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर माइकल हर्शमैन से 1980 के दशक के 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स रिश्वत कांड से जुड़ी अहम जानकारी दी जाए.

CBI ने एक लेटर रोगेटरी (Letter Rogatory – LR) भेजा है, जो एक आधिकारिक अनुरोध होता है. इसमें एक देश की अदालत दूसरे देश की अदालत से आपराधिक जांच या मुकदमे के लिए सहायता मांगती है. बताया जा रहा है कि इस LR को भेजने की प्रक्रिया 14 अक्टूबर 2024 को शुरू हुई थी, और अदालत से मंजूरी मिलने के बाद फरवरी 2025 में इसे भेजा गया. CBI ने इस मामले की आगे की जांच के लिए विशेष अदालत को हालिया घटनाक्रम की जानकारी दी है. सवाल उठता है कि अचानक बोफोर्स तोपों का बंद हो चुका मामला एक बार फिर क्यों उठने वाला है.

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क्या अडानी-सरकार के संबंधों पर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब है

दरअसल राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शुमार हो चुके गौतम अडानी के बीच संबंधों के बारे में अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं. देश विदेश का कोई मंच नहीं होगा जहां राहुल गांधी अडानी का नाम नहीं लेते हों. कई बार राहुल गांधी के आरोप बहुत डेरोगेटरी भी हो जाते हैं. हो सकता है कि इस अपमानजनक स्थिति से बचने के लिए सरकार ने बोफोर्स के मुद्दे को फिर जीवित करने का फैसला किया हो.

CBI ने 22 जनवरी 1990 को इस मामले में पहली FIR दर्ज की थी. FIR में बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन अर्डबो, कथित बिचौलिए विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप लगाए गए.  हिंदुजा बंधुओं का नाम अस्सी के दशक में उसी तरह लिया जाता था जिस तरह आज अडानी और अंबानी का लिया जाता है. जाहिर है कि हिंदुजा बंधुओं के बहाने बीजेपी सरकार यह बताने की कोशिश करेगी जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते.

इतालवी कनेक्शन से गांधी परिवार को घेरने की कोशिश

BJP किसी भी पुराने घोटाले को एक नए राजनीतिक संकट में बदलने में माहिर मानी जाती है. CBI का अमेरिका से हर्शमैन की मदद मांगना कांग्रेस के लिए नई मुसीबत खड़ा करना हो सकता है.दिलचस्प यह होगा कि BJP इस पुराने मामले को आगामी चुनावों में कैसे भुनाती है, और कांग्रेस इस पर क्या जवाब देती है. क्योंकि  BJP बार-बार सोनिया गांधी की इटली की नागरिकता का मुद्दा उठाती रही है, और ओटावियो क्वात्रोच्ची भी एक इतालवी नागरिक थे.

गांधी परिवार को स्वार्थी साबित करने की रणनीति

बीजेपी सरकार इस जांच के माध्यम से नई पीढ़ी को यह बताने की कोशिश करने वाली है कि गांधी परिवार अपने अपने स्वार्थ के चलते किस तरह समर्पित लोगों को बलि चढ़ाती रही है. बोफोर्स सौदों की आंच आने पर तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने खुद को बचाने के लिए कैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह की बलि ले ली थी. दरअसल माइकल हर्शमैन को 1987 में तत्कालीन वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करने के लिए नियुक्त किया था. यह नियुक्ति बिना प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जानकारी के हुई थी.

जांच के दौरान, हर्शमैन को ऐसे वित्तीय लेनदेन मिले, जो रक्षा सौदों में रिश्वत से जुड़े थे.राजीव गांधी को इसकी भनक तब लगी जब अब निष्क्रिय हो चुके बैंक ऑफ क्रेडिट एंड कॉमर्स इंटरनेशनल (BCCI) पर छापा मारा गया. इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह का विभाग बदलकर वित्त से रक्षा मंत्रालय कर दिया गया, जिससे हर्शमैन की जांच वहीं रुक गई. हर्शमैन के अनुसार, उनकी जांच में स्विस बैंक में ‘मोंट ब्लांक’ नामक खाता मिला, जिसमें $1.5 मिलियन से अधिक की राशि जमा थी. जाहिर है कि मामला एक बार खुलेगा तो राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान हुई तमाम अवैध गतिविधियां फिर सामने आएंगी.

पर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है

एक कहावत है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती. मतलब कि बेमतलब का मुद्दा उछालने से कोई फायदा नहीं होता है. बोफोर्स मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है. अगर मुद्दे में दम होता तो कांग्रेस की वापसी 1991 में नहीं हुई होती. इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी बिना गांधी परिवार के भी 2004 और 2009 में सरकार बनाने में सफल हुई. बोफोर्स तोपों ने करगिल युद्ध के समय भारतीय सेना के लिए बहुत शानदार काम किया. हमारे सैकड़ों जवानों की जान बचाने में काम आ चुकी हैं. इसलिए अब बोफोर्स कोई मुद्दा नहीं है. यहां तक कि राफेल की खरीद में भी इस तरह की बातें हुईं थीं.

राहुल गांधी ने बहुत दिनों तक राफेल का मुद्दा उठाया पर जनता के बीच कोई प्रभाव नहीं छोड़ सके. जनता को पता है कि हथियारों की खरीद में बिचौलिये पैसे लेते हैं. और बिना बिचौलियों के जरिए आज एक फ्लैट नहीं खरीदा जा सकता.पब्लिक की नजर में अब दलाली कोई मुद्दा नहीं रह गया है. सरकार की कोशिश बेकार ही सिद्ध होने वाली है. न राजीव गांधी रहे न विश्वनाथ प्रताप सिंह और न क्वात्रोची. अब इस जांच का कोई मतलब नहीं रह गया है. सरकार को आगे की तरफ देखना चाहिए.

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