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Home दिल्ली

दूसरों के खिलाफ अति, अपनी सरकार से कुछ नहीं कहते;SC की केंद्र को फटकार

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 25, 2023
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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Supreme court
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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा शासित राज्यों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने में विफल रहने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई. पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में आरक्षण मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणियां कीं.

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि राज्य में महिलाओं के लिए आरक्षण क्यों लागू नहीं किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा, आप अपनी ही पार्टी की राज्य सरकारों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा- आप अन्य राज्य सरकारों के खिलाफ तो कड़ा रुख अपनाते हैं जो आपके प्रति उत्तरदायी नहीं हैं, लेकिन जिस राज्य में आपकी पार्टी की सरकार होती है, वहां आप कुछ नहीं करते.

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जज ने सरकार से पूछे सवाल

जस्टिस कौल ने पूछा कि क्या महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ कोई प्रावधान है? महिलाओं की भागीदारी का विरोध क्यों जबकि जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाएं समान रूप से शामिल हैं. इसके जवाब में एटॉर्नी जनरल नागालैंड ने कहा कि ऐसे महिला संगठन हैं जो कहते हैं कि उन्हें आरक्षण नहीं चाहिए और ये कोई छोटी संख्या नहीं है. ये पढ़ी-लिखी महिलाएं हैं.

फिर जस्टिस कौल ने कहा, हमने आपको एक बहुत लंबी रस्सी दी है. आपने वचन दिया था कि आप ऐसा करेंगे, लेकिन मुकर गए. यही हमारी चिंता है. यथास्थिति में बदलाव का हमेशा विरोध होता है. लेकिन, किसी को यथास्थिति बदलने की जिम्मेदारी लेनी होगी. इसके जवाब में सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने कहा, राज्य ने कुछ अभ्यास शुरू किए हैं. वे कुछ कानून बनाना चाहते हैं. उत्तर पूर्व में जो स्थिति है, उसे देखते हुए समय दिया जाए.

महिलाओं को आरक्षण दिया जाने का मुद्दा

जस्टिस कौल ने कहा, लेकिन मौजूदा मुद्दा अलग है. क्या समाज के आधे हिस्से को प्रशासनिक प्रक्रिया में एक तिहाई भागीदारी मिलती है. यह अजीब है कि महाधिवक्ता संवैधानिक प्रावधान को लागू करने के लिए संबंधित राजनीतिक व्यवस्था से बात करने के लिए नौवीं बार निर्देश मांग रहे हैं. एजी की भावुक दलील को देखते हुए, हम एक आखिरी मौका देने के इच्छुक हैं. हम केवल इतना कह सकते हैं कि नागालैंड के जो भी व्यक्तिगत कानून हैं और उन्हें राज्य का विशेष दर्जा दिया गया है, उन्हें किसी भी तरह से नहीं छुआ जा रहा है. यह एक ऐसा राज्य है जहां महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक और सामाजिक स्थिति सबसे अच्छी है. इसीलिए हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि महिलाओं के लिए आरक्षण क्यों लागू नहीं किया जा सकता.

अदालत ने राज्य सरकार को दिया समय

जस्टिस कौल ने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे से अपना हाथ नहीं झाड़ सकती. इसका कार्य इस तथ्य से सरल हो गया है कि राज्य में राजनीतिक व्यवस्था केंद्र में राजनीतिक व्यवस्था के अनुरूप है. चीजों को अंतिम रूप देने के लिए राज्य को अंतिम अवसर देना चाहिए. इस मामले में अदालत ने 26 सितंबर तक का समय दिया है. जज ने कहा कि यदि आप अगली बार समाधान नहीं ढूंढते हैं तो हम मामले की सुनवाई करेंगे और अंतिम निर्णय लेंगे.

SC ने मणिपुर के हालात का भी किया जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में मणिपुर के हालात का भी जिक्र किया. बता दें कि मणिपुर में बिगड़े हालातों पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पहले ही स्वत: संज्ञान लेने की बात कह चुके हैं. दरअसल 4 मई के वायरल वीडियो पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और मणिपुर सरकार से अपराधियों को जवाबदेह ठहराने के लिए उठाए गए कदमों के संबंध में अदालत को अवगत कराने को कहा था. अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और एसजी तुषार मेहता को तलब करते हुए सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने घटना के संबंध में गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए सरकारों को अल्टीमेटम दिया था कि या तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए, वरना अदालत दखल देगी.

मणिपुर में हिंसा से CJI परेशान

इस घटना को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताते हुए सीजेआई ने आगे कहा था कि लैंगिक हिंसा को कायम रखने के लिए सांप्रदायिक संघर्ष के क्षेत्र में महिलाओं को एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन और अतिक्रमण है. उन्होंने कहा था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वीडियो हालिया है या मई का है.

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट एक अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें नागालैंड सरकार और नागालैंड राज्य चुनाव आयोग पर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के साथ स्थानीय निकाय चुनाव कराने के अपने आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया गया है. इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस कौल ने कहा, आरक्षण यह सुनिश्चित करता है कि न्यूनतम स्तर का प्रतिनिधित्व हो. आरक्षण सकारात्मक कार्रवाई की अवधारणा है. उसी पर महिला आरक्षण आधारित है. आप संवैधानिक प्रावधान से कैसे बाहर निकलते हैं? मुझे यह समझ में नहीं आता.

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