प्रकाश मेहरा
राजनीतिक विश्लेषक/ पत्रकार
नई दिल्ली: ‘राहुल गांधी की इस टिप्पणी को सिर्फ एक राजनीतिक हमला मानना भूल होगी। यह एक प्रवृत्ति है, जो भारतीय राजनीति में तेजी से जड़ पकड़ रही है- जहां वैचारिक असहमति अब मर्यादा की सीमाएं लांघने लगी है।’
राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति “तू-तड़ाक” वाली भाषा या व्यक्तिगत स्तर पर की गई टिप्पणियां केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक हताशा और निराशा को भी दर्शाती हैं। जब मुद्दों पर टक्कर नहीं मिलती, तब भाषा को अस्त्र बनाया जाता है।
क्या यह गांधी की विरासत है ?
यह बेहद अफसोसनाक है कि जो व्यक्ति महात्मा गांधी के नाम का उत्तराधिकारी है, उसकी राजनीति में भाषा का स्तर इस कदर गिर रहा है। महात्मा गांधी ने असहमति को भी संयम और शालीनता से व्यक्त किया, जबकि राहुल गांधी का राजनीतिक विमर्श टकराव और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों में बदलता जा रहा है।
संवैधानिक पद के प्रति सम्मान कहाँ है ?
प्रधानमंत्री का पद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है। उस पद के प्रति असम्मान केवल व्यक्ति विशेष पर नहीं, लोकतंत्र की संस्थाओं पर भी आघात है। विपक्ष का अधिकार है आलोचना करना, पर मर्यादाएं टूटती हैं तो लोकतंत्र की नींव भी हिलती है।
क्या ‘मोहब्बत की दुकान’ सिर्फ एक जुमला बनकर रह गई ?
जब राहुल गांधी ‘मोहब्बत की दुकान’ की बात करते हैं तो उम्मीद बनती है कि वह नफरत की राजनीति से हटकर एक नई भाषा देंगे। लेकिन जब उसी मंच से अभद्र भाषा और निजी हमले होते हैं — या खुद राहुल गांधी मर्यादा लांघते हैं — तो यह सवाल उठता है: “क्या यह ‘मोहब्बत’ सिर्फ दिखावे की राजनीति है?”
जनता सब देख रही है
जनता अब बहुत जागरूक है। उसे यह समझ आता है कि कौन तर्क से बोल रहा है और कौन तंज से। अगर राहुल गांधी सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं, तो उन्हें अपनी भाषा, विचार और व्यवहार — तीनों को दुरुस्त करना होगा।
अंत में मेरा कहना सिर्फ इतना है —”राजनीति में विरोध जरूरी है, लेकिन मर्यादा उससे भी ज़्यादा। अगर राहुल गांधी सच में बदलाव लाना चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपनी भाषा और पार्टी की कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। नहीं तो ‘मोहब्बत की दुकान’ को जनता ‘ढकोसले की दुकान’ कहने लगेगी।”