प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
दरभंगा: राजनीतिक विमर्श का स्तर भारत में निरंतर गिरता जा रहा है। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार हर किसी को है, लेकिन यह अधिकार तब खतरनाक हो जाता है जब वह मर्यादा और गरिमा की सीमाएं लांघता है। ऐसा ही एक ताज़ा मामला सामने आया है बिहार के दरभंगा से, जहाँ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके परिवार पर अभद्र टिप्पणियाँ की गईं।
इस घटनाक्रम ने सिर्फ स्थानीय राजनीति को नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘राजनीतिक भाषा और मर्यादा’ की बहस को फिर से जीवित कर दिया है।
नफरत के खिलाफ प्रेम और सौहार्द
कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों ‘वोट अधिकार यात्रा’ पर हैं, जिसका उद्देश्य देशभर में लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा को लेकर जनता में जागरूकता फैलाना है। इस अभियान को उन्होंने ‘मोहब्बत की दुकान’ की संज्ञा दी है — एक ऐसा प्रतीक जो नफरत के खिलाफ प्रेम और सौहार्द की बात करता है।
लेकिन इसी ‘मोहब्बत की दुकान’ के नाम पर जब कांग्रेस के ही कुछ कार्यकर्ता सार्वजनिक मंच से देश के प्रधानमंत्री और उनके परिवार पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो यह अभियान अपनी साख खोने लगता है।
आपत्तिजनक और अपमानजनक भाषा
दरभंगा में कांग्रेस के एक कार्यक्रम के दौरान कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माँ पर आपत्तिजनक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। मंच पर मौजूद नेताओं ने इस भाषा को न तो रोका और न ही निंदा की, जिससे यह सन्देश गया कि यह पार्टी लाइन के तहत ही हो रहा है।
राहुल गांधी स्वयं भी प्रधानमंत्री मोदी को लेकर अपनी भाषा में “तू-तड़ाक” जैसे शब्दों का प्रयोग कर चुके हैं। यह भाषा सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत कटाक्ष और संस्थागत गरिमा का हनन भी बन गई है।
क्या हैं राजनीतिक प्रतिक्रिया ?
भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस की “राजनीतिक हताशा” बताया और कहा कि “राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी अब पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है।”
कांग्रेस की ओर से अभी तक इस घटना पर कोई स्पष्ट माफी या कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है, जिससे विपक्ष को हमला करने का एक और मौका मिल गया है।
राहुल गांधी की भूमिका और आलोचना
राहुल गांधी ने हाल के वर्षों में खुद को एक जननेता के रूप में पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की है — भारत जोड़ो यात्रा और वोट अधिकार यात्रा जैसे अभियानों से। लेकिन बार-बार उनकी भाषा, विदेशों में देश की आलोचना, और संवैधानिक पदों के प्रति अनादर उनके प्रयासों को कमजोर कर देता है।
देश के प्रधानमंत्री पर निजी हमले करना, संवैधानिक मर्यादा और सार्वजनिक जीवन की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत कटुता में बदल देना न तो लोकतंत्र के हित में है और न ही देश के भविष्य के लिए स्वस्थ परंपरा।
‘मोहब्बत की दुकान’ के नाम पर अगर ‘तू-तड़ाक’ और व्यक्तिगत हमलों की राजनीति होगी, तो यह जनता को भ्रमित नहीं बल्कि आक्रोशित करेगी। राजनीति को अगर बदलना है, तो भाषा और व्यवहार को भी बदलना होगा। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन मर्यादा उससे भी ज्यादा।
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