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Home राजनीति

UGC : कहीं यूपी में खराब न हो जाए बीजेपी का सियासी गेम?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 30, 2026
in राजनीति, राज्य
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UGC
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नई दिल्‍ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है. बीजेपी के नेता कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन क्या इससे पार्टी की चुनौती खत्म हो गई है? यूजीसी के नए नियम का विरोध करने वाले सवर्ण जाति के संगठन और छात्र सिर्फ कोर्ट के स्टे से संतुष्ट नहीं है. उनका कहना है कि यूजीसी के नियम जब पूरी तरह से वापस नहीं ले लिए जाते, तब तक विरोध करते रहेंगे.

यूजीसी का विवाद बीजेपी के गले की फांस बन गया है, जो अब उसे न उगलते बन रहा और न निगलते. सुप्रीम कोर्ट के रोक के बावजूद करणी सेना, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा और ब्राह्मण महासभा से लेकर परशुराम सेना तक सड़क से सोशल मीडिया तक अपनी लड़ाई जारी रखने की बात कह रहे हैं. इससे साफ है कि बीजेपी की मुसीबत अभी खत्म नहीं होने वाली?

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यूजीसी को लेकर विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र उत्तर प्रदेश रहा है. यूपी बीजेपी के अंदर ही इसका जमकर विरोध रहा. पार्टी के कई स्थानीय और जिला स्तर के नेताओं और पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया. सवर्णों की बढ़ती नाराजगी को लेकर बीजेपी के नेता कशमकश में फंसे हुए नजर आ रहे हैं और सपा से बसपा तक के सधे हुए बयान देकर सियासी दांव चल रहे हैं?

बीजेपी के गले की फांस बना यूजीसी विवाद

सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद अब सरकार को जवाब देना है. अगर बीजेपी सरकार यूजीसी के नए नियमों को सही बताती है तो सवर्णों की नाराजगी झेलनी होगी. सवर्ण संगठन 19 मार्च तक अपने आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया है. सवर्ण संगठनों में राजपूत समाज से लेकर ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य, खत्री ही नहीं बल्कि मुसलमानों के सवर्ण जाति के संगठन शामिल हैं.

वहीं, अगर सरकार नियमों को वापस लेने का कदम उठाती है तो फिर एससी, एसटी, ओबीसी की तरफ से विरोध झेलना पड़ सकता है. ऐसे में यूजीसी के नए नियम को लेकर बीजेपी दोहराए पर खड़ी है. एक तरफ बीजेपी का अपने परंपरागत वोटर सवर्ण है तो दूसरी तरफ दलित-ओबीसी को साधे रखने की चुनौती है. ऐसे में बीजेपी के लिए सियासी बैलेंस बनाए रखने का चुनौती बन गया है.

बीजेपी के सवर्ण नेता कशमकश में फंसे

बीजेपी का शुरू से ही सामाजिक आधार सवर्ण जाति के वोटर रहे हैं. बीजेपी सत्ता में नहीं थी, तब भी उसे सवर्णों का अच्छा खासा वोट मिलता रहा. यूजीसी के नए नियमों को लेकर विरोध सवर्ण संगठन कर रहे हैं. बीजेपी के भीतर ही लोगों का मानना है कि इससे बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है. बीजेपी के एक नेता ने कहा कि हमें अपने समर्थकों को समझाना मुश्किल हो रहा है और अगर हम विरोध नहीं करेंगे तो हमारे समर्थक हम पर ही सवाल उठाएंगे.

बीजेपी एक मौजूदा विधायक ने भी कही है. उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी जिस तरह से अपने परंपरागत सवर्ण वोटों को पूरी तरह से नजर अंदाज कर रही है, उससे समाज में बेचैनी पहले से थी और अब यूजीसी विवाद ने उसे और भी बढ़ा दिया है. बीजेपी के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह से लेकर उनके बेटे प्रतीक भूषण और विधायक अभिजीत सिंह सांगा सहित डा. संजय सिंह तक यूजीसी के नए नियम का विरोध किया है. बीजेपी नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही स्टे दे दिया हो, लेकिन विरोध अभी भी जारी है.

यूपी में बीजेपी का गेम न खराब कर दे?

यूपी की सियासत पूरी तरह से जातियों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है और यूजीसी विवाद ने नई लकीरें खींच दी हैं. सूबे की आबादी में सवर्ण जातियां ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य को मिलाकर करीब 22 फीसदी के साथ महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं. यह पारंपरिक रूप से बीजेपी का माना जाता है, लेकिन इस विवाद ने उन्हें नाराज कर दिया है, क्योंकि वे नियमों को रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन के रूप में देखते हैं. जनरल कटैगरी के युवाओं का कहना है कि ये नए नियम जनरल कटैगरी के खिलाफ हैं और इससे रिवर्स भेदभाव शुरू हो जाएगा.

राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि सवर्णों में ब्राह्मण पहले से ही नाराज था और अब यूजीसी विवाद ने ठाकुर से लेकर कायस्थ सहित सभी सवर्ण जाति को भी नाराज कर दिया है, जो बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकता है. 2014 से लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सवर्ण जातियों ने बीजेपी को मजबूत किया था, लेकिन अब असंतोष बढ़ रहा है. यूजीसी के नए नियम को लेकर बीजेपी के खिलाफ सवर्णों की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है, जिसका नुकसान उसे उठाना पड़ सकता है, क्योंकि यह मामला घर-घर तक पहुंच गया है.

यूपी में सवर्ण जातियां वोटरों के लिहाज से 2027 के विधानसभा चुनाव अब एक निर्णायक मोड़ पर हैं. सबे में 22 फीसगी सवर्ण जातियों में ब्राह्मण 10 प्रतिशत, ठाकुर/राजपूत 6 फीसदी, 4 फीसदी वैश्य और दो फीसदी अन्य सवर्ण जातियां हैं. सवर्ण जातियों 80 प्रतिशत वोट बीजेपी को मिला. अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव है. यूपी में पहले ही ब्राह्मण समाज के लोग बीजेपी से नाराज बताए जा रहे थे. बीजेपी के भीतर भी ब्राह्मण नेताओं का ग्रुप बन गया था और उन्होंने अपनी मीटिंग भी की थी और पूरे सवर्ण समाज के लोग सड़क पर उतर गए हैं.

2027 में बीजेपी कैसे मुसीबत से पार पाएगी?

सुप्रीम कोर्ट के स्टे का स्वागत करते हुए करणी सेना से लेकर परशुराम सेना तक और अलग अलग ब्राह्मण समाज के संगठन कह रहे हैं कि ये सिर्फ आधी जीत है. साथ ही ये भी कि जब तक पूरे नियम वापस नहीं ले लिए जाते लड़ाई जारी रहेगी. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के महामंत्री राघवेंद्र सिंह राजू कहते हैं कि यूपी में 46 सवर्ण संगठन एक साथ मिलकर यूजीसी के नए नियम का विरोध कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद भी हम अपना विरोध 19 मार्च तक जारी रखेंगे, क्योंकि सवर्ण बीजेपी के साथ है, पर बीजेपी सवर्णों के साथ नहीं है.

राघवेंद्र सिंह राजू कहते हैं कि सवर्ण जातियों के सब्र का इम्तेहान कब तक बीजेपी लेती रहेगी. बीजेपी सिर्फ दलित और ओबीसी को ही खुश करने में लगी है, लेकिन सवर्णों के हक माना अब समाज को बर्दाश्त नहीं हो रहा है. इसीलिए ठाकुर, ब्राह्मण ही नहीं कायस्थ और मुसलमानों के पठान महासभा भी हमारे साथ विरोध में उतर गई है. यूजीजी के नए नियम बनाकर बीजेपी ने अपना बहुत बड़ा नुकसान कर लिया है. 2024 में राजपूत समाज ने यूपी में बीजेपी का गेम बिगाड़ा था और 2027 में सवर्ण जातियां खिलाफ को दरकिनार करने का खामियाजा भुगतना होगा.

राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो अगड़ी जातियां अगर बीजेपी से दूर हुईं, तो उसे पूर्वांचल और अवध क्षेत्र तक के क्षेत्र में 10 से 15 फीसदी वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है. 2022 में ब्राह्मण वोटों ने 50 से ज्यादा सीटें दिलाई थीं और ठाकुर वोटों के चलते 45 सीटें मिली थी, लेकिन अब यह असंतोष 2027 में उलटा असर दिखा सकता है. विपक्ष इसे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन का मुद्दा बन गया है. इसीलिए विपक्ष बहत सधे हुए तेवर के साथ अपने रिएक्शन दिए हैं ताकि अगड़ी जातियों को अपनी ओर खींचा जा सके.

सपा और बसपा खेल रही सधा दांव

यूजीसी के मुद्दे पर एक तरफ जहां बीजेपी नेता सुप्रीम कोर्ट के स्टे का क्रेडिट अपने नेताओं को दे रहे हैं वहीं सोशल मीडिया में लगातार विरोध कर रहे लोग सवाल उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि स्टे का क्रेडिट बीजेपी को या उसके नेताओं को बिल्कुल नहीं जाता. यूजीसी के नियम सरकार और बीजेपी के गले की फांस बनते दिख रहे हैं. जहां विपक्ष के लोग इन नियमों को असंवैधानिक बता रहे हैं या फिर और चर्चा की जरूरत बता रहे हैं. विपक्ष ने सरकार पर वार करने के लिए तैयार है. सपा से लेकर बसपा और टीएमसी ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यूजीसी के रोक लगाए जाने पर कहा कि सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं होता है, माननीय न्यायालय यही सुनिश्चित करता है. कानून की भाषा भी साफ होनी चाहिए और भाव भी. बात सिर्फ नियम नहीं, नीयत की भी होती है. न किसी का उत्पीड़न हो, न किसी के साथ अन्याय. न किसी पर जुल्म-ज्यादती हो, न किसी के साथ नाइंसाफी.’

बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का आदेश उचित है, क्योंकि इन नए नियमों से सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था. देश के अलग-अलग हिस्सों में इन नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे. यूजीसी ने देश भर के सरकारी और प्राइवेट विश्वविद्यालयों में जाति आधारित घटनाओं को रोकने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिससे सामाजिक तनाव का माहौल बन गया है. मौजूदा स्थिति को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट का UGC के नए नियमों पर रोक लगाने का फैसला उचित है.उन्होंने कहा कि देश में सामाजिक तनाव का ऐसा माहौल नहीं बनता, अगर यूजीसी नए नियमों को लागू करने से पहले सभी हितधारकों को भरोसे में लिया होता. इसे सवर्ण वोटों को साधने का दांव माना जा रहा है.

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