गोपाल परिहार
नई दिल्ली : नया वर्ष सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नए संकल्प, नए लक्ष्य और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। भारत में भी हर वर्ष यह परंपरा देखने को मिलती है। किंतु सनातन परंपरा में वर्ष का अंत और आरंभ कभी भी चुपचाप या केवल तिथि-आधारित नहीं रहा है। भारतीय कालगणना ऋतु परिवर्तन, सूर्य-चंद्र गति और प्राकृतिक संकेतों पर आधारित रही है, जो इसे पूर्णतः वैज्ञानिक बनाती है।
इसके विपरीत, भारत में 31 दिसंबर को नववर्ष का आयोजन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार किया जाता है, जिसका भारतीय सांस्कृतिक और प्राकृतिक संदर्भों से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेखक इस स्थिति की तुलना प्रतीकात्मक रूप से “कबूतरों के ज्ञान” से करते हैं—अर्थात ऐसा ज्ञान, जो विदेशी प्रभावों से आया है और जिसने स्थानीय, सनातन परंपराओं को हाशिये पर डाल दिया है।
आज के समय में यह रूपक और भी स्पष्ट हो जाता है। देश के अधिकांश शहरों में सीमेंट के जंगल खड़े हो चुके हैं। बहुमंज़िला इमारतों, सोसायटियों और सीढ़ी-घरों पर कबूतरों का कब्ज़ा आम दृश्य बन गया है। हर ओर उन्हीं की आवाज़ और उपस्थिति दिखाई देती है, जबकि कभी भारतीय वातावरण की पहचान रही कोयल, तोते और अन्य पक्षी धीरे-धीरे अदृश्य होते जा रहे हैं।
लेख के अनुसार, आधुनिक राजनीति और शहरीकरण ने ऐसे निर्माणों को बढ़ावा दिया है, जिनमें संरक्षण प्राप्त कबूतरों ने अपना स्थायी स्थान बना लिया है। परिणामस्वरूप, भारतीयता और सनातन परंपराओं को मानने वाले लोग और उनके सांस्कृतिक प्रतीक पीछे छूटते जा रहे हैं।
इसी संदर्भ में 31 दिसंबर के नववर्ष आयोजन को लेखक “कबूतरों का नववर्ष” बताते हैं, न कि सनातन परंपरा का। उनका तर्क है कि भारत का नववर्ष वही होना चाहिए, जो प्रकृति, ऋतु और भारतीय कालगणना के अनुरूप हो—जैसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, जो वास्तव में जीवन और सृष्टि के नवचक्र का प्रतीक है।







