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हिमाचल प्रदेश में राजपूतों के अलावा कोई और मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन पाता!

हिमाचल प्रदेश में अब तक कुल छह मुख्यमंत्री हुए, जिनमें से पाँच राजपूत और एक ब्राह्मण. डॉक्टर यशवंत सिंह परमार 1952 में हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने और लगातार चार कार्यकाल तक सत्ता में रहे.

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 1, 2022
in राज्य, विशेष
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वीरभद्र सिंह
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शिमला : वीरभद्र सिंह छह बार मुख्यमंत्री बने और 22 सालों तक प्रदेश के मुखिया रहे. डॉ यशवंत सिंह परमार, वीरभद्र सिंह के अलावा ठाकुर रामलाल, प्रेम कुमार धूमल और वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी राजपूत जाति से ही ताल्लुक़ रखते हैं.बीजेपी ने शांता कुमार को दो बार मुख्यमंत्री बनाया लेकिन वह कभी पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. शांता कुमार 1977 से 1980 और 1990 से 1992 तक मुख्यमंत्री रहे. शांता कुमार ब्राह्मण जाति से ताल्लुक़ रखते हैं और हिमाचल प्रदेश के पहले ग़ैर-कांग्रेसी, ग़ैर-राजपूत मुख्यमंत्री थे.

उन्हें हिमाचल में राजपूत मुख्यमंत्रियों के बीच अपवाद के तौर पर देखा जाता है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी हिमाचल प्रदेश के ब्राह्मण नेता हैं. कांग्रेस के आनंद शर्मा भी हिमाचल के ही ब्राह्मण नेता हैं लेकिन वीरभद्र सिंह के रहते वह प्रदेश में हाशिए पर ही रहे.

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हिमाचल प्रदेश क्षेत्रफल और आबादी दोनों के लिहाज़ से छोटा राज्य है. 2011 की जनगणना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की आबादी 70 लाख से भी कम है. भारत की कुल आबादी में हिमाचल का हिस्सा महज़ 0.57 फ़ीसदी है. यहाँ की साक्षरता दर 80 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है.

2011 की जनगणना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की 50.72 प्रतिशत आबादी सवर्णों की है. इनमें से 32.72 फ़ीसदी राजपूत और 18 फ़ीसदी ब्राह्मण हैं. 25.22 फ़ीसदी अनुसूचित जाति, 5.71 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति, 13.52 फ़ीसदी ओबीसी और 4.83 प्रतिशत अन्य समुदाय से हैं. हिमाचल प्रदेश में मुसलमानों की आबादी न के बराबर है, इसलिए यहाँ हिन्दुत्व की राजनीति का ज़ोर नहीं है.

पिछले 45 सालों से हिमाचल प्रदेश की राजनीति कांग्रेस बनाम बीजेपी रही है. नवंबर 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने प्रदेश की कुल 68 विधानसभा सीटों में से 44 सीटों पर जीत दर्ज की थी. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने नए चेहरे जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया था.

जयराम ठाकुर का मुख्यमंत्री बनना एक अहम घटना थी क्योंकि हिमाचल प्रदेश की राजनीति में पिछले तीन दशकों से वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल परिवार का दबदबा चला आ रहा था. हालाँकि बीजेपी ने धूमल परिवार के दबदबे को चुनौती दी लेकिन राजपूतों के दबदबे को क़ायम रखा.

यहाँ ग़ौर करने की बात है कि कुछ अपवादों को छोड़कर बीजेपी आम तौर पर बड़ी आबादी वाली या प्रभावी जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बनाती है, मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र में मराठा या हरियाणा में जाट नेताओं को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, लेकिन बीजेपी इस नीति पर हिमाचल में अमल नहीं कर सकी और उसे राजपूत को ही मुख्यमंत्री बनाना पड़ा.

दलित पिछड़ो की कितनी है आबादी? 
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भ्रष्टाचार, विकास और अपराध मुद्दा बनता है लेकिन जाति के नाम पर यहाँ गोलबंदी नहीं होती है. इसकी एक बड़ी वजह हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक संरचना भी मानी जाती है. भौगोलिक संरचना और पर्यावरण का असर सामाजिक संबंधों पर साफ़ पड़ता है.

पहाड़ों पर छोटी-छोटी बस्तियाँ होती हैं. पहाड़ पर शहरों में भी बड़ी आबादी नहीं होती है. जो शहरों में गाँव से पलायन कर बस भी गए हैं, वे भी गाँव और अपने समुदाय से संपर्क क़ायम रखते हैं. हिमाचल प्रदेश में एक गाँव में औसत 25 से भी कम परिवार होते हैं. कुछ गाँव तो ऐसे भी मिल जाते हैं, जहाँ मुश्किल से पाँच-छह घर होते हैं. दूसरी तरफ़, समतल इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग एक साथ रहते हैं. पहाड़ों में कोई ऐसा प्लॉट मिलना भी मुश्किल होता है कि एक साथ बड़ी संख्या में लोग रह सकें.

हिमाचल प्रदेश में चैल के मेदराम माली का काम करते हैं. वह कहते हैं कि पहाड़ों में जो प्लॉट मिलता है, उसमें मुश्किल से चार-पाँच या फिर 10-20 घर बस पाते हैं.

हिमाचल यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर नारायण सिंह राव कहते हैं कि इस तरह की बस्तियों का असर जातीय संबंध और संपर्क पर भी ख़ासा पड़ता है. प्रोफ़ेसर नारायण सिंह कहते हैं कि बड़ी संख्या में लोग कहीं भी एक साथ ठीक से नहीं रह पाते हैं क्योंकि एक दूसरे के बारे में पूर्वाग्रह भी लंबे समय तक रहता है, लेकिन हिमाचल में लोग कम हैं इसलिए आपसी कलह भी कम है.

जिस तरह से 90 के दशक में उत्तर भारत में दलितों और पिछड़ी जातियों का चुनावी राजनीति में उभार हुआ, उससे हिमाचल प्रदेश अब तक अछूता क्यों है? यहाँ भी दलित, ओबीसी और अनुसूचित जनजाति 50 फ़ीसदी के क़रीब हैं.

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव: 12 नवंबर को मतदान, 8 दिसंबर को मतगणना

इस सवाल के जवाब में पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, “मुझे इसके मुख्य रूप से चार कारण समझ में आते हैं. पहला तो यह कि यहाँ ठाकुर और ब्राह्मण 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं. अगर यहाँ भी यादव, कुर्मी, जाट और गुर्जर जैसी बीच की जातियाँ होतीं तो स्थिति कुछ दूसरी होती. यहाँ दलित ज़रूर 25 फ़ीसदी हैं. बीच की जातियाँ राजपूतों और ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती देतीं. तीसरा कारण है कि यहाँ सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ जिस तरह से बिहार और यूपी में हुआ, उस तरह का आंदोलन यहाँ नहीं हुआ. चौथा कारण है कि हिमाचल में दलितों के पास ज़मीन नहीं है.”

हिमाचल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ जगमीत बावा कहते हैं, “यह बात बिल्कुल सही है कि अगर बीच की जातियाँ हिमाचल में होतीं तो स्थिति बिल्कुल दूसरी होती. मैं देखता हूँ कि हिमाचल में सरकारी नौकरियों या सरकारी संस्थानों में प्रवेश को लेकर सबसे कम प्रतिस्पर्धा ओबीसी कोटे में है. ऐसा इसलिए है कि इनकी तादाद कम है. दलित यहाँ 25 फ़ीसदी हैं लेकिन इनकी भी कई उपजातियाँ हैं. ठाकुर एकजुट हो जाते हैं, ब्राह्मण भी एकजुट हो जाते हैं लेकिन यहाँ दलित बँटे हुए हैं. ठाकुर बीजेपी के साथ जाते हैं. ब्राह्मण कांग्रेस के साथ लेकिन दलित दोनों के बीच रहते हैं.”

डॉ जगमीत बावा कहते हैं कि जब तक यहाँ की राजनीति कांग्रेस बनाम बीजेपी रहेगी तब तक यहाँ शायद ही कोई दलित मुख्यमंत्री बने. डॉ जगमीत कहते हैं कि तीसरी पार्टी के उभार से ही यह संभव है क्योंकि पहले दलितों के बीच नेतृत्व पैदा करना होगा. हिमाचल में दलितों का कोई नेता ही नहीं है.

कौन सी पार्टियां हुईं फ़ेल?
हालाँकि हिमाचल में तीसरी पार्टी बनाने का आइडिया कामयाब नहीं रहा है. 1967 में ठाकुर सेन नेगी और जेबीएल खाची ने हिमाचल लोग राज पार्टी बनाई थी. विजय मनकोटिया ने 1990 में जनता दल का नेतृत्व किया. 1997 में पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई. 2012 में महेश्वर सिंह ने लोकहित पार्टी बनाई.

इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, सीपीआई, सीपीआईएम के अलावा टीएमसी ने भी हिमाचल में क़िस्मत आज़माने की कोशिश की. लेकिन किसी को भी कामयाबी नहीं मिली. यहाँ वामपंथी पार्टी को मामूली कामयाबी ज़रूर मिली है. 2017 के विधानसभा चुनाव में सीपीआईएम ने 14 और सीपीआई ने तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनका वोट शेयर 2.09 प्रतिशत रहा था.

प्रोफ़ेसर नारायण सिंह कहते हैं, “हम हिमाचल प्रदेश को यूपी और बिहार के आईने में नहीं देख सकते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान वाली समस्या हिल स्टेशन में नहीं है. बाक़ी राज्यों की तरह यहाँ छुआ-छूत नहीं है. यहाँ की सामाजिक संरचना अलग है. यहाँ दूल्हे को घोड़ी से नहीं उतार दिया जाता है. जाति आधारित हिंसा नहीं है. जहाँ लोगों पर ज़ुल्म ढाए जाते हैं, विरोध वहीं होता है लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है. यहाँ समरसता है. हिल स्टेट का अपना आचरण होता है. हिमाचल के ठाकुरों की तुलना यूपी के ठाकुरों से नहीं कर सकते.”

हिमाचल प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष सुरेश कुमार कश्यप दलित हैं और शिमला से लोकसभा सांसद हैं. उनसे पूछा कि बीजेपी राजपूत और ब्राह्मण से आगे क्यों नहीं देख रही? बीजेपी हो या कांग्रेस दलितों को टिकट देती हैं तो प्रदेश की केवल 17 सुरक्षित सीटों पर ही. क्या बीजेपी यहाँ किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाएगी?

सुरेश कुमार कश्यप कहते हैं, “मैं प्रदेश अध्यक्ष हूँ और दलित हूँ. हमारी पार्टी कब किसे क्या ज़िम्मेदारी सौंप दे यह कोई नहीं जानता है. अब तक यहाँ राजपूत और ब्राह्मण ही मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन मैं उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में दलित भी मुख्यमंत्री बनेंगे.”

हिमाचल में क्या जातिगत भेदभाव नहीं है?
सुरिंदर एस जोधका ने अपने रिसर्च पेपर में एक ब्राह्मण महिला से बात की है जो अपना बीएड कॉलेज चलाती हैं. उन्होंने हिमाचल में जाति को लेकर कहा, “यहाँ ठाकुरों और ब्राह्मणों की जातीय श्रेष्ठता की व्यापक स्वीकार्यता है. यहाँ जाति व्यवस्था बहुत मज़बूत है लेकिन जातीय हिंसा नहीं है. इसे समझना बहुत आसान है. यहाँ जाति नियम की तरह स्वीकार्य है. यहाँ हर कोई स्वीकार करता है, इसलिए कोई टकराव नहीं है. अगर कोई विधायक भी है तो वह मेरे घर में प्रवेश नहीं करता है. वह बाहर इंतज़ार करता है. अगर वह हमें आमंत्रित भी करता है तो बैठने की व्यवस्था अलग करता है. उनके दिमाग़ में भी जातीय विभाजन की सोच गहरी बैठी हुई है. यहाँ तक कि मेरे कॉलेज में भी स्टूडेंट जाति लाइन पर बँटे हुए हैं.”

काँगड़ा के एक छात्र ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया है, “काँगड़ा में क़रीब 30 फ़ीसदी दलित हैं. यहाँ की राजनीति पूरी तरह से स्थानीय राजपूतों के नियंत्रण में हैं. दलित विधायक की कोई हैसियत नहीं होती है. यहाँ के राजपूत ही सब कुछ हैंडल करते हैं. पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी भेदभाव करता है. ये भी अनुसूचित जाति के विधायक को तवज्जो नहीं देते हैं. जब राजपूत नेता सक्रिय होते हैं तभी प्रशासन भी सुनता है. प्रदेश में दलितों के बीच कोई नेतृत्व नहीं है. ये अब भी अपर कास्ट पर निर्भर हैं.”

हिमाचल प्रदेश में चुनाव की घोषणा से पहले केंद्र सरकार ने सिरमौर ज़िले में हाटी समुदाय को एसटी का दर्जा दे दिया था. उत्तराखंड के जौनसारी इलाक़े में हाटी पहले से ही अनुसूचित जनजाति में थे.

केंद्र सरकार के इस फ़ैसले से हाटी समुदाय के 1.6 लाख लोगों को फ़ायदा होगा. केंद्र सरकार के इस फ़ैसले का अनुसूचित जाति के लोगों ने विरोध किया था. हाटी समुदाय के अनुसूचित जनजाति में आने के बाद दलितों पर अत्याचार के मामले अब इनके ख़िलाफ़ एससी/एसटी प्रिवेंशन ऑफ एक्ट्रोसिटिज एक्ट नहीं लगेगा. दलित इसी बात से नाराज़ हैं.

विनय कुमार दलित हैं और हिमाचल प्रदेश कांग्रेस समिति के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. उनका कहना है कि हाटी समुदाय दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार में शामिल रहा है लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें एसटी कैटिगरी में डाल दिया इसलिए उनके ख़िलाफ़ अब एससी/एसटी एक्ट नहीं लगेगा. विनय कुमार कहते हैं कि बीजेपी को लेकर सिरमौर के दलितों में काफ़ी नाराज़गी है.

विनय कुमार से पूछा गया कि क्या हिमाचल प्रदेश में कोई दलित मुख्यमंत्री बनेगा? इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, “हिमाचल के दलित एकजुट नहीं हैं. जागरुकता का भी अभाव है. लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदल रही हैं. हिमाचल में दलितों का उभार अभी बाक़ी है. कई लोगों ने ऐसी धारणा बनाई है कि यहाँ दलितों के साथ नाइंसाफ़ी और भेदभाव नहीं है जबकि यह सफ़ेद झूठ है. आप सिरमौर के इलाक़े में ही आकर देख लीजिए तो पता चल जाएगा. मेरा मानना है कि दोनों पार्टियां दलितों को लंबे समय तक रोक कर नहीं रख सकतीं.”

कांग्रेस की कमान अभी वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह के हाथ में है. वह ख़ुद को सीएम दावेदार के रूप में पेश भी कर रही हैं. बीजेपी भी जयराम ठाकुर के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ रही है. ऐसे में इस बार भी हिमाचल की कमान राजपूतों से इतर जाएगी, ऐसा लगता नहीं है.

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