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Home धर्म

क्यों गुरु गोबिंद सिंह कहे जाते हैं सरबंस दानी, बलिदान से जुड़ी है कहानी

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 29, 2022
in धर्म
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Guru Gobind Singh
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सिख पंथ के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की आज जयंती है। 27 दिसंबर को ही उनके दो पुत्रों बाबा फतेह सिंह और बाबा जोरावर सिंह के बलिदान दिवस पर वीर बाल दिवस का आयोजन किया गया था। इस तरह दो दिन पहले दो पुत्रों का बलिदान दिवस था और आज पिता की जंयती है। यही वजह है कि दिसंबर के आखिरी सप्ताह का सिख इतिहास में अहम स्थान है। सिख पंथ के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी के बलिदान को आज भी भारत में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। यूं तो उन्हें तमाम उपाधियां दी गई हैं, लेकिन उनका एक नाम सरबंस दानी भी है।

यह नाम उन्हें इसलिए दिया गया था क्योंकि मुगलों से लोहा लेने और आततायियों से कमजोरों को बचाने के लिए उन्होंने अपना पूरा परिवार ही न्योछावर कर दिया था। इसीलिए गुरु गोबिंद सिंह जी को सरबंस दानी कहा जाता है। उन्होंने अपने समेत परिवार के 7 लोगों का बलिदान कर दिया था। उनके लिए कहा जाता है, ‘चार पुत वारे, पंचवीं मां वारी, छठा बाप वारया और सतवां आप वारया। सत्त वार के कहदां- भाणा मीट्ठा लागे तेरा, सरबंस दानिया वे देना कौन दउगा तेरा।’ यही नहीं अपने 4 पुत्रों के बलिदान पर भी गुरु गोबिंद सिंह ने कहा था, ‘इन पुतन के सीस पर वार दिए सुत चार। चार मुए तो क्या हुआ, जीवत कई हज़ार।’

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गुरु गोबिंद सिंह जी के पिता गुरु तेगबहादुर, मां और चारों बेटों सहित पूरे परिवार ने औरंगजेब के विरुद्ध धर्म युद्ध में वीरगति प्राप्त की थी। दिसंबर 1705 में चमकौर की लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह के दो बड़े बेटों अजीत सिंह और जुझार सिंह को युद्ध में संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त हुई। गुरु के छोटे बेटों जोरावर सिंह (आयु 9 वर्ष) और फतेह सिंह (आयु 7 वर्ष) सरहिंद के सूबेदार वजीर खान द्वारा पकड़ लिया गया। दोनों को इस्लाम में धर्मांतरित होने को कहा गया और बदले में जान बख्शने की बात थी। लेकिन दोनों बाल वीरों ने इससे इनकार कर दिया और दीवार में चिनकर मौत स्वीकार कर ली।

नौ वर्ष की आयु में पिता का हुआ बलिदान

बलिदान की परंपरा के श्रेष्ठ उदाहरण गुरु गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हुआ था। यहीं पर आज तख्त श्री पटना हरिमंदर साहिब नाम का गुरुद्वारा है, जिसे सिख समुजाय में एक तीर्थस्थल के तौर पर माना जाता है। यहां गुरु गोबिंद सिंह ने अपने जीवन के पहले चार साल बिताए थे। 1670 में उनका परिवार पंजाब लौट आया और मार्च 1672 में वे उत्तर भारत के हिमालय की तलहटी, शिवालिक श्रेणी, में चक्क नानकी में चले गए, जहां उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की। जब वे नौ वर्ष के थे, तभी उनके पिता नौवें गुरु तेगबहादुर की इस्लाम स्वीकार न करने पर मुगलों ने हत्या कर दी। उनके बाद वे दसवें सिख गुरु बने।

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