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Home राष्ट्रीय

एयरपोर्ट पर CM बदल देते थे राजीव, राहुल-खरगे के दौर में लगते हैं कई दिन?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 21, 2023
in राष्ट्रीय, विशेष
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Rahul-Kharge
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इस फॉर्मूले के तहत सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बनाए गए हैं और डीके शिवकुमार उपमुख्यमंत्री. सीएम चुनने में देरी के सवाल पर कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी महासचिव रणदीप सुरजेवाला पत्रकारों पर तंज कसते नजर आए. सुरजेवाला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री चुने जाने में देरी पर कहा- कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है और पिछले दो-तीन दिनों से सहमति बनाने की कोशिश की जा रही थी. 2 दिन तक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे लगातार सभी नेताओं से मंत्रणा कर रहे थे.

सुरजेवाला ने आगे कहा कि आप लोग कांग्रेस पार्टी से सवाल पूछ सकते हैं, इसलिए हमसे मुख्यमंत्री चुनने में देरी होने पर सवाल उठा रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी से आप इस तरह का सवाल नहीं पूछ सकते हैं. सुरजेवाला मुख्यमंत्री चुनने में देरी होने के सवाल को भले गोल-गोल घुमा दे, लेकिन पिछले 9 साल में कांग्रेस के लिए नेता (मुख्यमंत्री) चुनना टेढ़ी खीर साबित हुआ है. मुख्यमंत्री पद को लेकर ढील-ढाल रवैए की वजह से मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता चली गई.

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पंजाब और राजस्थान में भी पार्टी को खूब नुकसान हुआ है. राजस्थान में तो अब तक सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच तकरार जारी है. पायलट ने गहलोत सरकार को अल्टीमेटम दे रखा है.

राजीव गांधी के वक्त एयरपोर्ट पर ही मुख्यमंत्री बदलने वाली कांग्रेस को अब नेता चुनने में घंटों का वक्त क्यों लग जाता है?

पहले कहानी राजीव गांधी के दौर की
कांग्रेस के भीतर सबसे अधिक मुख्यमंत्री राजीव गांधी के दौर में ही बदले गए. राजीव गांधी काल में राजस्थान और बिहार में 5 साल के भीतर 4-4 मुख्यमंत्री बदल दिए गए. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी 3-3 मुख्यमंत्री बदले गए.

1990 में राजीव गांधी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को एयरपोर्ट पर बुलाकर इस्तीफा देने के लिए कह दिया था. राजीव कर्नाटक में हुए छिटपुट दंगों की वजह से नाराज थे.

पाटिल को हटाने के बाद एस बंगरप्पा को राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री बनाने का आदेश दे दिया. लिंगायत समुदाय से आने वाले पाटिल ने 1994 के चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाया और एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री बदलने के आदेश को खुद के अपमान से जोड़ दिया.

1984 में कांग्रेस और देश की सत्ता संभालने के बाद राजीव गांधी ने बिहार, यूपी, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में मुख्यमंत्री बदल दिए. दिलचस्प बात है कि मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी उस वक्त राजीव के खिलाफ विरोध के स्वर कहीं पर नहीं उठे.

वोटिंग के जरिए मुख्यमंत्री का चयन
राजीव गांधी के बाद कांग्रेस की कमान पीवी नरसिम्हा राव के हाथ में आ गई. राव ने अपने समय में वोटिंग के जरिए मुख्यमंत्री चयन को तरजीह दी. 1993 में मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह वोटिंग के जरिए ही मुख्यमंत्री चुने गए.

इसके 2 साल बाद केरल के करुणाकरण को हटाने के लिए भी त्रिवेंद्रम में विधायकों की बैठक बुलाई गई. विधायकों ने एक स्वर में उस वक्त एके एंटोनी को नेता चुन लिया.

सोनिया काल में पटेल की सिफारिश अहम
1998 में सीताराम केसरी से अध्यक्ष का पद छिन गया और सोनिया गांधी को पार्टी की कमान मिली. सोनिया गांधी के आने के बाद राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई.

कांग्रेस में मुख्यमंत्री चुनने के लिए ‘एक लाइन के प्रस्ताव’ प्रक्रिया की शुरुआत सोनिया काल में ही शुरू किया गया. इसके तहत जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनती थी, उन राज्यों में दिल्ली से ऑब्जर्वर भेजे जाते थे.

ऑब्जर्वर एक लाइन का प्रस्ताव लेकर दिल्ली आ जाते थे. उसके बाद सभी दावेदारों को दिल्ली बुलाया जाता था और मुख्यमंत्री नाम पर फैसला लिया जाता था. सोनिया काल में मुख्यमंत्री चयन में उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की सिफारिश अहम मानी जाती थी.

अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव थे. सोनिया किसी भी नियुक्ति से पहले पटेल से जरूर सलाह लेती थीं. पटेल खुद को हमेशा मैडम का मैसेंजर (संदेशवाहक) बताते थे.

सोनिया के दौर में अहमद पटेल ने अपने करीबी मुख्यमंत्रियों पर कभी भी संकट नहीं आने दिया. इनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का भी नाम है. गहलोत को पटेल का करीबी और विश्वसनीय दोस्त माना जाता था.

राहुल-खरगे के दौर में लग रहे घंटों का वक्त
पहले राहुल गांधी और अब मल्लिकार्जुन खरगे के दौर में मुख्यमंत्री चयन में घंटों की देरी हो रही है. राहुल के अध्यक्ष रहते कांग्रेस को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान चुनाव में जीत मिली थी.

तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री चुनने में कांग्रेस को 96 घंटा से अधिक का वक्त लग गया था. कांग्रेस ने उस वक्त भी दिल्ली में ही मुख्यमंत्री का विवाद सुलझाया था.

हालांकि, मुख्यमंत्री का मसला सुलझाने का दावा फेल रहा. मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार मुख्यमंत्री पद की वजह से ही गिर गई. राजस्थान में भी पार्टी के भीतर गुटबाजी जारी है.

राहुल के बाद अब मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं. खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद हिमाचल में मुख्यमंत्री का पेंच फंसा था. वहां भी प्रियंका गांधी ने सुलझाया था.

इसी तरह कर्नाटक का पेंच भी 72 घंटे से फंसा था, जिसे अंत में सोनिया गांधी ने सुलझाया. आखिर में सवाल है कि कांग्रेस में ऐसी स्थिति क्यों बनी हुई है?

1. कमजोर पड़ा हाईकमान- 2014 के बाद से ही कांग्रेस हाईकमान काफी कमजोर स्थिति में है. 2019 से 2022 तक तो पार्टी के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष तक नहीं था. अभी भी कांग्रेस में संगठन का पूरा पद रिक्त है.

कांग्रेस की कार्यसमिति के सदस्यों का भी मनोयन अब तक नहीं हुआ है. वहीं बड़े पद पर बैठे नेता खुद चुनाव नहीं जीत पा रहे हैं. खुद राहुल गांधी 2019 में कांग्रेस के गढ़ अमेठी से चुनाव हार चुके हैं.

प्रियंका गांधी भी उत्तर प्रदेश में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई हैं. ऐसे में जनाधार वाले नेता कांग्रेस हाईकमान के फैसले में आसानी से वीटो लगा देते हैं.

हालिया उदाहरण राजस्थान का है. सितंबर 2022 में कांग्रेस हाईकमान ने एक लाइन का प्रस्ताव पास कराने के लिए वहां ऑब्जर्वर भेजे थे, लेकिन सरकार के मंत्रियों ने विधायकों के इस्तीफे करा दिए. इस घटना को आलाकमान ने अनुशासनहीन की श्रेणी में रखा.

दिलचस्प बात है कि अब तक हाईकमान को चुनौती देने वाले नेताओं पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

2. वादा निभाने में हाईकमान फिसड्डी- कांग्रेस ने 2018 में छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पावर शेयरिंग का फॉर्मूला लागू किया था. इस फॉर्मूले के तहत राज्य के 2 मजबूत दावेदारों को ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी.

छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव के समर्थकों का कहना है कि राहुल गांधी ने उनसे ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था, लेकिन जब बारी आई तो यह अमल नहीं हो पाया.

ठीक उसी तरह सचिन पायलट गुट का भी आरोप है. पायलट गुट का कहना है कि कांग्रेस हाईकमान ने अशोक गहलोत को हटाने का वादा किया था, लेकिन इसे अब तक पूरा नहीं किया गया है.

शिवकुमार और सिद्धारमैया में भी पावर शेयरिंग को लेकर भी यही पेंच फंसा था. सूत्रों के मुताबिक राहुल और खरगे से जब नहीं माने तो अंत में सोनिया गांधी ने शिवकुमार को फोन कर उन्हें वादा पूरा करने का भरोसा दिलाया है.

3. बड़े नेताओं को देने के लिए कुछ नहीं- 2012 में उत्तराखंड में भी कांग्रेस में मुख्यमंत्री की दावेदारी को लेकर विवाद फंसा था. उस वक्त कांग्रेस ने दूसरे मजबूत दावेदारी हरीश रावत को केंद्र में बड़ा पद दे दिया.

2014 के बाद से कांग्रेस के पास देने के लिए कुछ नहीं है. पार्टी कई राज्यों की विधानसभा और लोकसभा चुनाव में लगातार हार रही है. दूसरी तरफ सत्ताधारी बीजेपी है, जो कांग्रेस से आए मजबूत नेताओं को तुरंत बड़ा और लाभ वाला पद दे देती है.

कांग्रेस के नेता इसलिए भी हाईकमान के सामने डटे रहते है और नेता चुनने में काफी वक्त लग जाता है.

4. लॉबी यानी गुटबाजी भी ठोस वजह- अखिल भारतीय से लेकर प्रदेश स्तर पर कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है. जब भी किसी राज्य में सरकार बनती है, तो ये गुट हाईकमान के सामने अपनी दावेदारी ठोक देते हैं.

कर्नाटक में सिद्धारमैया और शिवकुमार के अलावा जी परमेश्वर गुट ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावा ठोका था. सभी गुट के एकसाथ एक्टिव होने की वजह से हाईकमान को सबसे रायशुमारी करनी पड़ती है.

दिल्ली और प्रदेश स्तर के गुटों में सामंजस्य बनाने के चक्कर में कांग्रेस में नेता चुनने में वक्त लगता है.

जाते-जाते कर्नाटक में कैसे सुलझा विवाद, इसे जानिए…
2 दिन तक माथापच्ची करने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने कर्नाटक के लिए एक फॉर्मूला निकाला. इस फॉर्मूले के तहत सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उप-मुख्यमंत्री बनाए जाने का फैसला किया गया.

शिवकुमार को जब इस फॉर्मूले के बारे में बताया गया तो उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया. देर रात खरगे और सुरजेवाला के बीच मीटिंग हुई, जिसके बाद सोनिया गांधी से संपर्क साधा गया.

सोनिया गांधी ने शिवकुमार से बातचीत की और उनसे जो भी वादे किए गए हैं, उसे पूरा करने का भरोसा दिया. शिवकुमार सोनिया गांधी से बातचीत के बाद मान गए.

कांग्रेस ने घोषणा में कहा है कि शिवकुमार डिप्टी सीएम के साथ-साथ 2024 तक प्रदेश अध्यक्ष भी रहेंगे.

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