नई दिल्ली। नई दिल्ली देश में ड्रग्स का काला कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। तस्कर अलग-अलग रूट और माध्यम से विदेश से ड्रग्स की खेप भारत में मंगा रहे हैं। इस धंधे में दुनिया के विभिन्न शहरों की चेन बनी हुई, जो हर लेवल पर सक्रिय है। इसके बाद देश में जांच में तमाम अड़चनें और जांच में सहायक आधुनिक उपकरणों की कमी तस्करों के लिए वरदान साबित हो रही है। विदेश से देश में आने वाले ड्रग्स का कारोबार इंटरनेट और कोरियर पर टिका है।
दो तरीकों से भेजा जाता है कोरियर
तस्कर डार्क वेब पर ऑर्डर और पैसे लेते हैं इसके बाद कोरियर के द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में भेजते हैं। कोरियर को दो तरीके से भेजा जाता है। पहला हवाई माध्यम और दूसरा जलमार्ग से। हवाई माध्यम से कम मात्रा में ड्रग्स की तस्करी की जाती है। इसे विभिन्न प्रकार के सामानों में छिपाया जाता है और पार्सल का रूप देकर कोरियर द्वारा भेज दिया जाता है। ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिसमें डोप पैडलर ड्रग्स का कैप्सूल निगलकर यात्रा करते हैं। मंजिल पर पहुंचने के बाद शौच या आपरेशन के माध्यम से बाहर निकालते हैं।
जलमार्ग से आने वाली ड्रग्स की बड़ी होती खेप
जलमार्ग से भेजी जाने वाली ड्रग्स की खेप बड़ी होती है। इसे पैकेट बनाकर कंटेनरों में रखा जाता है, चूंकि बंदरगाहों पर हजारों की संख्या में कंटेनर होते हैं। ऐसे में सभी कंटेनरों की ठीक तरीके से जांच नहीं हो पाती।
दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने बताया कि कोरियर कंपनियां पार्सल की जांच ठीक तरीके से नहीं करती हैं। इनके पास न तो जांच के उपकरण हैं और न ही ड्रग्स का सूंघ कर पता लगाने वाले डाग स्क्वायड। इन खामियों का फायदा ड्रग्स तस्कर उठाते हैं।
दिल्ली पुलिस ने इस मसले को हल करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी पालिसी बनाने का सुझाव दिया है। इसमें कोरियर कंपनियों को पार्सलों की जांच के लिए उपकरण और डाग स्क्वायड आदि रखने को कहा गया है। यही हाल बंदरगाहों पर कंटेनरों का है यहां पर कोरियर का पार्सल कंटेनर में रखा जाता है, लेकिन उसकी जांच नहीं हो पाती है।
ड्रग्स का उत्पादन करने वाली दो बड़ी जगहों के बीच में है भारत
देश में ड्रग्स का काला कारोबार बढ़ने के पीछे का कारण गोल्डन ट्राइएंगल और गोल्डन क्रिसेंट के बीच में होना है। गोल्डन ट्राइएंगल (त्रिकोण) वह क्षेत्र है जिसमें थाईलैंड, लाओस और म्यांमार की सीमाएं रुक और मेकांग नदियों के संगम पर मिलती हैं। यहां पर दुनिया में हेरोइन के 75 प्रतिशत का उत्पादन किया जाता है।
गोल्डन क्रिसेंट (अर्धचंद्र) क्षेत्र में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान शामिल हैं। इस क्षेत्र में भारी मात्रा में अफीम का उत्पादन होता है। यह स्थान अफगानिस्तान और पाकिस्तान की पहाड़ी परिधि को कवर करता है, जो पूर्वी ईरान तक फैला हुआ है।
ऐसे में दो प्रमुख ड्रग्स उत्पादक क्षेत्रों
पूर्व में गोल्डन ट्राइएंगल (दक्षिण पूर्व एशिया) और पश्चिम में गोल्डन क्रिसेंट यानी अफगानिस्तान-ईरान और पाकिस्तान के बीचो-बीच भारत है। इन दोनों जगहों से भारत में भारी मात्रा में ड्रग्स भेजी जाती है।
अधिकारियों का कहना है कि गोल्डन ट्राइएंगल और गोल्डन क्रिसेंट से सबसे पहले ड्रग्स भारत भेजी जाती है। गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल के बंदरगाहों पर भारी मात्रा में ड्रग्स पहुंचती है। यहां से इसे देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित फैक्ट्री में भेजा जाता है। वहां पर उच्च गुणवत्ता वाली अलग-अलग ड्रग्स तैयार की जाती है। इसके बाद उसे विदेश भेजा जाता है।
वैध आयात की आड़ में देश में पहुंचती है हेरोइन जैसी ड्रग्स
पुलिस सूत्रों ने बताया कि अफगानिस्तान से देश में भारी मात्रा में हेरोइन आती है। इसमें सबसे अधिक तस्करी जलमार्ग से होती है। तस्करों ने अपना तरीका बदल लिया है। वे शुद्ध गुणवत्ता वाली ड्रग्स भेजने के बजाये कच्चा माल भेजते हैं। इसके लिए वे वैध रूप से अफगानिस्तान से भारत भेजी जाने वाली तालक पत्थर, तुलसी के बीज, मुलेठी की जड़ आदि में ड्रग्स का लेप लगा कर भेजते हैं। इससे प्रवर्तन एजेंसियों के लिए ड्रग्स का पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है।
तस्करों में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके पास भारत का आयात निर्यात कोड (आइईसी) भी होता है। वे वैध सामानों के आयात-निर्यात के बहाने ड्रग्स का कारोबार करते हैं।







