नई दिल्ली: ग्लोबल इकोनॉमी इस साल पहले ही उतार-चढ़ाव से गुजर रही है। इसी बीच एक नई रिसर्च रिपोर्ट ने पूरे दुनिया के बाजारों में हलचल मचा दी है। वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक निवेशकों में बेचैनी बढ़ गई है। इस रिपोर्ट को तैयार किया है सिट्रिनी रिसर्च (Citrini Research) ने और इसका नाम है- ‘द 2028 ग्लोबल इंटेलिजेंस क्राइसिस: ए थॉट एक्सरसाइज इन फाइनेंशियल हिस्ट्री, फ्रॉम द फ्यूचर’,
इस रिपोर्ट के बाद अमेरिका में आईबीएम के शेयरं में पिछले 25 सालों की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। भारत में भी आज 24 फरवरी को विप्रो, इंफोसिस और टीसीएस समेत कई बड़े टेक शेयरों में भारी गिरावट आई और ये सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले शेयरों में शामिल रहे।
आखिर यह रिपोर्ट क्या कहती है और इसे लेकर इतना डर क्यों है, इसे समझना जरूरी है। आइए जानते हैं इस रिपोर्ट से जुड़े पांच बड़े सवाल और उनके जवाब, जिनका जानना बेहद जरूरी हो गया है
सिट्रिनी रिसर्च क्या है?
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिट्रिनी रिसर्च एक छोटा रिसर्च ग्रुप है, जिसकी स्थापना सिर्फ तीन साल पहले, 2023 में हुई थी। इसके फाउंडर जेम्स वैन गीलन हैं। उन्होंने अपनी हेल्थकेयर कंपनी बेचने के बाद शेयर बाजार से जुड़े रिसर्च पेपर लिखना शुरू किया। गीलन को वजन घटाने की दवाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे विषयों पर लिखने के लिए जाना जाता है।
इस वायरल रिपोर्ट को लिखने में उनकी आलाप शाह ने की है, जो इस रिपोर्ट के को-ऑथर है। वे लोटस टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट में चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर (CIO) हैं।
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि यह भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि एक “संभावित अनुमानों” का अध्ययन है। इसमें बताया गया है कि अगर AI का मौजूदा विस्तार इसी तरह जारी रहा, तो कौन-कौन सी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसका मकसद डर फैलाना नहीं, बल्कि एक ऐसे संभावित हालात का मॉडल पेश करना है, जिस पर अब तक कम चर्चा हुई है।
भारत को लेकर सिट्रिनी रिसर्च की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
सिट्रिनी रिसर्च की रिपोर्ट ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर काफी निराशाजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2028 की पहली तिमाही में भारत को इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) के साथ प्रारंभिक बातचीत करनी पड़ सकती है। यह संकेत देता है कि आर्थिक हालात दबाव में आ सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का आईटी सेक्टर अब तक कम लागत यानी सस्ती सेवाओं के मॉडल पर टिका रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते असर से कोडिंग और सॉफ्टवेयर सेवाओं का पारंपरिक बिजनेस मॉडल बदल सकता है। रिपोर्ट का दावा है कि एआई कोडिंग टूल्स की लागत बहुत कम हो गई है, लगभग बिजली के खर्च जितनी। इसके चलते 2027 तक TCS, इंफोसिस और विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट रद्द होने की रफ्तार बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले दो सालों में रुपया और कमजोर हो सकता है। इसमें दावा किया गया है कि सर्विस एक्सपोर्ट घटने पर रुपये में चार महीनों में डॉलर के मुकाबले 18% तक गिरावट आ सकती है।
नौकरियों पर क्या असर होगा?
रिपोर्ट का मुख्य संदेश यह है कि भविष्य में बड़ी संख्या में नौकरी छंटनी होने वाली है और इसका सबसे ज्यादा असर सफेदपोश (वाइट-कॉलर) कर्मचारियों पर पड़ेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंसानों के लिए कोई नौकरी नहीं बचेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर सर्विस सेक्टर अब एआई कोडिंग टूल्स के जरिए संचालित होगा, लेकिन इंसानों की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होगी। AI नई नौकरियां भी बनाएगा, जिनमें इंसानों की भूमिका होगी। उदाहरण के लिए, रिपोर्ट कहती है कि “प्रॉम्प्ट इंजीनियर”, “AI सेफ्टी रिसर्चर” और “इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नीशियन” जैसी नई भूमिकाएं सामने आएंगी। लेकिन हर नई नौकरी के बदले कई पारंपरिक नौकरियां खत्म हो सकती हैं और नए कामों की सैलरी पुराने कामों की तुलना में काफी कम होगी।
सरकारें क्या कर सकती हैं?
दुनिया की अर्थव्यवस्था अभी भी AI क्रांति के पूरे असर को समझने की कोशिश कर रही है। रिपोर्ट के को-ऑथर आलाप शाह ने ब्लूमबर्ग टीवी को इंटरव्यू में कहा कि देशों को AI से होने वाले बदलाव को संतुलित करने के लिए नया AI टैक्स लागू करने पर विचार करना चाहिए।
शाह के मुताबिक, जैसे-जैसे लोग अपनी नौकरियां खोते जाएंगे, उपभोक्ता खर्च कम होगा और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। ऐसे में AI के बढ़ते इस्तेमाल से होने वाले अतिरिक्त लाभ पर टैक्स लगाने से सरकारें नई नीतियां और सामाजिक ढांचा तैयार कर सकती हैं, जो इस स्तर के बदलाव को संभाल सके।
करीब भविष्य में, शाह ने यह भी कहा कि बाजार में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं, खासकर सॉफ्टवेयर कंपनियों में, क्योंकि निवेशक AI के लॉन्ग-टर्म असर का आकलन करेंगे। उन्होंने कहा, “हम बाजार के लिहाज से बहुत अस्थिर समय में प्रवेश कर रहे हैं।”







