नई दिल्ली। भाजपा के संगठन में बड़ा बदलाव होने के बाद अब नजर केंद्र सरकार पर टिक गई है। पार्टी के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम सामने आ चुकी है। इसके बाद से ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार की चर्चा तेज है। यही वजह है कि कई भाजपा सांसद इन दिनों अपने संसदीय क्षेत्रों से ज्यादा दिल्ली में नजर आ रहे हैं।
दिल्ली में सांसदों की बढ़ी सक्रियता को सिर्फ मंत्रिमंडल की चर्चा से जोड़कर नहीं देखा जा रहा। एक और वजह संसद है। मॉनसून सत्र के बाद भी सरकार ने संसद को लेकर अपनी आगे की रणनीति साफ तौर पर बंद नहीं की है। ऐसे में विशेष सत्र या दोबारा सदन बुलाए जाने की संभावना ने भी सांसदों की बेचैनी बढ़ा दी है।
संगठन के बाद अब सरकार की बारी?
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम घोषित होने के बाद पार्टी के भीतर एक सवाल लगातार घूम रहा है, अब सरकार में अगला बड़ा बदलाव कब होगा? केंद्रीय मंत्रिपरिषद में कुछ पद खाली हैं। संगठन की नई टीम में जगह नहीं बना पाए कई नेताओं की नजर अब सरकार पर है। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि संगठन से बाहर हुए कुछ अनुभवी नेताओं को सरकार में जिम्मेदारी मिल सकती है।
यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार की हर नई तारीख की चर्चा सांसदों की उम्मीद बढ़ा देती है। हालांकि, अभी तक सरकार की तरफ से मंत्रिमंडल विस्तार की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल संभावना और राजनीतिक चर्चा के तौर पर ही देखना चाहिए।
संसद फिर बुलाने की तैयारी?
मामला सिर्फ मंत्रिमंडल तक सीमित नहीं है। संसद को लेकर भी राजनीतिक हलचल बनी हुई है। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों पर सरकार की नजर है। इन प्रस्तावों को लेकर संसद में पहले भी चर्चा हुई, लेकिन जरूरी बहुमत का गणित सरकार के सामने चुनौती बना रहा। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को जरूरी बहुमत नहीं मिल सका और उस पर आगे कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद विशेष सत्र की संभावना को लेकर भी चर्चा सामने आई थी। अगस्त में ऐसी रिपोर्टें आई थीं कि मॉनसून सत्र के बाद जरूरत पड़ने पर संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है, ताकि परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर आगे बढ़ा जा सके। यानी सांसदों के दिल्ली में रहने की एक वजह यह भी हो सकती है कि पार्टी और सरकार की तरफ से उन्हें किसी भी समय संसदीय गतिविधि के लिए तैयार रहना पड़ सकता है।
2027 के चुनाव से पहले यूपी पर नजर
इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश सबसे अहम कड़ी बनकर सामने आता है। 2027 की शुरुआत में यूपी समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में अगर केंद्र में मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तो यूपी को उसमें खास जगह मिलने की चर्चा स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिलाकर केंद्र में यूपी से जुड़े 11 मंत्री हैं। इनमें लखनऊ से सांसद और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सबसे बड़े नामों में हैं। राज्यसभा के रास्ते केंद्र में पहुंचे पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी यूपी से जुड़े हैं।
इसके अलावा बीएल वर्मा, एसपी सिंह बघेल, अनुप्रिया पटेल, जितिन प्रसाद, पंकज चौधरी, कमलेश पासवान और कीर्तिवर्धन सिंह भी केंद्र की टीम में यूपी का प्रतिनिधित्व करते हैं। अब सवाल यह है कि अगर विस्तार हुआ तो क्या यूपी से नए चेहरे भी शामिल होंगे?
लक्ष्मीकांत वाजपेयी की चर्चा, दिनेश शर्मा का पत्ता साफ
भाजपा के भीतर जिन नामों की चर्चा हो रही है, उनमें लक्ष्मीकांत वाजपेयी का नाम भी सामने आता रहा है। पार्टी में यह कयास लगाए जा रहे थे कि संगठन की नई टीम में जगह न पाने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को केंद्र सरकार में जिम्मेदारी दी जा सकती है।
पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा का नाम भी पहले मंत्रिमंडल की संभावित सूची से जोड़ा जाता रहा था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 5 सितंबर 2026 को डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का उपराज्यपाल नियुक्त कर दिया है। यानी अब उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल की संभावित सूची में रखना सही नहीं होगा।
तो सांसद दिल्ली में क्यों हैं?
पूरे घटनाक्रम को जोड़ें तो भाजपा सांसदों की दिल्ली में बढ़ी मौजूदगी के पीछे दो बड़े कारण दिखाई देते हैं। पहला, केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित विस्तार और फेरबदल। दूसरा, संसद को दोबारा बुलाए जाने या विशेष सत्र की संभावना।
संगठन की नई टीम बन चुकी है। अब सरकार और संसद से जुड़े अगले फैसले पर सबकी नजर है। यही वजह है कि भाजपा सांसद भी दिल्ली की राजनीतिक हलचल से दूरी नहीं बनाना चाहते। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पहले क्या होता है-मंत्रिमंडल का विस्तार या संसद का अगला सत्र? इसका जवाब सरकार के अगले कदम से ही साफ होगा।







