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Home राष्ट्रीय

ये है भारत के भविष्य का ‘सिंगापुर’ और चीन को जवाब भी!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 17, 2026
in राष्ट्रीय
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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
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नई दिल्ली: अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सबसे निचले द्वीप ग्रेट निकोबार पर बनने जा रहे देश के सबसे बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की हरी झंडी मिल गई है. सोमवार को ट्रिब्यूनल ने करीब 90,000 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर भारत को एक बहुत बड़े कारोबारी ही नहीं, सैन्य लिहाज से रणनीतिक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का मौका दिया है. इस प्रोजेक्ट का कांग्रेस पार्टी सोनिया गांधी के नेतृत्व में विरोध कर रही थी. खासतौर पर पर्यावरण, जीव जंतुओं और स्थानीय जनजातियों के भविष्य के हवाले से.

हिंद महासागर के बीचोंबीच एक ऐसा द्वीप है, जिसके नाम पर इन दिनों दिल्ली से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक चर्चा है. नाम है ग्रेट निकोबार आईलैंड (Great Nicobar Island). भारत सरकार यहां एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही है, जिसे अक्सर गेमचेंजर कहा जा रहा है. लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वहां क्या बनेगा. असली बहस इस पर है कि क्यों बनेगा, किसके लिए बनेगा, और इसकी कीमत कौन चुकाएगा? यह पूरा मामला समझने के लिए इसे हिस्सों में देखना जरूरी है.

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कहां है ग्रेट निकोबार और क्यों खास है?

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप है ग्रेट निकोबार. यह मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब है. मलक्का स्ट्रेट वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के 30-40 फीसदी हिस्से का शिपिंग और कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है. यह दुनिया में इंग्लिश चैनल के बाद दूसरा सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है. चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से यूरोप और पश्चिम एशिया जाने वाला समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है. यही वजह है कि इस इलाके को हिंद महासागर की ‘चोक पॉइंट पॉलिटिक्स’ का केंद्र माना जाता है. जो यहां मजबूत है, उसकी समुद्री पकड़ मजबूत है.

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में क्या-क्या बनेगा?

सरकार की योजना के कई डायमेंशन है. कुल 166 वर्ग किमी के इस प्रोजेक्ट में 130 वर्ग किमी का एरिया जंगली इलाके में है. जिसका डायर्शन होगा. प्रोजेक्ट में चार बड़े फोकस एरिया हैं-

  1. इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल- एक गहरा समुद्री पोर्ट, जहां बड़े-बड़े कंटेनर जहाज रुक सकें.
  2. ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट- सैन्य और सिविल इस्तेमाल, दोनों के लिए.
  3. 450 मेगा वॉट का पावर प्लांट- ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए.
  4. नई टाउनशिप- लाखों की आबादी बसाने की क्षमता वाला शहर.

सरकार का तर्क है कि इससे भारत की सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी पोर्ट्स पर निर्भरता कम होगी. आज भारत का बड़ा कंटेनर ट्रांसशिपमेंट सिंगापुर, कोलंबो और दुबई जैसे बंदरगाहों से होकर गुजरता है.

आर्थिक फायदा क्या होगा?

भारत लंबे समय से एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बनने की कोशिश कर रहा है. लेकिन लॉजिस्टिक्स कॉस्ट अभी भी ज्यादा है. अगर ग्रेट निकोबार में एक आधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनता है, तो कंटेनर सीधे यहां शिफ्ट हो सकते हैं. समय और लागत दोनों कम होंगे. भारत को समुद्री व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है, और हजारों रोजगार पैदा हो सकते हैं. सरकार का दावा है कि यह प्रोजेक्ट आने वाले दशकों में अरबों डॉलर के आर्थिक अवसर पैदा कर सकेगा.

स्ट्रैटेजिक एंगल: सिर्फ कारोबार नहीं, सिक्योरिटी भी

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ व्यापार की कहानी नहीं है. यह रणनीति की भी कहानी है. हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी पिछले दशक में तेजी से बढ़ी है. चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, पाकिस्तान के ग्वादर और म्यांमार के क्यौकफ्यू जैसे पोर्ट्स में निवेश किया है. भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने समुद्री हितों की रक्षा करे. ग्रेट निकोबार की लोकेशन भारत को मलक्का स्ट्रेट के सामने एक मजबूत रणनीतिक आधार देती है. जरूरत पड़ने पर यहां से निगरानी और सैनिक एक्शन दोनों संभव हैं. इसे इंडो-पैसिफिक रणनीति के बड़े फ्रेमवर्क में भी देखा जा रहा है.

पर्यावरण की चिंता: क्या दांव पर है?

अब कहानी का दूसरा पक्ष. ग्रेट निकोबार कोई खाली जमीन नहीं है. यह घने जंगलों, मैंग्रूव, कोरल रीफ और दुर्लभ जीवों का घर है. यह इलाका बायोस्फीयर रिजर्व घोषित है. यहीं पर दुर्लभ लेदरबैक कछुए प्रजनन करते हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, कोस्टल इकोसिस्टम प्रभावित होगा और समुद्री जीवन को खतरा होगा. क्लाइमेट चेंज के दौर में जब समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है, तब इतने बड़े तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम भी बड़ा है.

इन्हीं सब चिंताओं को समेट सोनिया गांधी ने एक विस्तृत लेख भी लिखा था. जिसमें पर्यावरण, जीव जंतुओं और स्थानीय जनजाति के भविष्य की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया. सरकार का कहना है कि सभी पर्यावरणीय मंजूरियां ले ली गई हैं और ‘मिटिगेशन प्लान’ तैयार है. जिसमें किसी भी तरह के नुकसान से बचाव का खाका तैयार किया गया है. लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई है.

आदिवासी समुदाय का क्या होगा?

ग्रेट निकोबार सिर्फ जैव विविधता का केंद्र नहीं है, बल्कि यहां शोंपेन और निकोबारी जैसी जनजातियां भी रहती हैं. ये समुदाय सदियों से यहां की प्रकृति के साथ संतुलन में जीते आए हैं. बड़े पैमाने पर विकास का मतलब है बाहरी आबादी का आना. और नए सोशल स्ट्रक्चर का मतलब है पारंपरिक जीवनशैली पर असर. सरकार का कहना है कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा की जाएगी. लेकिन विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या इतना बड़ा प्रोजेक्ट बिना कल्चर पर असर डाले संभव है?

पर्यावरणविदों की सबसे बड़ी चिंता ग्रेट निकोबार द्वीप पर रहने वाले शोंपेन आदिवासियों को लेकर है, जिनकी तादाद 200 से 300 के बीच ही है. आशंका जताई जा रही है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा खतरा विलुप्त होने की कगार पर खड़ी इस जनजाति पर ही मंडरा रहा है.

विकास बनाम संरक्षण: असली टकराव

यह बहस नई नहीं है. एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास का तर्क है. दूसरी तरफ पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंता. क्या भारत अपने रणनीतिक हितों के लिए पर्यावरण के जोखिम उठा सकता है? क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन संभव है? यह वही क्लासिक बहस है जो बड़े बांधों, हाईवे और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट में पहले भी देखी गई है.

बजट और प्रोजेक्ट की टाइमलाइन

इस परियोजना की अनुमानित लागत कई अरब डॉलर बताई जा रही है. इस पूरे प्रोजेक्ट की इंचार्ज ANIIDCO (Andaman and Nicobar Islands Integrated Development Corporation) के मुताबिक पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 90 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे. ये प्रोजेक्ट कई चरणों में पूरा होगा. पहले चरण में पोर्ट और एयरपोर्ट पर फोकस रहेगा. उसके बाद टाउनशिप और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी. सरकार इसे 2040 तक एक पूर्ण विकसित समुद्री और लॉजिस्टिक हब के रूप में देख रही है.

क्या यह भारत का सिंगापुर बनेगा?

इस प्रोजेक्ट के समर्थक कहते हैं कि अगर सिंगापुर एक छोटे द्वीप से वैश्विक व्यापार केंद्र बन सकता है, तो भारत क्यों नहीं? लेकिन आलोचक कहते हैं कि हर द्वीप सिंगापुर नहीं बन सकता. वहां दशकों की स्थिर नीति, निवेश और भौगोलिक स्थिति का कॉम्बिनेशन था. ग्रेट निकोबार को भी उसी स्तर के लांग टर्म प्लान, पारदर्शिता और पर्यावरण संतुलन की जरूरत होगी. फिलहाल परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है. प्रारंभिक काम शुरू हो चुका है. लेकिन अदालतों, पर्यावरण समूहों और रणनीतिक विशेषज्ञों की नजर इस पर बनी हुई है.

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं है. यह भारत की समुद्री सोच, उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षा और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता की परीक्षा भी है. आने वाले दशक में यह तय होगा कि यह परियोजना भारत को हिंद महासागर का मजबूत स्तंभ बनाती है या पर्यावरण और सामाजिक सवालों में उलझा देती है. फिलहाल इतना तय है कि ग्रेट निकोबार अब सिर्फ एक दूरस्थ द्वीप नहीं रहा. जहां भारत की सबसे दक्षिणी जमीन इंदिरा पाइंट मौजूद है. जिसका नजारा लेने कभी भारत के प्रधानमंत्री ओर कुछ पर्यटक जाया करते रहे हैं. यह भारत की समुद्री राजनीति का केंद्र बन रहा है.

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