नई दिल्ली। देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते मामलों और आम लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 7 अक्टूबर को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) को निर्देश दिया है कि वे स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से सभी आवारा कुत्तों को हटाएं, और उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी स्थान पर वापस नहीं छोड़ा जाए।
कोर्ट ने कहा कि सभी राज्यों को आदेश के पालन की रिपोर्ट दाखिल करनी होगी और मामले की अगली सुनवाई अनुपालन रिपोर्ट जमा होने के बाद की जाएगी।
कोर्ट ने क्या कहा इसे समझिए
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने यह आदेश उस SUO MOTU (स्वतः संज्ञान) मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जो देशभर में बढ़ते डॉग-बाइट (कुत्तों के काटने) के मामलों पर निगरानी रख रहा है।
पीठ ने कहा कि यदि नसबंदी और टीकाकरण के बाद भी कुत्तों को वापस उसी जगह छोड़ दिया गया, तो यह आदेश के मूल उद्देश्य को “निष्फल” कर देगा। जस्टिस मेहता ने आदेश पढ़ते हुए कहा “उन्हें उसी क्षेत्र में वापस नहीं छोड़ा जाएगा, क्योंकि ऐसा करने से इस निर्देश का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।”
दो सप्ताह में पहचान, आठ सप्ताह में कार्रवाई
कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों में सरकारी व निजी स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल संस्थानों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और खेल परिसरों की पहचान करने का निर्देश दिया है। इसके बाद, आठ सप्ताह के भीतर इन परिसरों को इस तरह सुरक्षित करने के निर्देश दिए गए हैं कि आवारा कुत्तों का प्रवेश न हो सके।
कोर्ट ने कहा कि यदि संभव हो तो बाउंड्री वॉल (सीमा दीवार) बनाई जाए और प्रत्येक परिसर के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए जो उसकी निगरानी करेगा। साथ ही स्थानीय नगर निगम और पंचायतों को तीन महीने तक नियमित निरीक्षण करने और रिपोर्ट अदालत में जमा करने के लिए कहा गया है।
सड़क और हाईवे से भी हटेंगे आवारा पशु
सुप्रीम कोर्ट ने केवल कुत्तों ही नहीं, बल्कि आवारा पशुओं को राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से हटाने के भी निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि NHAI (नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) और अन्य सड़क एजेंसियां यह सुनिश्चित करें कि ऐसे पशु सुरक्षित शेल्टरों में रखे जाएं और सड़क सुरक्षा पर असर न डालें। कोर्ट का यह आदेश उस पृष्ठभूमि में आया है जब हालिया सुनवाईयों में अदालत ने कई राज्यों की लापरवाही और आदेशों की अनदेखी पर कड़ी नाराज़गी जताई थी।
3 नवंबर की सुनवाई में अदालत ने पाया था कि कई सरकारी दफ्तरों और संस्थानों के कर्मचारी परिसर में ही आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं, जबकि कोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया था कि इस तरह के फीडिंग ज़ोन सार्वजनिक क्षेत्रों से दूर बनाए जाएं। उस सुनवाई में अधिकांश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना पड़ा, क्योंकि उन्होंने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की थी। केवल पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और MCD ने अपनी रिपोर्ट जमा की थी।
कोर्ट ने कहा – “सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता नहीं”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह पशु अधिकारों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा कि ABC (Animal Birth Control) नियम 2023 के तहत “कैच-न्यूटर-वैक्सिनेट-रिलीज़ (CNVR)” मॉडल को मान्यता दी गई है, लेकिन संवेदनशील स्थानों जैसे स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक परिवहन केंद्रों में कुत्तों को वापस छोड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि मानवीय व्यवहार और जनसुरक्षा के बीच संतुलन ज़रूरी है, लेकिन हाल की घटनाओं ने दिखाया है कि संस्थागत परिसरों के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
डॉग-बाइट के मामलों से शुरू हुआ था मामला
यह सुओ मोटू मामला जुलाई 2025 में शुरू हुआ था, जब देशभर में कुत्तों के हमलों, विशेषकर बच्चों पर हमलों की कई घटनाएं सामने आई थीं। कोर्ट ने तब से लगातार इस मामले की निगरानी की और राज्यों को निर्देश दिए कि वे ABC नियमों के तहत कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण सुनिश्चित करें। हालांकि, अगस्त 2025 में कोर्ट ने पाया कि तीन महीने का समय देने के बावजूद ज्यादातर राज्यों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इस पर बेंच ने राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब करने का कड़ा कदम उठाया था।







