नई दिल्ली। पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आतंकवाद फैलाने का उसको इतना बड़ा दंड मिलेगा. भारत आतंकवादियों के पनाहगार देश पर ताबड़तोड़ ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर रहा है. कुछ लोग इसे वॉटर स्ट्राइक भी कह रहे हैं. पहलगाम टेरर अटैक के बाद भारत ने तकरीबन सात दशक पुराने सिंधु जल समझौते (IWT) को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. इस करार के तहत भारत को रावी, ब्यास ओर सतलज नदी पर अधिकार मिला, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में सिंधु, झेलम और चेनाब नदी गई. IWT को ठंडे बस्ते में डालने के बाद भारत ने जम्मू-कश्मीर में लंबित प्रोजेक्ट पर काम करना शरू कर दिया है.
भारत दुलहस्ती फेज-2 और सावलकोट प्रोजेक्ट पर काम को आगे बढ़ाने का ऐलान कर चुका है. ये दोनों प्रोजेक्ट चेनाब नदी पर बनाए जाएंगे. इसके बाद भारत ने अब एक और प्रोजेक्ट पर काम को आगे बढ़ाने की बात कही है. झेलम नदी पर वुलर बैराज (जिसे तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट) के काम में अब तेजी लाइ जाएगी. IWT की वजह से यह प्रोजेक्ट पिछले 40 साल से अटका हुआ है. इन सभी परियोजनाओं पर पाकिस्तान की तरफ से सवाल उठाए जाते रहे हैं. अब जबकि यह संधि ही अमल में नहीं है तो भारत के लिए रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है. इन तीनों प्रोजेक्ट का काम पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर के साथ ही अन्य राज्यों को भी इसका फायदा मिलने की उम्मीद है. वहीं, पाकिस्तान एक-एक बूंद पानी के लिए तरस जाएगा.
जम्मू-कश्मीर में झेलम नदी पर प्रस्तावित वुलर बैराज परियोजना को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. केंद्र सरकार के साथ समन्वय में भारत ने लंबे समय से ठप पड़ी वुलर बैराज (जिसे तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट भी कहा जाता है) को पुनर्जीवित करने का फैसला किया है. यह कदम पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के लगभग 9 महीने बाद उठाया गया है और इसे जल संसाधन प्रबंधन की दिशा में अहम बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. वुलर बैराज का उद्देश्य झेलम नदी के पानी को रेगुलेट करते हुए वुलर झील में जलस्तर को स्थिर बनाए रखना और सालभर नेविगेशन की सुविधा सुनिश्चित करना है.
यह परियोजना चार दशक से अधिक समय से विभिन्न कूटनीतिक दबावों और सुरक्षा चुनौतियों के कारण अटकी हुई थी. वर्ष 1984 में निर्माण कार्य शुरू हुआ था, लेकिन 1989 में उग्रवाद और अलगाववादी हिंसा के चलते काम रोकना पड़ा था. बाद में 2010 में परियोजना को फिर से शुरू करने की कोशिश की गई, लेकिन 2012 में सोपोर के निंगली क्षेत्र में आतंकी हमले के बाद मजदूरों को काम छोड़कर भागना पड़ा और निर्माण कार्य एक बार फिर बंद हो गया. पाकिस्तान लगातार इस परियोजना का विरोध करता रहा है. उसका तर्क रहा है कि यह 1960 की सिंधु जल संधि के तहत उसके जल अधिकारों के लिए खतरा है.
ठंडे बस्ते में सिंधु जल संधि
सिंधु जल संधि (जो विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई थी) के तहत पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) पर पाकिस्तान को प्राथमिक अधिकार दिए गए थे, जबकि भारत को पूर्वी नदियों का प्रमुख यूजर माना गया. इस संधि के तहत भारत को पश्चिमी नदियों जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति तो थी, लेकिन बड़े पैमाने पर जल भंडारण (Water Storage) पर कई प्रतिबंध थे. अप्रैल में पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को स्थगित करने का फैसला लिया.
इसके बाद भारत अब पश्चिमी नदियों पर परियोजनाओं के लिए पाकिस्तान से पूर्व अनुमति या परामर्श की बाध्यता से मुक्त हो गया है. इसी नई परिस्थिति में वुलर बैराज को रिवाइव करने की प्रक्रिया तेज हुई है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बताया कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर दो प्रमुख परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ाया जा रहा है, जो संधि के रहते संभव नहीं थीं. इनमें वुलर बैराज के अलावा अखनूर में चेनाब नदी से जम्मू शहर के लिए लिफ्ट जलापूर्ति योजना भी शामिल है. पहले इस योजना को एशियाई विकास बैंक से मिलने वाली फंडिंग IWT संबंधी अड़चनों के कारण प्रभावित हुई थी.







