नई दिल्ली: हर सर्दी दिल्ली समेत उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा जानी-पहचानी मुसीबत में फंस जाता है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 400 के पार चला जाता है। स्कूल बंद हो जाते हैं। निर्माण कार्य रुक जाता है। सोशल मीडिया सरकारों के खिलाफ गुस्से से भर जाता है। लेकिन, इस दिखाई देने वाली धुंध के पीछे एक शांत, कहीं ज्यादा गंभीर समस्या छुपी है। भारत की प्रदूषित हवा चुपचाप उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है। अक्सर इसका हिसाब भी नहीं रखा जाता।
चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विश्लेषण साझा करते हुए तर्क दिया है कि भारत का वायु प्रदूषण संकट सिर्फ पर्यावरण या शासन की विफलता नहीं है। अलबत्ता, यह एक व्यवस्थित आर्थिक रिसाव है जिसे नागरिक, श्रमिक और व्यवसाय हर साल मिलकर भरते हैं। कौशिक ने लिखा, ‘प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों की बात नहीं है। यह जेब पर भारी पड़ता है।’ उन्होंने हाई AQI को विकास पर एक छुपा हुआ टैक्स बताया।
खराब हवा की गुणवत्ता का असर अस्पतालों और इनहेलर से कहीं आगे तक जाता है। अर्थशास्त्री और उद्योग पर्यवेक्षक बताते हैं कि हाई AQI प्रोडक्टिविटी, खपत और शहरी प्रतिस्पर्धात्मकता को लंबे समय में बाधित करता है। जहरीली हवा के कारण बार-बार होने वाली बीमारियां ज्यादा छुट्टी लेने और वर्कफोर्स की एफिशिएंसी कम होने का कारण बनती हैं। स्वास्थ्य खर्चों में बढ़ोतरी से घरेलू बचत कम हो जाती है। इससे विवेकाधीन खर्च सीमित हो जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में मांग धीमी हो जाती है। वहीं, उच्च कुशल पेशेवर भारी प्रदूषित शहरों से बचने लगे हैं। इससे प्रतिभा का प्रवाह प्रभावित होता है। शहरी विकास की रफ्तार धीमी होती है। इसके अलावा, सीधे तौर पर आर्थिक बाधाएं भी आती हैं।
प्रदूषण की कैसे भारी कीमत चुकाते हैं लोग?
पीक पलूशन पीरियड के दौरान निर्माण पर प्रतिबंध, वाहनों पर रोक और आपातकालीन उपाय आर्थिक गतिविधियों को रोक देते हैं। परियोजनाओं में देरी करते हैं। जीडीपी की रफ्तार को धीमा करते हैं। समय के साथ ये रुकावटें मिलकर विकास पर एक मापने योग्य बोझ बन जाती हैं। कौशिक ने कहा, ‘हाई AQI चुपचाप मध्यम वर्ग, श्रमिकों और व्यवसायों पर टैक्स लगाता है।’ उन्होंने आगे कहा कि इसकी कीमत सिर्फ प्रदूषण आपातकाल के दौरान नहीं, बल्कि रोजाना चुकानी पड़ती है।
हालांकि, सरकारी नीतियां एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, कौशिक का तर्क है कि भारत में प्रदूषण इसलिए बना हुआ है क्योंकि प्रोत्साहन और व्यवहार अभी भी इसका समर्थन करते हैं। किसी एक नीति की विफलता के उलट वायु प्रदूषण एक विकेन्द्रीकृत समस्या है। यह लाखों व्यक्तिगत निर्णयों से प्रेरित होती है। पराली जलाने और डीजल वाहनों को प्राथमिकता देने से लेकर डीजल जनरेटर सेटों के व्यापक उपयोग और त्योहारों पर पटाखों तक, प्रदूषण के स्रोत आर्थिक और जीवन शैली की पसंद में गहराई से निहित हैं। कमजोर प्रवर्तन और सामाजिक सहनशीलता प्रदूषित करने वाली गतिविधियों की लागत को और कम कर देती है।
क्या चीन का मॉडल है सॉल्यूशन?
कौशिक ने लिखा, ‘अगर प्रदूषण सिर्फ सरकार की विफलता होती तो चीन बीजिंग को ठीक नहीं कर पाता।’ उन्होंने अकेले नियमों के बजाय व्यवहारिक और आर्थिक सुधारों की ओर इशारा किया। चीन के प्रमुख शहरों में प्रदूषण कम करने की सफलता कुछ असहज लेकिन प्रासंगिक सबक सिखाती है। केवल नियमों पर निर्भर रहने के बजाय बीजिंग ने प्रोत्साहनों को पुनर्गठित किया।
प्रदूषण को महंगा बनाया और स्वच्छ विकल्पों को सस्ता। सख्त प्रवर्तन, शहर की सीमाओं से परे क्षेत्रीय समन्वय और सक्रियता के बजाय स्वच्छ हवा को आर्थिक बुनियादी ढांचा मानना रणनीति के केंद्र में थे। भावनात्मक बहसों की जगह लागत-लाभ गणनाओं ने ले ली। प्रदूषित व्यवहार वित्तीय रूप से दर्दनाक और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हो गया।
क्या करने की जरूरत?
कौशिक इस बात पर जोर देते हैं कि सार्थक सुधार तब आएगा जब व्यक्तिगत कार्य नैतिक उपदेशों के बजाय आर्थिक तर्क के अनुरूप होंगे। बड़े पैमाने पर छोटे व्यवहारिक बदलाव – जैसे कार यात्राएं कम करना, कारपूलिंग बढ़ाना, डीजल वाहनों पर निर्भरता कम करना और जनरेटर सेटों का सीमित उपयोग – सामूहिक रूप से AQI में ठोस सुधार ला सकते हैं। थोड़ी अधिक लागत पर भी स्वच्छ व्यवसायों का समर्थन करना नीति की तुलना में बाजार के व्यवहार को तेजी से बदल सकता है। ई-रिक्शा, स्वच्छ निर्माण प्रथाओं और रिन्यूएबल एनर्जी की मांग ऐसे आर्थिक संकेत भेजती है जिन पर बाजार तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं। उन्होंने कहा, ‘बाजार नीतियों से तेजी से बदलते हैं।’
कौशिक का तर्क है कि व्यापक बदलाव मानसिकता में होना चाहिए। संस्थानों को दोष देने के बजाय यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या रोजमर्रा की गतिविधियां उनके प्रदूषण की लागत को सही ठहराती हैं। उन्होंने लिखा, ‘साफ हवा हैशटैग से नहीं आएगी। यह अलाइंड इनसेंटिव, प्रवर्तन और व्यक्तिगत अनुशासन से आती है।’ जैसे-जैसे भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है, प्रदूषित हवा को नजरअंदाज करने की कीमत अब सिर्फ एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता नहीं है। यह एक आर्थिक चिंता है – शांत, लगातार और हर धुंध भरी सर्दी के साथ बढ़ती हुई। इस मायने में वायु प्रदूषण पर बहस न तो राजनीतिक है और न ही वैचारिक। यह, जैसा कि कौशिक कहते हैं, ‘अर्थशास्त्र बनाम लापरवाही’ है।







