प्रकाश मेहरा
एक्जीक्यूटिव एडिटर
पटना। बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में वक्फ संशोधन कानून 2025 के खिलाफ विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने एक विशाल रैली और प्रदर्शन का आयोजन किया। इस प्रदर्शन में राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद मुस्लिमीन (AIMIM) और अन्य संगठनों के नेताओं ने हिस्सा लिया। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वक्फ संशोधन विधेयक को रद्द करने की मांग करना था, जिसे विपक्षी नेता संविधान विरोधी और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला मानते हैं।
वक्फ कानून कूड़े में फेंक देंगे’: तेजस्वी यादव
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस रैली में केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “हमारी सरकार बनी तो इस वक्फ संशोधन बिल को कूड़ेदान में फेंक देंगे और बिहार में इसे लागू नहीं होने देंगे।” तेजस्वी ने इस कानून को धार्मिक भेदभाव पर आधारित और संविधान विरोधी करार दिया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ उनका विरोध पूरी तरह जायज है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा के साथ-साथ संविधान की रक्षा करना भी जरूरी है। खुर्शीद ने सभी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और सांप्रदायिक सद्भावना को बनाए रखने की बात पर बल दिया।
AIMIM की भागीदारी !
AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अख्तरुल ईमान ने इस कानून को मोदी सरकार की नाकामी छिपाने की कोशिश बताया। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से रैली में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की थी। ईमान ने इसे संविधान के खिलाफ और मुस्लिम समाज की धार्मिक-सामाजिक पहचान को निशाना बनाने वाला कदम करार दिया।
मुस्लिम संगठनों की भूमिका !
इमारत-ए-शरिया और अन्य मुस्लिम संगठनों ने इस रैली को “वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ” कॉन्फ्रेंस के रूप में आयोजित किया। दरभंगा, जमालपुर, अररिया, पूर्णिया और कोचाधामन जैसे विभिन्न क्षेत्रों से हजारों लोग इस प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने तिरंगे के साथ नारेबाजी की और वक्फ संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लेने की कोशिशों का विरोध किया।
क्या हैं आरोप और मांगें !
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि यह कानून वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को निशाना बनाकर मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक पहचान को कमजोर करने की साजिश है। रैली में एक कानूनी ज्ञापन के माध्यम से सरकार से पुराने वक्फ कानून में किए गए संशोधनों को तत्काल रद्द करने की मांग की गई।
वक्फ संशोधन कानून 2025
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित इस विधेयक को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह वक्फ बोर्डों की स्वायत्तता को खत्म करता है और उनकी संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लाने की कोशिश है। कुछ नेताओं ने इसे “पिछले दरवाजे से NRC लागू करने” की कोशिश से भी जोड़ा।
यह प्रदर्शन बिहार विधानसभा चुनाव से पहले हुआ, जिसके कारण इसे राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है। तेजस्वी यादव ने इस मौके का इस्तेमाल केंद्र और बिहार की नीतीश सरकार पर हमला बोलने के लिए किया। उन्होंने कहा कि BJP और JDU को हार का डर सता रहा है, इसलिए वे इस तरह के कानून लाकर समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं।
केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आवाज उठाई
उसी दिन पटना में अन्य राजनीतिक गतिविधियां भी हुईं। तेजस्वी यादव ने बापू सभागार में वैश्य प्रतिनिधि सम्मेलन का उद्घाटन किया, जबकि NDA के सहयोगी चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा क्रमशः राजगीर और गया में जनसभाएं कर रहे थे। साथ ही, मरीन ड्राइव पर छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा स्थापित करने की मांग को लेकर एक और रैली का आयोजन हुआ।
इस प्रदर्शन ने बिहार में विपक्षी दलों की एकजुटता को दर्शाया। RJD, कांग्रेस और AIMIM जैसे दलों ने एक मंच पर आकर केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।
‘वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ’ !
रैली में “वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ” का नारा प्रमुख था, जिससे यह संदेश गया कि यह प्रदर्शन केवल वक्फ संपत्तियों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सांप्रदायिक सद्भावना की रक्षा का भी मुद्दा है। बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण यह प्रदर्शन विपक्ष की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, खासकर मुस्लिम वोटरों को एकजुट करने की कोशिश के रूप में। तेजस्वी यादव ने इसे एक अवसर के रूप में इस्तेमाल कर अपनी छवि को मजबूत करने की कोशिश की।
प्रदर्शन में बिहार की सियासत!
पटना के गांधी मैदान में वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ हुआ यह प्रदर्शन बिहार की सियासत में एक अहम घटना बन गया। तेजस्वी यादव, सलमान खुर्शीद और अख्तरुल ईमान जैसे नेताओं ने इस मंच का उपयोग न केवल वक्फ कानून के खिलाफ आवाज उठाने के लिए किया, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल खड़े किए। प्रदर्शन में भारी संख्या में लोगों की भागीदारी और तिरंगे के साथ नारेबाजी ने इसकी व्यापकता और प्रभाव को दर्शाया। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे का कितना प्रभाव पड़ता है।






