उत्तराखंड डेस्क/देहरादून : उत्तराखंड के देहरादून जिले में झाझरा प्रोजेक्ट के तहत वन विभाग द्वारा पौधरोपण में कथित भ्रष्टाचार का मामला 19 जून को सुर्खियों में आया। कुछ न्यूज़ रिपोर्ट्स के मुताबिक वन विभाग ने 10 रुपये की लागत वाले पौधे को 100 रुपये में खरीदा, जिससे 18.33 लाख रुपये की अनियमितता का आरोप लगा है। यह मामला पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाए जा रहे पौधरोपण अभियान में सरकारी धन के दुरुपयोग और पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।
झाझरा प्रोजेक्ट और पौधरोपण
झाझरा प्रोजेक्ट देहरादून के झाझरा रेंज में वन विभाग द्वारा संचालित एक पौधरोपण और पर्यावरण संरक्षण पहल है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में हरियाली बढ़ाना और जैव विविधता को संरक्षित करना है। इस प्रोजेक्ट के तहत 18,333 पौधे लगाए गए, जिनके लिए वन विभाग ने 18.33 लाख रुपये खर्च करने का दावा किया। यानी, प्रत्येक पौधे की लागत 100 रुपये प्रति पौधा दिखाई गई।
इसी तरह के पौधरोपण कार्य के लिए वन विभाग के कालसी प्रोजेक्ट (देहरादून के कालसी रेंज में) में उसी प्रकार के पौधों को 10 रुपये प्रति पौधा की दर से खरीदा और लगाया गया। इस तुलना से साफ हुआ कि झाझरा प्रोजेक्ट में पौधों की लागत को 10 गुना बढ़ाकर दिखाया गया। यदि 18,333 पौधों को 10 रुपये प्रति पौधा की दर से खरीदा जाता, तो कुल लागत केवल 1.83 लाख रुपये होती, न कि 18.33 लाख रुपये।इस अंतर से 16.5 लाख रुपये की अनियमितता का मामला सामने आया।
क्या हैं आरोप और अनियमितताएँ
वन विभाग पर आरोप है कि उसने पौधों की खरीद में फर्जी बिल बनाए और लागत को जानबूझकर बढ़ाया। यह संभवत ठेकेदारों या नर्सरियों के साथ सांठगांठ से किया गया। कालसी प्रोजेक्ट में 10 रुपये प्रति पौधा की दर से खरीदे गए पौधों की तुलना में झाझरा में 100 रुपये प्रति पौधा दिखाना संदेहास्पद है।
उत्तराखंड में पहले भी पौधरोपण अभियानों की आलोचना हुई है, जहां कागजों पर लाखों पौधे लगाए गए, लेकिन जमीनी हकीकत में कई सूख गए या उनकी देखभाल नहीं हुई।
ठेकेदारों और अधिकारियों की भूमिका
आरोप है कि “वन विभाग के कुछ अधिकारियों ने ठेकेदारों या निजी नर्सरियों के साथ मिलकर इस घोटाले को अंजाम दिया। यह पैटर्न अन्य राज्यों (जैसे छत्तीसगढ़ और पंजाब) में भी देखा गया है, जहां पौधरोपण के नाम पर फर्जी बिलिंग हुई। हालांकि, इस मामले में अभी तक किसी विशिष्ट अधिकारी या ठेकेदार के नाम की पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि उत्तराखंड कांग्रेस ने इसे “डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार” करार देकर बीजेपी शासित उत्तराखंड सरकार पर निशाना साधा।
कांग्रेस ने इसे बीजेपी सरकार की विफलता के रूप में प्रचारित किया, जबकि बीजेपी या वन विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
डबल इंजन सरकार, जमकर 'भ्रष्टाचार'👇
BJP शासित उत्तराखंड में वन विभाग का काला कारनामा सामने आया है।
• मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक- वन विभाग ने पौधारोपण के नाम पर भारी खेल किया है। जिस पौधे का दाम 10 रुपए था, उसी पौधे को 100 रुपए में खरीदा गया।
• वन विभाग ने 18,333 पौधे, 100… pic.twitter.com/kDvePmEnnT
— Uttarakhand Congress (@INCUttarakhand) June 19, 2025
उत्तराखंड में वन विभाग और भ्रष्टाचार
उत्तराखंड के वन विभाग में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। 2019 में, अलीगढ़ रेंज में पौधरोपण के नाम पर 22 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया था, जिसमें फर्जी फर्मों के जरिए पौधों की खरीद दिखाई गई।
2024 में, उत्तराखंड वन विकास निगम के लालकुआं डिपो में लकड़ी की अवैध निकासी और 6 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया, जिसकी SIT जांच चल रही है। 2023 में, वन गुर्जर पुनर्वास योजना में करोड़ों रुपये की भूमि का घपला हुआ, जिसमें अपात्र लोगों को जमीन आवंटित की गई।
पौधरोपण की विफलता
उत्तराखंड में पौधरोपण अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहे हैं। 2020 में, डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में कहा गया कि विकास परियोजनाओं (जैसे चारधाम परियोजना) के लिए लाखों पेड़ काटे गए, लेकिन प्रतिपूरक पौधरोपण के पौधे 80-90% तक असफल रहे। वन विभाग पर अक्सर आरोप लगता है कि “पौधे कागजों पर लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी देखभाल नहीं होती।
2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में जंगल की आग और पौधरोपण की विफलता पर राज्य सरकार को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने वन विभाग की लापरवाही और स्टाफ की कमी को जिम्मेदार ठहराया। अभी तक वन विभाग या उत्तराखंड सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। यह चुप्पी मामले को और संदिग्ध बना रही है। वन मंत्री सुबोध उनियाल पहले भी घोटालों पर कार्रवाई का आश्वासन दे चुके हैं, लेकिन इस मामले में उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।
पर्यावरण संरक्षण और सरकारी धन के प्रबंधन !
वन विभाग द्वारा 10 रुपये के पौधे को 100 रुपये में खरीदने का मामला एक गंभीर भ्रष्टाचार का उदाहरण है। 18.33 लाख रुपये की अनियमितता, जिसमें 16.5 लाख रुपये का संभावित दुरुपयोग हुआ, ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कालसी प्रोजेक्ट के साथ तुलना से यह साफ है कि लागत को जानबूझकर बढ़ाया गया। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक जांच शुरू नहीं हुई है, और वन विभाग की चुप्पी सवाल खड़े करती है। उत्तराखंड में पहले भी वन विभाग में घोटाले हो चुके हैं, और यह मामला पर्यावरण संरक्षण और सरकारी धन के प्रबंधन में सुधार की जरूरत को रेखांकित करता है।







