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अमेरिका में होने वाली हथियारों की डील से क्या बदलेगा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 21, 2023
in विशेष, विश्व
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सुजान चिनॉय


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा का विशेष महत्व है. यह दूसरी बार है जब वह अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे. खास बात ये है कि यह राष्ट्रपति जो बाइडेन की ओर से आयोजित तीसरी राजकीय यात्रा है. ये तब और जरूरी हो जाती है जब हम अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझोदारी को आगे बढ़ाने पर गहन विचार कर रहे हैं.

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अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसके पास बेहतरीन तकनीकें और सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है. यदि हमें सर्वश्रेष्ठ बनना है तो भारत को अमेरिका की तकनीकों पर ध्यान देना होगा. खास तौर पर 2010 से 2020 के बीच, 2017 से 2021 के बीच अमेरिका और भारत के बीच तकरीबन 16 बिलियन डॉलर की प्रत्यक्ष वाणिज्यिक बिक्री हुई . इसके अलावा हमने फॉरेन मिलिट्री सेल्स में भी बढ़ोतरी देखी. जो तकरीबन 5 बिलियन डॉलर थी. यानी की 1950 से अब तक भारत और यूएस के बीच हुए फॉरेन मिलिस्ट्री सेल्स का एक तिहाई.

हमने C-130J विमान की खरीद देखी है, हमने C-17 ग्लोबमास्टर भी देखा. हेलीकॉप्टर, चिनूक और अपाचे और कई अन्य सौदे देखे. अब प्रीडेटर ड्रोन की संभावित डील से भारत की सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता में काफी बढ़ोतरी होगी.

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर
अब जोर टेक्नोलॉजी के अधिग्रहण पर नहीं बल्कि उसके वास्तविक हस्तांतरण पर है. उन सभी क्षेत्रों में जहां भारत को अपनी क्षमताओं को वास्तविक रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है. खासतौर से हमें लड़ाकू जहाजों के लिए एयरो इंजन प्रौद्योगिकी की जरूरत है.

हम कावेरी इंजन से गुजर चुके हैं. हमने काफी प्रयास किया, लेकिन वह प्रयास पर्याप्त नहीं था. उदाहरण के तौर पर हमने देखा कि कैसे चीन ने कुछ शुरुआती झटकों के बाद अपने लड़ाकू विमानों की एक श्रृंखला पर WS10 इंजन तकनीक को विकसित किया.

हालांकि यह बाहरी सहायता के बिना नहीं किया गया था. CFM 56 Aero Engine Technology, जो GE और फ्रांस के Safran का संयुक्त उत्पादन है, ने चीन को रिवर्स इंजीनियरिंग द्वारा अपनी तकनीकों को हासिल करने में सक्षम बनाया. भारत के मामले में, हमारे रक्षा भागीदारों के साथ हमारे संबंध स्पष्ट हैं. हम इसे पश्चिम, विशेष रूप से अमेरिका के साथ साझेदारी में करने जा रहे हैं

द्विपक्षीय संबंध
अमेरिका के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध बदलते समय का प्रतिबिंब हैं. आज एक नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था, एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक को बनाए रखने में हमारा साझा हित है. अक्सर चीन अमेरिका को एक अतिरिक्त क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर धिक्कारता है, लेकिन अमेरिका वास्तव में रेजिडेंट पावर है. यह एक ऐसी शक्ति है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंडो-पैसिफिक थिएटर में स्थिरता प्रदान की है, जापान, कोरिया और जापान में फैले सैनिकों और संसाधनों के संदर्भ में निवेश, आर्थिक साझेदारी और मौलिक उपस्थिति के माध्यम से इसके जबरदस्त हित हैं.

इसलिए, सैन्य अभ्यास, व्यापार और आर्थिक साझेदारी के माध्यम से हम अमेरिका के साथ जो करते हैं, उसकी 21वीं सदी में शांति और सुरक्षा के उभरते प्रतिमानों के लिए बहुत प्रासंगिकता है.

अमेरिका से बड़ी उम्मीदें
अमेरिका अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग मानता है, लेकिन जब जम्मू और कश्मीर की बात आती तो वह तटस्थ नीति अपनाता है. वास्तविक तौर पर देखें तो इसका मतलब है कि वह इस क्षेत्र को विवादित मानता है. 1960 के दशक में, जियोग्राफर रॉबर्ट हडसन ने युद्धविराम रेखा को काराकोरम तक विस्तारित किया. यह पाकिस्तानी रुख को दर्शाता है.

आज, अमेरिका काराकोरम तक फैली नियंत्रण रेखा को नहीं दिखाता है, जो कि एक बदलाव है. यह ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट में 5180 वर्ग किमी के क्षेत्र को दर्शाता है जो 2 मार्च, 1963 के उनके तथाकथित समझौते के परिणामस्वरूप पाकिस्तान द्वारा चीन को अवैध रूप से सौंप दिया गया है, यदि अमेरिका अमेरिका मौलिक रूप से भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है, विशेष रूप से अक्साई-चिन के संबंध में, तो वर्तमान चुनौतियों के संबंध में हमारी रक्षा साझेदारी आगे और तेजी से आगे बढ़ेगी.

भारत की सामरिक स्वायत्तता
भारत की विदेश नीति में हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता का तत्व रही है. आज, हम अमेरिका के एक प्रमुख और मौलिक भागीदार हैं, लेकिन हम संधि-आधारित सहयोगी के अर्थ में सहयोगी नहीं हैं. हमारी रक्षा साझेदारी बहुत लंबी हो गई है. पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने माना कि भारत अमेरिका रक्षा सहयोग समझौते को आगे बढ़ाएंगे. 2016 में, भारत को एक प्रमुख रक्षा भागीदार का लेबल दिया गया था. 2018 में, हमें सामरिक व्यापार प्राधिकरण टियर 1 दिया गया था. आज हम उन हालात में हैं जहां से हम रक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकते हैं.

व्यापारिक संबंध
हमें अमेरिका के साथ अपने व्यापार संबंधों और समग्र आर्थिक साझेदारी को बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा. 500 बिलियन डॉलर एक अच्छा लक्ष्य है, विशेष तौर पर ऐसे समय में जब हम अपने समग्र व्यापार की मात्रा के मामले में आगे बढ़ रहे हैं. भारत आज बहुत निर्यात कर रहा है, जल्द ही 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छू सकते हैं. विशेष तौर पर जब दुनिया भर की नीतियां डीकपलिंग और डी रिस्किंग की नीति के साथ आगे बढ़ रही हैं. ऐसे में अमेरिका को यह सुनिश्चित करने का हर संभ प्रयास करना चाहिए कि वह भारत जैसे मित्र देश के साथ आपूर्ति श्रृंखलाओं को डी रिस्किंग प्रोसेस के तौर पर आगे ले जाए.

पूर्वी एशिया का हर देश जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरा, चाहे वह जापान हो या चीन, वे सभी उदार संबंधों और अमेरिका में दुनिया के सबसे बड़े बाजार तक पहुंच के कारण आर्थिक शक्तियों के रूप में उभरे. यदि भार अमेरिकी बाजार तक अधिक पहुंच बना सकता है तो वह भी बड़ा बाजार बन सकता है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि अमेरिका को वरीयता की सामान्यीकृत प्रणाली के विशेषाधिकारों को बहाल करना होगा, जो 2019 में ट्रम्प प्रशासन के तहत वापस ले लिया गया था.

द्विपक्षीय व्यापार आज पहले से ही 128 बिलियन डॉलर के क्षेत्र में है. अमेरिका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा है. हमें यह भी देखना होगा कि जब भारत यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र की अनुचितता का मुद्दा उठाता है तो अमेरिका विश्व व्यापार संगठन में भारत की मदद कैसे कर सकता है.

अमेरिका को स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी में भारत की मदद करने पर विचार करना चाहिए. हमें साइबर क्षेत्र, अंतरिक्ष रक्षा में और भी बहुत कुछ करना चाहिए. यही कारण है कि एंटनी ब्लिंकन और जेक सुलिवन की हाल की यात्राएँ अत्यंत महत्वपूर्ण थीं. साथ में, वे औद्योगिक और रक्षा सहयोग और महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए पहल के लिए द्विपक्षीय भारत-अमेरिका रोड मैप को आगे बढ़ाएंगे.

बोइंग सौदा और भारतीय नागरिक उड्डयन
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सौदा है जिसके बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि वह 1 मिलियन अमेरिकी नौकरियों का समर्थन करेगा. यह बहुत सारा पैसा है, बहुत सारे विमान हैं, और ढेर सारी नौकरियां है. भारत ऐसे विमानों के लिए भुगतान कर सकता है जो दुनिया में सबसे अच्छे हैं. इसके बिना, भारत अपने नागरिक उड्डयन उद्योग को बढ़ावा नहीं दे सकता.

हालांकि भारत के लिए अमेरिका और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह अपने स्वयं के नागरिक उड्डयन निर्माण उद्योग को कैसे विकसित कर सकता है. हमने सीई 295 परिवहन विमान के लिए टाटा एयरबस के सौदे पर हस्ताक्षर के साथ एक छोटी सी शुरुआत की है, लेकिन यह सेना के लिए है. दूसरी ओर, हमने देखा है कि चीन ने हाल ही में डीसी 919 नागरिक विमान कैसे विकसित किए हैं. इंजन एक आयातित तकनीक है लेकिन चीन विनिर्माण आधार विकसित करने के लिए अपनी ओर से कुछ कर रहा है. हमें भी ऐसा करना चाहिए और इसमें भी अमेरिका को भारत की मदद करनी चाहिए ताकि भारत न केवल अमेरिका निर्मित विमान खरीदना जारी रखे, बल्कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी क्षमता हासिल करे.

मोदी सरकार के नौ साल
मोदी सरकार के नौ साल में खासकर विदेश नीति के मामले में भारत को बहुत सफलता मिली है. भारत ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जैसी चीजों में पीएम मोदी के नेतृत्व में दुनिया भर में खुद को साबित किया है> ‘वन वर्ल्ड वन सन वन ग्रिड’ और इंटरनेशनल सोलर एलायंस के संबंध में पहल की है. नवीकरणीय ऊर्जा और पंचामृत और अन्य पहलों के माध्यम से 2030 के लिए निर्धारित अपने पेरिस जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को पूरा करने की भारत की क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया गया है. हमने देखा है कि कैसे भारत ने आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए पहल की है. इसके तहत लचीला द्वीप राज्यों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की पहल की है.

भारत सक्रिय रहा है, चाहे वह यमन से लोगों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन राहत हो, और बाद में महामारी के दौरान, ऑपरेशन समुद्र सेतु या वंदे भारत मिशन. हमारे छात्रों को यूक्रेन से वापस लाने के लिए ऑपरेशन गंगा और अफ्रीका में संकटग्रस्त क्षेत्रों से हमारे लोगों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन कावेरी भी भारत ने बाखूबी चलाया था.

संपूर्ण रणनीतिक दृष्टिकोण भारतीय रणनीतिक सोच से ओत-प्रोत है. भारत ने जी20 और एससीओ की अध्यक्षता में निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं की सदस्यता सफलतापूर्वक हासिल कर ली है और ब्रिक्स प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया है. इसमें, भारत न केवल अपने लिए, न केवल सत्य और धार्मिकता के मूल्यों के लिए बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए एक आवाज के रूप में भी बोलेगा.


(लेखक मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के महानिदेशक हैं)

 

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