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अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 20, 2026
in विशेष, विश्व
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donald trump
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prahlad sabnaniप्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली: अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है। साथ ही, इसी क्रम में डेनमार्क द्वारा शासित ग्रीनलैंड द्वीप पर भी अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है।

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सोचनीय विषय है कि डेनमार्क नाटो का सदस्य देश होने के चलते वह अमेरिका का मित्र राष्ट्र है और मित्र राष्ट्र की सीमाओं में घुसकर उसके आधिपत्य वाले क्षेत्र को अमेरिका द्वारा बलपूर्वक अपने देश की सीमा में शामिल करने का प्रयास करना उचित कदम नहीं कहा जा सकता है। कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कनाडा के राष्ट्रपति को धमकी दी थी कि अमेरिका कनाडा को अपना 51वां राज्य बनाना चाहते हैं। ध्यान रहे कनाडा भी अमेरिका के मित्र राष्ट्र के देशों की सूची में शामिल है। परंतु, जब अमेरिका जैसा देश साम्राज्यवादी सोच के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं, तो मित्र राष्ट्र का ध्यान भी नहीं रह पाता है।

अमेरिका द्वारा हाल ही में ब्रिक्स के सदस्य देशों (भारत, रूस, चीन एवं ब्राजील) पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी देना केवल अमेरिका की व्यापार नीति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की सीधी कोशिश है। 500 प्रतिशत का यह टैरिफ रूस, चीन, ब्राजील और भारत पर नहीं बल्कि ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा डीडोलराईजेशन की ओर अपने कदम बढ़ाने को रोकने का एक प्रयास है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में किए जाने वाले विदेश व्यापार का एक दूसरे को भुगतान अब स्थानीय मुद्रा में करते दिखाई दे रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर पर दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा हैं।

ब्रिक्स की मुद्रा व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा व्यापार सम्बंध एवं डॉलर मुक्त भुगतान व्यवस्था अमेरिका के लिए एक रणनीतिक खतरे के रूप में उभर रही है। इसीलिए अमेरिका छोटे देशों की तरह ही बड़े देशों को भी अनुशासित करना चाहता है। परंतु, यहां अमेरिका यह भूल जाता है कि वेनेजुएला, डेनमार्क, क्यूबा, मेक्सिको आदि छोटे देश हैं जो अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं परंतु भारत, चीन, रूस एवं ब्राजील जैसे बड़े देशों पर अमेरिका का दबाव काम नहीं कर पाएगा। ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान विदेश नीति को 20वीं सदी की “हस्तक्षेपवाद.2” की नीति कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले 250 वर्षों में अमेरिका ने विश्व के अन्य देशों में 400 बार हस्तक्षेप किया है।

अमेरिका के लिए यह एक पैटर्न है आश्चर्य में डालने वाली घटना नहीं है। अमेरिका ने पूर्व में भी आर्थिक दबाव डालकर एवं सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन कराने में भी सफलता हासिल की है। और, यह पैटर्न आज भी जारी है। अमेरिका भारत एवं चीन पर केवल इस कारण से भी 500 प्रतिशत टैरिफ लगाना चाहता है क्योंकि ये देश रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। आज के इस युग में अब अमेरिका निर्णय लेगा कि किस देश को कच्चा तेल किस देश से खरीदना है। यह साम्राज्यवाद अथवा अधिनायकवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है?

इसी प्रकार, ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व के 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका की सदस्यता को समाप्त करना भी वैश्विक व्यवस्था का पुनर्निर्माण नहीं बल्कि अमेरिका का विश्व में एक छत्र राज्य स्थापित करने की सोच का नतीजा हो सकता है। अमेरिका किसी भी अन्य ब्लाक अथवा देश के साथ मिलकर विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता है बल्कि अमेरिका केवल अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इस रणनीति के अंतर्गत वैश्विक संगठनों एवं संस्थाओं को कमजोर करने के एकपक्षीय अमेरिकी शक्ति मॉडल को लागू करना ही मुख्य लक्ष्य हो सकता है।

आज अमरीका में ट्रम्प प्रशासन इससे भी परेशान है कि आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिमी देशों से पूर्वी देशों की ओर खिसकता जा रहा है। इससे ट्रम्प को पूरे विश्व में अमेरिका का आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति को धक्का लगता हुआ दिखाई दे रहा है। संख्या, जनसंख्या, संसाधन एवं बाजार के आधार पर आगे आने वाला भविष्य पूर्व के आस पास दिखाई देता है, अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता है। अमेरिका आज नहीं चाहता कि चीन, रूस एवं भारत मिलकर विश्व में शक्ति की एक धुरी बनें। साथ ही, ट्रम्प यह भी नहीं चाहता कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक स्वायतत्ता बढ़ाने में सफल हो तथा डीडोलराईजेशन की व्यवस्था गति पकड़े और यूरोपीय यूनियन के देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए।

यूरोपीय यूनियन के देशों पर अमेरिका अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। परंतु, अब तो यूरोपीय यूनियन के देश भी अपने सुरक्षा बजट में अतुलनीय वृद्धि करते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि अमेरिका पर इन देशों का विश्वास कम हो गया है। ट्रम्प चूंकि बहुध्रुवीय व्यवस्था में विश्वास नहीं करते है और यह व्यवस्था उनके लिए असहनीय है अतः ट्रम्प समस्त देशों पर टैरिफ युद्ध छेड़कर उन्हें दबाव में लाना चाहते है ताकि अमेरिका पूरे विश्व में अपना एक छत्र राज्य स्थापित कर सके। इसीलिए ट्रम्प आज पूरे विश्व में नियंत्रित अशांति चाहता है। दरअसल, आज अमेरिका की आक्रामक साम्राज्यवादी टैरिफ नीति भी वैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी जड़ के रूप में उभर रही है।

इसी क्रम में, अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्यवाही कर ग्रीनलैंड पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कार्यवाही नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान को तोड़ सकती है। नाटो के सदस्य देशों ने स्पष्ट रूप से कहा भी है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड पर हमला नाटो के सदस्य देशों पर किया गया हमला माना जाएगा। इससे यूरोपीयन देशों एवं अमेरिका के बीच दुर्लभ एवं खतरनाक तनाव दिखाई दे रहा है।

वैश्विक स्तर पर वर्तमान में उभर रही परिस्थितियों को सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध में कच्चे तेल की उपलब्धता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना, डॉलर पर अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने के प्रयास ताकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका का मुद्रा पर नियंत्रण लगातार आगे भी बना रहे, समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना, तकनीकी सम्पदा को अपने कब्जे में रखना, वैश्विक सप्लाई चैन को प्रभावित करना एवं आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स आदि के माध्यम से ट्रम्प अन्य देशों पर दबाव बनाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

इसलिए आज प्रत्यक्ष युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संरचना को पुनर्गठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस रचना में ट्रम्प अपने आप को वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में अमेरिका चाहता है कि दुनिया फिर से उसी मोड में लौट आए, जहां वित्त, व्यापार, सैन्य गठबंधन और तकनीक सब उसकी चौखट पर खड़े हों। आज अमेरिका का लक्ष्य सम्भवत: तीसरा विश्व युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका के प्रभुत्व में पुनर्गठित करना है।

अमेरिका का 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपने आप को अलग करने के क्रम में अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस से बाहर निकलना पूरे विश्व को स्पष्ट संदेश देता है कि अमेरिका की अब पर्यावरण के क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों में भी कोई दिलचस्पी नहीं है तथा वह इस अलायंस को दी जाने वाली अमेरिकी मदद को रोकना चाहता है और वैश्विक स्तर पर केवल अपने प्रभाव को बढ़ाने में ही अपनी पूरी शक्ति लगाना चाहता है। विश्व के भले की बात भी अब अमेरिका को नागवार गुजर रही है। जबकि आज जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट को कम करने अथवा दूर करने में समस्त देशों का आपसी सहयोग अति आवश्यक है।

भारत एवं फ्रान्स के संयुक्त नेतृत्व में बनाया गया यह मंच विकासशील देशों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है। विश्व के अन्य देशों में यह भावना विकसित हो रही है कि आज वैश्विक स्तर पर एक ऐसी दुनिया विकसित होती दिखाई दे रही है जिसमें अमेरिका अकेला खड़ा हो एवं विश्व के अन्य समस्त देश आपस में तालमेल रखते हुए अपने विकास को गति दें। वैसे भी, विश्व पहिले से ही इस मुहाने पर आकार खड़ा है जहां अकेले चलना बहुत मुश्किल है हर पग पर विभिन्न देशों को अन्य देशों के सहायता की अति आवश्यकता है। एक दूसरे के सहयोग के बिना सम्भवत: कोई भी देश आज आर्थिक विकास के पथ पर अपनी दौड़ को गति प्रदान नहीं कर पाएगा। इसीलिए वैश्विक स्तर पर आज नए नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर ये देश आपस में मुक्त व्यापार समझौते तेजी से सम्पन्न कर रहे हैं ताकि ये, अपने देश के आर्थिक विकास की गति को तेज कर सकें।

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