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Home दिल्ली

शीघ्र, सुलभ और सस्ता न्याय कब?

देश में प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर 100 न्यायाधीशों की नियुक्ति का कानून बनाने की केंद्र सरकार से मांग।

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 9, 2023
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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court
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मुरार कण्डारी


वर्तमान समय में भारत में न्यायालयों में दर्ज मुकदमों का निर्णय होने में 10 से 20 वर्ष का समय लग जाता है। हजारों मुकदमे 30 वर्ष से अधिक समय से लंबित पड़े हैं। अंग्रेजी में कहावत है – Justice delayed is justice denied. अर्थात न्याय में हुई देरी, न्याय से इंकार जैसा है।

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2018 में भारत सरकार के नीति आयोग ने एक दस्तावेज प्रकाशित किया था। जिसमें लिखा था – ‘अगर वर्तमान गति से न्यायालयों में मुक़दमों का निर्णय होता रहा, तो मुक़दमों को निपटाने में 324 वर्ष लग जाएंगे।’ सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अनेक सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने इसी प्रकार के वक्तव्य गत वर्षों में दिये हैं। दस वर्ष पूर्व न्यायालयों में 3 करोड़ मुकदमे लंबित पड़े थे अब 2022 समाप्त होते समय लंबित मुक़दमों की संख्या लगभग 5 करोड़ हो चुकी है। अगर लंबित पड़े मुक़दमों की संख्या इसी प्रकार बढ़ती रही, तो लोगों को न्याय मिलना दुर्लभ हो जाएगा। न्यायालयों में मुक़दमों के निर्णय में होने वाली भयंकर देरी के कारण आम जनता के लिए न्याय पाना अत्यंत महंगा भी हो गया है। न्यायालयों में लोगों का समय और संसाधनों का अपव्यय न्याय व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल है।

1987 में न्यायिक आयोग ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया था – ‘बढ़ते मुक़दमों की संख्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार को 10 लाख की जनसंख्या पर 50 न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था करनी चाहिए।’ 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका के आधार पर न्यायिक आयोग के उस सुझाव को लागू करने का निर्देश भी केंद्र सरकार को दिया था। 1987 में 10 लाख की जनसंख्या पर केवल 10 न्यायाधीश थे। अब 2022 में विभिन्न स्रोतों के अनुसार 10 लाख की जनसंख्या पर 15 न्यायाधीश हो पाए हैं। जब कि मुक़दमों की संख्या 1.5 करोड़ से बढ़कर 5 करोड़ तक पहुंच गई है।

विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में न्यायालयों में मुक़दमों का निर्णय 1 से 2 वर्ष में हो जाता है। वहां होने वाले इस शीघ्र न्याय में प्रमुख कारण न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या है। अमेरिका (USA) में 10 लाख की जनसंख्या पर 150 न्यायाधीश हैं और यूरोप के अनेक लोकतांत्रिक देशों में 10 लाख की जनसंख्या पर 200 न्यायाधीशों की व्यवस्था है।

उपरोक्त सब बातों पर विचार करके राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने 8 अगस्त 2022 को केंद्र सरकार से मांग की थी – ‘शीघ्र, सुलभ और सस्ता न्याय के लिए प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर 100 न्यायाधीशों की नियुक्ति का कानून बनाये।’ आज 8 फरवरी 2023 को उसको 6 महीने हो गए हैं। अभी तक केंद्र सरकार द्वारा इस मांग पर किसी सकारात्मक पहल का संदेश नहीं मिला है। अतः अब राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने इस मांग के समर्थन में जनजागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया है। चरणबद्ध तरीके से आम लोगों के समर्थन से सरकार पर जनदबाव बनाया जाएगा। हमारा यह अभियान और आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत और लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत होगा।

हम केंद्र सरकार से फिर मांग करते हैं – ‘शीघ्र, सुलभ और सस्ता न्याय के लिए प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर 100 न्यायाधीशों की नियुक्ति का कानून बनाये। साथ ही खाली पड़े न्यायाधीशों के पदों को 6 महीने के अंदर भरने का भी कानून बनाये।’ देश की समस्याओं के प्रति संवेदनशील प्रबुद्धजनों और आम नागरिकों से हम इस अभियान की सफलता के लिए हर प्रकार से सहयोग करने का अनुरोध करते हैं।

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