स्पेशल डेस्क
उत्तराखंड : अंकिता भंडारी हत्याकांड ने एक बार फिर देश के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या न्याय सत्ता के तराज़ू पर तौला जाएगा या सच के पैमाने पर। यह मामला केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है जो कानून, नैतिकता और राष्ट्रहित की बात तो करती है, पर संकट के समय मौन ओढ़ लेती है। जब इंसाफ़ की जगह प्रभाव काम करने लगे, तब सवाल उठाना अपराध नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी बन जाता है।
प्रकाश मेहरा की व्यंग्यात्मक कविता:-
मैं हमेशा कानून के साथ खड़ा रहा,
क़तार में नहीं — सच के साथ।
व्यवस्था बोली, सब ठीक है,
पर लहू ने बताया — सब झूठ था आज।
अंकिता कोई नाम नहीं था केवल,
वह एक घर का उजाला था।
पर ताक़त की आँधी में,
एक दीया चुपचाप बुझा दिया गया।
दोषी कौन है — यह मुद्दा नहीं,
दोषी अगर कोई है — यही काफ़ी है।
कुर्सी ऊँची हो या नाम भारी,
इंसाफ़ के आगे सब बराबरी है।
यह लड़ाई झंडों की नहीं है,
न नारों की, न चुनावी शोर की।
यह जंग है सच और अन्याय की,
जहाँ हार तय होती है मौन की।
आज चुप रहे तो याद रखना,
कल सवाल तुम्हारे दरवाज़े आएँगे।
और तब शायद,
न्याय की फ़ाइल में
तुम भी लंबित कहलाओगे।
सवाल पूछना देशद्रोह नहीं,
यह लोकतंत्र की साँस है।
गलत पर उँगली उठे नहीं अगर,
तो सही भी एक दिन लाश है।
न्याय हो — दिखावे का नहीं,
पूरी सच्चाई के साथ।
क्योंकि इंसाफ़ पार्टी से बड़ा है,
और मानवता — हर सत्ता से ऊँचा हाथ।






