विशेष डेस्क/पटना : चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री, बिहार की सियासत में अपनी आक्रामक रणनीति और शक्ति प्रदर्शन के जरिए चर्चा में हैं। उनकी हालिया गतिविधियां, रैलियां और बयानबाजी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन, दोनों के लिए चुनौती बन रही हैं। आइए, पूरी स्थिति का विश्लेषण एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
चिराग पासवान का शक्ति प्रदर्शन!
चिराग पासवान ने हाल के महीनों में बिहार में अपनी सक्रियता बढ़ाई है। उनकी रैलियों में भारी भीड़ देखी जा रही है, जो उनकी लोकप्रियता का संकेत देती है। उदाहरण के लिए, नालंदा रैली में कार्यकर्ताओं का उत्साह इतना था कि भीड़ बेकाबू हो गई, और चिराग की गाड़ी पर चढ़ने की कोशिश में गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई। आरा में आयोजित ‘नव संकल्प महासभा’ और राजगीर में ‘बहुजन संकल्प समागम’ जैसे कार्यक्रमों में उन्होंने दलित और बहुजन समुदायों के बीच अपनी पैठ को मजबूत करने की कोशिश की है।
चिराग का नारा ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ जनता के बीच लोकप्रिय हो रहा है। उन्होंने बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, जो NDA के भीतर और बाहर दोनों जगह हलचल मचा रहा है।
महागठबंधन के लिए चुनौती ?
चिराग पासवान की रणनीति महागठबंधन के लिए कई मायनों में चुनौतीपूर्ण है:दलित और बहुजन वोट बैंक: चिराग अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को आगे बढ़ाते हुए दलित वोटों, खासकर पासवान समुदाय (बिहार की आबादी का लगभग 5.33%) पर मजबूत पकड़ रखते हैं। हालांकि, वे अब सामान्य सीटों पर भी चुनाव लड़कर अपने सामाजिक आधार को व्यापक करने की कोशिश कर रहे हैं, जो महागठबंधन के लिए खतरा है, क्योंकि कांग्रेस और RJD भी दलित वोटों में हिस्सेदारी रखते हैं।
महागठबंधन में तेजस्वी यादव युवा नेतृत्व के रूप में उभरे हैं। चिराग 42 वर्षीय युवा नेता के रूप में तेजस्वी के विकल्प के तौर पर खुद को पेश कर रहे हैं, जिससे महागठबंधन की रणनीति को नुकसान हो सकता है। चिराग ने RJD और कांग्रेस पर लगातार निशाना साधा है। उन्होंने जातिगत जनगणना को PM मोदी की इच्छाशक्ति का परिणाम बताया और महागठबंधन को घेरने की कोशिश की है।
NDA के लिए चुनौती
चिराग पासवान का शक्ति प्रदर्शन और उनकी रणनीति NDA के लिए भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग की बगावत ने NDA, खासकर नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) को भारी नुकसान पहुंचाया था। चिराग ने 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिससे JDU को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। इस बार, हालांकि चिराग NDA के साथ हैं, लेकिन उनकी आक्रामक रणनीति और सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा ने गठबंधन के भीतर तनाव पैदा किया है।
चिराग अपनी पार्टी के लिए कम से कम 40 सीटों की मांग कर रहे हैं, जबकि NDA ने उन्हें 20-22 सीटों का प्रस्ताव दिया है। खास तौर पर, चिराग उन 9 सीटों पर दावेदारी कर रहे हैं, जहां उनकी पार्टी 2020 में दूसरे स्थान पर रही थी, लेकिन JDU इन सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रही है।
नीतीश कुमार पर दबाव ?
चिराग के बयान और गतिविधियां नीतीश कुमार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही हैं। हाल के सर्वेक्षणों में नीतीश की लोकप्रियता में कमी देखी गई है, और चिराग का आक्रामक रुख JDU की स्थिति को और कमजोर कर सकता है। चिराग ने नीतीश के नेतृत्व को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती दी है, हालांकि उन्होंने NDA के प्रति वफादारी भी जताई है।
चिराग का सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का बयान और उनकी ‘वन मैन आर्मी’ छवि दबाव की राजनीति का हिस्सा मानी जा रही है। यह NDA के भीतर बेहतर सीट बंटवारे और बिहार की सियासत में अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति हो सकती है। चिराग के प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के साथ गठबंधन की चर्चा ने भी NDA में खलबली मचा दी है। यह संकेत देता है कि चिराग के पास अन्य विकल्प भी हैं, जो NDA पर दबाव बढ़ाता है।
मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षा ?
चिराग ने कई बार संकेत दिए हैं कि वे बिहार की राजनीति में बड़ी भूमिका चाहते हैं। उनके बयान, जैसे “मेरा प्रदेश मुझे बुला रहा है,” और विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा, मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षा की ओर इशारा करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि नीतीश ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
चिराग की रैलियों में भारी भीड़ और कार्यकर्ताओं का उत्साह उनकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। LJP (रामविलास) ने हाल के लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर 100% स्ट्राइक रेट हासिल किया, जिसने चिराग की सियासी ताकत को और मजबूत किया है। पार्टी के सर्वेक्षणों में भी जनता की मांग है कि चिराग विधानसभा चुनाव लड़ें।
चिराग पासवान नया सियासी दांव खेलेंगे !
चिराग पासवान का शक्ति प्रदर्शन बिहार की सियासत में एक नया मोड़ ला रहा है। उनकी रणनीति महागठबंधन के लिए दलित और युवा वोटों को प्रभावित करने की चुनौती पेश कर रही है, जबकि NDA के भीतर सीट बंटवारे और नीतीश कुमार के नेतृत्व को लेकर तनाव पैदा कर रही है। उनकी ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ की सोच और बहुजन समुदायों को एकजुट करने की कोशिश उन्हें बिहार की राजनीति में एक मजबूत खिलाड़ी बना रही है। हालांकि, उनकी रणनीति का असली प्रभाव 2025 के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा। क्या चिराग NDA के साथ रहकर गठबंधन को मजबूत करेंगे या कोई नया सियासी दांव खेलेंगे, यह देखना बाकी है।







