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Home दिल्ली

पार्टी के लिए नासूर बन सकते हैं केजरीवाल के नेता!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 8, 2022
in दिल्ली, विशेष
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आम आदमी पार्टी
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नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय हो गई है। अभी औपचारिक एलान बाकी है। गुजरात विधानसभा चुनाव में लगभग 12 परसेंट वोट उसके पाले में गए हैं। कांग्रेस से छिटके वोटरों ने अरविंद केजरीवाल की पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा दे दिया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने माधव सिंह सोलंकी का रेकॉर्ड ध्वस्त कर नया इतिहास रच दिया है। नरेंद्र मोदी ने गिर सोमनाथ से आह्वान किया था कि जनता इस बार उनके ही रेकॉर्ड को तोड़ दे और भूपेंद्र पटेल को ऐतिहासिक जीत दिलाए। मोदी के घर में मोदी फैक्टर काम कर गया। गुजरात ने भाजपा की झोली में 156 सीटें डाल दी है। गुजरात के प्रचार में मोदी और अरविंद केजरीवाल की तुलना भी खूब हुई। दोनों ने एक-दूसरे पर वार किए। मोदी ने आप की राजनीति से खबरदार किया तो केजरीवाल ने वादों की झड़ी लगा दी। लेकिन केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिके।

मोदी एक तरह से कल्ट फिगर बनते जा रहे हैं। लेकिन उनके वादों में तर्क छिपा होता है। या कहें कि वो उसे तर्कसंगत जताने में सफल रहे हैं। आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी दोनों के वोटर्स में लाभार्थियों की संख्या बहुत है। हालांकि भाजपा के खाते में लाभार्थी बाद में जुड़े। पहले से वैचारिक आधार पर जुड़ा वोट बैंक उसके साथ है। लाभार्थियों को जोड़ने का श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। मोदी ने 2014 में सरकार बनते ही जन-धन योजना से इसकी शुरुआत कर दी थी। फिर उज्जवला योजना और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम्स ने लाभार्थियों का बड़ा वर्ग तैयार किया। इसने जाति-पाति के बंधन को तोड़ दिया। पिछड़ों और दलितों का कांग्रेस वोट बैंक तेजी से भाजपा की तरफ झुका जिसके सियासी फायदे भाजपा को मिले हैं। कोरोनावायरस के समय गरीब कल्याण अन्न योजना ने लाभार्थियों को फौलादी तौर पर भाजपा के साथ कर दिया। दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल हैं जिन्होंने अपने लिए लाभार्थियों का नया तबका बनाया। शुरुआत दिल्ली से की। फ्री पानी और बिजली के साथ इसकी शुरुआत हुई। पंजाब में वो इसे पक्की नौकरी और हर महिला को कैश देने तक ले गए। साथ ही किसानों को मुफ्त की बिजली बढ़ा दी।

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केजरीवाल खुद ही विरोधी बना रहे
अरविंद केजरीवाल की एक और दिक्कत है। ये दिक्कत उन्हीं की पार्टी के नेता नासूर बना सकते हैं। एक चैनल पर आप के प्रवक्ता संजीव झा बता रहे थे कि पोस्टल बैलट हमेशा उन्हें हराते आए हैं क्योंकि वोट देने वाला अधिकारी होता है जो कभी आप को वोट नहीं करता। ये मुसीबत पार्टी पर भारी पड़ सकती है। ये दिक्कत है फ्रीबीज से एक तबके को साधना लेकिन दूसरे तबके को अपने विरोधी के तौर पर तैयार करना। इस मामले में नरेंद्र मोदी मिसाल हैं। टैक्स पेयर्स भी उनके वोटर हैं और उनके पैसे से जिन लोगों तक गैस सिलिंडर पहुंचता है वो भी उनके वोटर हैं। दूसरी ओर अरविंद केजरीवाल जिस गति से हिमाचल और गुजरात में वादे कर रहे हैं उससे टैक्सपेयर्स को डर लगने लगा है। पंजाब की सरकार पहले से ही टॉप पांच बड़े कर्जदारों में शामिल है। इस लिहाज से कमाई का जुगाड़ किए बिना खर्चा का जुगाड़ लगाना शुरुआती राजनीति में चमक पैदा कर सकता है लेकिन बाद में बैकफायर भी कर सकता है।

जैसे ही वोटर के मन में ये बात आ गई फ्रीबीज सिर्फ चुनाव जीतने का केजरीवाल फॉर्म्युला है, वैसे ही जनाधार में गिरावट शुरू हो सकती है। भाजपा इसे वोट खरीदने की तकनीक बता रही है। और अब इस मुद्दे पर भाजपा काफी आक्रामक मूड में है। आप की देखा-देखी कांग्रेस ने भी की है। खजाने पर जबर्दस्त बोझ बढ़ाने वाली ओल्ड पेंशन स्कीम छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने लागू कर दी है। भाजपा खुले तौर पर इसका विरोध कर रही है और नौकरी के लिए तैयार हो रहे युवाओं को बता रही है कि इसका बुरा असर अगली पीढ़ी पर पड़ सकता है। हालांकि पार्टी ने हिमाचल प्रदेश में भी इसका वादा किया जहां वो सरकार बनाने जा रही है। हिमाचल के मैनिफेस्टो में 18 से 60 साल की महिलाओं को 1500 रुपया हर महीना देने और 300 यूनिट फ्री बिजली का वादा भी शामिल है। अब जब कांग्रेस के चार-पांच सीएम दावेदारों में से कोई गद्दी पर काबिज होगा तो उनके सामने इन्हें लागू करने की मजबूरी होगी और कुछ साल बाद हो सकता है हम उन्हें ये आरोप लगाते सुने कि केंद्र सरकार वित्तीय सहायता नहीं दे रहा है। यही आरोप अरविंद केजरीवाल भी लगाते हैं।

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