राहुल सिंह परिहार
नई दिल्ली: छोटे-छोटे गाँवों की गलियों से लेकर डिजिटल भारत की आभासी दुनिया तक, राष्ट्रीय सेवा योजना (रासेयो) ने 56 वर्षों में सेवा और समर्पण का ऐसा कारवाँ रचा है जिसने लाखों युवाओं को बदलते भारत का अगुआ बना दिया। भोपाल की ईश्वरनगर बस्ती में दीये की रोशनी में चली साक्षरता कक्षा हो या बड़झिरी ग्राम का डिजिटल सपना, बाल तस्करी से बचाये गए बच्चे हों, रक्तदान शिविरों से बची जिंदगियाँ हों या कोविड-19 महामारी में राहत बाँटते युवा, हर कहानी रासेयो की जीवंत धड़कन है। यह केवल योजना नहीं, बल्कि एक जीवनदृष्टि है, जो हर स्वयंसेवक को सिखाती है कि असली शिक्षा प्रमाणपत्रों में नहीं, बल्कि समाज की सेवा और राष्ट्रनिर्माण की जिम्मेदारी में निहित है।
NSS (राष्ट्रीय सेवा योजना) की असली पहचान उसके स्वयंसेवकों की कहानियों और उनके निस्वार्थ प्रयासों से बनती है। यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि युवाओं की जीवनशैली और संस्कार है, जिसमें सेवा को सर्वोत्तम साधना माना गया है। इसका मूल ध्येय “स्वयं से पहले आप (समाज)” (Not Me but You) हर स्वयंसेवक को आत्मसात कराता है। जब कोई युवा अपने समय, ऊर्जा और संवेदना का एक अंश निस्वार्थ भाव से समाज के लिए समर्पित करता है, तभी रासेयो जीवंत होती है और उसकी वास्तविक चमक सामने आती है।
भारतभूमि सदा से युवा शक्ति की ऊर्जा और नवसृजन की साधना से आंदोलित रही है। जब-जब समय ने नई दिशाओं की माँग की, तब-तब युवाओं ने अपने उत्साह, त्याग और निष्ठा से राष्ट्र को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। इसी युवा ऊर्जा को संगठित करने और उसे समाज सेवा के साथ जोड़ने के लिए रासेयो की स्थापना 24 सितंबर 1969 को महात्मा गांधी की जन्मशताब्दी पर हुई। गांधीजी का मानना था कि “शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य समाज की सेवा है।” इसी विचार के आलोक में शिक्षा के तीसरे आयाम के विस्तार के अंतर्गत यह कार्यक्रम प्रारंभ किया गया ताकि युवा केवल पुस्तक ज्ञान तक सीमित न रहकर समाज की समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से देखें और उनके समाधान में भागीदार बनें।
रासेयो का वास्तविक सार उसके स्वयंसेवकों की उन कहानियों में छिपा है जो समाज में बदलाव की अलख जगाती हैं। उदाहरण के लिए भोपाल की ईश्वरनगर बस्ती में रासेयो स्वयंसेवकों ने चबूतरे पर दीया जलाकर साक्षरता क्लब की शुरुआत की। वहाँ की महिलाएँ, जो पहले घर की दहलीज़ पार करने से कतराती थीं, अब अख़बार पढ़ने लगीं और बच्चों की कॉपियाँ देखने लगीं। इन कक्षाओं से निकले बच्चे आज नवोदय विद्यालय और राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। यह छोटा-सा प्रयास न केवल शिक्षा का महत्व बढ़ाता है, बल्कि यह दिखाता है कि रासेयो के अनुभव स्वयं युवाओं और समाज दोनों के जीवन की दिशा बदल देते हैं।
इसी तरह भोपाल के समीप के ग्राम बड़झिरी की कहानी और भी प्रेरक है। यहाँ रासेयो शिविर के दौरान स्वयंसेवकों ने श्रमदान कर तालाब की सफाई, पौधारोपण और नालियों का निर्माण किया। इस अनुभव से गाँव का एक छोटा बच्चा इतना प्रभावित हुआ कि जीवन में उसने सेवा का मार्ग चुना। आगे चलकर वही बच्चा गाँव का सरपंच बना और आज उसी प्रेरणा से बड़झिरी मध्यप्रदेश का पहला डिजिटल ग्राम बना। यह प्रसंग यह साबित करता है कि रासेयो केवल किसी समय-सीमा वाली गतिविधि नहीं है, बल्कि यह जीवनभर के लिए प्रेरणा की धारा छोड़ जाती है।
रक्तदान की कहानियाँ भी इसी भाव को पुष्ट करती हैं। एक शिविर में रासेयो स्वयंसेवकों ने नियमित रक्तदान की पहल की। जब कभी किसी अस्पताल से आपातकालीन कॉल आती, तो स्वयंसेवक एक घंटे के भीतर रक्त पहुँचाते हैं। जब एक बच्ची की जान इस पहल से बची, तो उसके माता-पिता की आँखों से निकले आँसू और आभार ने स्वयंसेवकों को यह एहसास कराया कि उनका योगदान समाज के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। यह अनुभव उन्हें जीवनभर याद रहता है और यह भाव पनपता है कि “रक्तदान—जीवनदान” केवल नारा नहीं बल्कि जीवन का एक मूल मंत्र है।
कोविड-19 महामारी के दौर में रासेयो का योगदान भी इतिहास में दर्ज होने योग्य है। जब पूरा समाज भय और अनिश्चितता से जूझ रहा था, तब रासेयो स्वयंसेवक मास्क और सेनेटाइज़र बाँट रहे थे, प्रवासी श्रमिकों को भोजन पहुँचा रहे थे, प्रशासन के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चला रहे थे और लोगों के मन में भरोसा जगा रहे थे। सड़कों पर भटकते प्रवासी मजदूरों को भोजन और पानी देना हो या स्क्रीनिंग और सहायता प्रदान करना, रासेयो स्वयंसेवकों ने संकट की घड़ी में मानवता और सेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसने साबित कर दिया कि युवा शक्ति सबसे कठिन समय में भी समाज को संभाल सकती है।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी रासेयो इकाइयों ने ऐतिहासिक काम किए हैं। कई गाँवों में डिजिटल साक्षरता, आजीविका और स्वास्थ्य जागरूकता की कार्यशालाएँ लगाईं गईं। इससे महिलाएँ आत्मनिर्भर बनीं और उनमें आत्मबल की नई परिभाषा गढ़ी। आज कई महिलाएँ छोटे व्यवसाय चला रही हैं और परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं। रासेयो की यह पहल केवल प्रशिक्षण नहीं थी, बल्कि यह गाँव की महिलाओं के लिए आत्मसम्मान और गरिमा का नया अध्याय था।
वर्ष 2019 से जब रासेयो ने बाल संरक्षण पर काम करना शुरू किया तो यह केवल एक प्रयोग था लेकिन साल दर साल जब रासेयो युवाओं ने बच्चों को मजदूरी से बचाया, बाल विवाह रुकवाए और बाल तस्करी के गिरोहों को ध्वस्त कराया, तब यह छोटा सा प्रयोग, एक आन्दोलन बन गया| आगाज़ इंटर्नशिप ने इन स्वयंसेवकों के नवाचार और जमीनी प्रयासों को और बल दिया, परिणाम स्वरुप मध्यप्रदेश में रासेयो के अनिवार्य विषयों में आज बाल संरक्षण शामिल हो गया है और जो हजारो बच्चों के जीवन में रंग भरने का काम कर रहा है|
मतदाता जागरूकता अभियानों में भी रासेयो ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। ‘मेरा वोट–मेरा अधिकार’ जैसी रैलियों, नुक्कड़ नाटकों, चित्रकला प्रतियोगिताओं और EVM/VVPAT डेमो के माध्यम से गाँव-गाँव और स्कूलों में लोकतंत्र का उत्सव मनाया गया। इससे न केवल लोगों की जागरूकता बढ़ी बल्कि मतदान प्रतिशत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रासेयो ने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होंगी जब युवा समाज को जागरूक करने में अग्रणी भूमिका निभाएँगे।
आज के डिजिटल युग में रासेयो को और सशक्त बनाने के लिए “माय भारत पोर्टल” का आगमन हुआ है। यह मंच युवाओं और डिजिटल भारत के बीच सेतु का काम करता है।एक रासेयो स्वयंसेवक अब अपनी सेवा कहानियाँ, नवाचार और गतिविधियाँ इस पोर्टल पर साझा करते हैं। इससे पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा मिला है। स्वयंसेवकों को इंटर्नशिप, प्रशिक्षण, मेंटरशिप और रोजगार के अवसर मिलने लगे हैं। जो सेवाएँ पहले गाँव-गाँव तक सीमित थीं, वे अब डिजिटल पहचान के साथ राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच रही हैं। इस संगम ने पारंपरिक सेवा और आधुनिक तकनीकी नवाचार को जोड़कर रासेयो की ऊर्जा को नई दिशा दी है।
हालाँकि इन सब सफल कहानियों के बीच चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। संसाधनों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव और युवाओं की निरंतर रुचि बनाए रखने जैसी चुनौतियाँ हमेशा रही हैं। लेकिन उत्साही स्वयंसेवक हर बार इन बाधाओं को पार कर नए मार्ग निकालते हैं। यही कारण है कि रासेयो आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी 1969 में अपनी स्थापना के समय थी।
56 वर्षों की अनवरत यात्रा में रासेयो ने यह स्थापित किया है कि यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक आंदोलन, जीवनशैली और जीवनदृष्टि है। यह युवाओं को सिखाती है कि शिक्षा का मूल्य केवल अंकों और प्रमाणपत्रों में नहीं, बल्कि समाज सेवा की शक्ति में है। यही कारण है कि रासेयो का प्रत्येक स्वयंसेवक सूक्ष्म स्तर पर समाज के ताने-बाने को मजबूत करता है और उसकी प्रेरणा गाँव की गलियों, स्कूल की घंटियों, अस्पताल की भगदड़ और लोकतंत्र के हर उत्सव में गूंजती है।
ईश्वरनगर की दीये से रोशन साक्षरता कक्षा, बड़झिरी का डिजिटल सपना, रक्तदान से बची बच्ची की मुस्कान, कोविड में राहत बाँटते स्वयंसेवक, बच्चों के चेहरों पर बिखरी मुस्कानें, महिला सशक्तिकरण की कार्यशालाएँ और मतदाता जागरूकता की रैलियाँ—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि असल में उदाहरण रासेयो को बनाते हैं, न कि रासेयो केवल उदाहरणों का स्रोत है। हर अनुभव यह साबित करता है कि सेवा, जब युवा चेतना से जुड़ती है, तो वह समाज में स्थायी परिवर्तन का आधार बनती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सब राष्ट्रीय सेवा योजना स्थापना दिवस पर संकल्प लें कि “सेवा परमो धर्मः” की भावना को सदा जीवित रखेंगे और “स्वयं से पहले समाज” के आदर्श को जीवन का पथप्रदर्शक बनाएँगे। क्योंकि हर रासेयो स्वयंसेवक केवल गतिविधियों का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का नायक है और यही योजना उसका आधार है।
श्री राहुल सिंह परिहार भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, में ‘राष्ट्रीय सेवा योजना,’ मुक्त-इकाई, के कार्यक्रम अधिकारी, हैं। वे ‘इंदिरा गांधी एनएसएस पुरस्कार से सम्मानित हैं।







