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क्या होता है फास्ट ट्रैक कोर्ट और क्यों हुआ था इसका गठन?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 23, 2026
in राष्ट्रीय
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court
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नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन के बीच पेपर लीक के मामले में सख्ती दिखाते हुए सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया है. सरकार का कहना है कि दोषियों को जल्दी और कड़ी सजा दिलाने के लिए छात्रों के हित में ये फैसला लिया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि नीट पेपर लीक मामले की सुनवाई और उनके दोषियों को सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा.उन्होंने इसकी जानकारी अपने एक्स पोस्ट में दी.

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अब सवाल ये है कि जब भारत में पहले से सुप्रीम कोर्ट(सर्वोच्च न्यायालय) , हाई कोर्ट(उच्च न्यायालय) और सेशन कोर्ट (सत्र न्यायालय) हैं तो फिर फास्ट-ट्रैक कोर्ट की जरूरत क्यों है? आइए समझते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है? और यह दूसरी अदालतों से कैसे अलग है?

क्यों पड़ी फास्ट-ट्रैक कोर्ट की जरूरत?

  • दरअसल, भारत की अदालतों में करोड़ों मामले लंबे समय से पेंडिंग हैं. ऐसे में लोगों को जल्दी न्याय दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) की व्यवस्था शुरू की गई. हालांकि इस कोर्ट की अपनी शर्तें है और काम करने का अपना तरीका है.
  • पहली बार साल 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर फास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court ) की शुरुआत की गई थी.
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐसी विशेष अदालतें होती है, जिनका उद्देश्य खास मामलों की जल्दी सुनवाई करना होता है.
  • फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थायी अदालतें नहीं होती हैं. इनका गठन एक निश्चित समय (fixed time) के लिए केंद्र या राज्य सरकार द्वारा हाई कोर्ट की सलाह पर किया जाता है.
  • हालांकि मामले की सुनवाई पूरी नहीं होने और समय खत्म होने पर इसकी समय सीमा आगे बढ़ा दी जाती है.
  • इन अदालतों के लिए सेवानिवृत्त (Retired) जजों या प्रमोटेड सीनियर जजों को नियुक्त किया जाता है ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त ट्रेनिंग के तुरंत मामलों का निपटारा कर सकें.

क्या हर मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में होती है ?

नहीं, हर मामले की सुनवाई इस कोर्ट में नहीं होती. इसके लिए पहले से कुछ निर्धारित मामले होते हैं. केवल गंभीर और प्राथमिकता वाले मामलों को ही हाई कोर्ट वहां भेजता है.

कोई भी नागरिक सीधे फास्ट-ट्रैक कोर्ट में केस फाइल नहीं कर सकता. सबसे पहले एफआईआर (FIR) दर्ज होती है और चार्जशीट निचली अदालत (Session Court) में पेश की जाती है. फिर संबंधित राज्य का हाई कोर्ट तय करता है कि किन मामलों को तुरंत न्याय की आवश्यकता है.

यदि मामला महिलाओं-बच्चों के खिलाफ गंभीर हिंसा, राष्ट्रीय सुरक्षा, या समाज को झकझोर देने वाले किसी जघन्य अपराध से जुड़ा है, तो हाई कोर्ट उसे फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर कर देता है.

दूसरे अदालतों के मुकाबले यहां कैसे होती है जल्द सुनवाई

फास्ट-ट्रैक कोर्ट का अपना कोई अलग कानून नहीं होता, यह भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत ही काम करता है, लेकिन इसके काम करने का तरीका सख्त और अलग होता है. इस कोर्ट के पास भी अपराधियों को उम्रकैद से लेकर फांसी (मृत्युदंड) तक की सजा सुनाने का अधिकार होता है. हालांकि इसके फैसले के खिलाफ दोषी व्यक्ति को हाई कोर्ट में अपील करने का अधिकार होता है और वहां भी ऐसी अपीलों को प्राथमिकता दी जाती है.

प्रतिदिन सुनवाई

सामान्य अदालतों में एक सुनवाई के बाद दूसरी तारीख एक महीने बाद मिलती है. फास्ट-ट्रैक कोर्ट में प्रतिदिन सुनवाई होती है.

स्थगन (Adjournment) पर पाबंदी

सामान्य कोर्ट में वकील अलग-अलग कारण दे कर तारीख आगे बढ़ा लेते हैं. लेकिन फास्ट-ट्रैक कोर्ट में जज बिना किसी बेहद ठोस मेडिकल या कानूनी कारण के तारीख आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं देते.

समय सीमा की बाध्यता

फास्ट-ट्रैक कोर्ट में समय सीमा का खास ख्याल रखना पड़ता है. उदाहरण के लिए, पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत बनी फास्ट-ट्रैक अदालतों के लिए नियम है कि चार्जशीट दाखिल होने के 1 वर्ष के भीतर फैसला आ जाना चाहिए.

फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई से क्या फायदा होता है

अब एक सवाल ये भी आता है कि क्या कोई व्यक्ति अपने केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने की मांग कर सकता है? इसका जवाब है हां, यदि कोई पक्ष जल्दी सुनवाई चाहता है तो वह संबंधित हाई कोर्ट से उचित निर्देश देने की मांग कर सकता है. लेकिन अंतिम फैसला अदालत और लागू नियमों के आधार पर ही लिया जाता है. हालांकि अगर मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो रही है तो इसके कई फायदे हैं.

  • लंबित मामलों का बोझ कम करने में अदालत को मदद मिलती है.
  • पीड़ितों को अपेक्षाकृत जल्दी न्याय मिलने की संभावना बढ़ती है.
  • विचाराधीन कैदियों के मामलों में भी तेजी से सुनवाई हो सकती है.
  • संवेदनशील मामलों का जल्द निपटारा भी संभव होता है.

इन हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामलों की हो चुकी है सुनवाई

NEET-UG पेपर लीक विवाद मामलों की जल्द सुनवाई के लिए, विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन नया नहीं है. इससे पहले भी कई हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामलों की सुनवाई इस कोर्ट में हो चुकी है. देखिए इंफ्रोगाफिक..

यानी फास्ट-ट्रैक कोर्ट कोई नई व्यवस्था नहीं है। इससे पहले भी देश के कई चर्चित और संवेदनशील मामलों की सुनवाई इन्हीं अदालतों में हो चुकी है. और अब इस कोर्ट में नीट पेपर लीक मामले की सुनवाई होगी जो कि फिलहाल चर्चा का विषय बना हुआ है.

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