पुनीत त्रिपाठी
इस हफ्ते दिल्ली बाढ़ के संकट से जूझती रही. यमुना का जलस्तर ख़तरे के निशान को पार गया. पहाड़ों पर हुई बारिश का नतीजा ये हुआ कि लगभग पूरा उत्तर-पश्चिम भारत बाढ़ की ज़द में आ गया. हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से पानी छोड़े जाने के बाद दिल्ली का जो हाल हुआ वैसा पिछले 40 साल में नहीं हुआ था. इसी दौरान एक ख़ास तरह की चर्चा सोशल मीडिया पर दिखने को मिलीं. तस्वीरें भी आईं. पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा,
‘ये कहना गलत होगा कि यमुना की वजह से दिल्ली में बाढ़ आ गई है. जिस भूमि पर यमुना अभी बह रही है, वो असल में इस नदी का ही है. एक के बाद एक कई सरकारों ने यमुना की जमीन पर निर्माण की अनुमति दी. इसमें राजघाट, शांति वन, राजघाट पावर प्लांट, स्वामीनारायण मंदिर, इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, कॉमनवेल्थ गांव, मेट्रो यार्ड, मेट्रो स्टेशन और कई कॉलोनियां बनाई गई.
आपने यमुना का रास्ता रोकने की कोशिश की.
यमुना सिर्फ उस रास्ते को वापस लेने की कोशिश कर रही है, जो उसका है.’ इसके साथ मंडल ने एक फोटो भी शेयर किया, जिसमें यमुना लाल किले के पास के बह रही है. उन्होंने ये दावा किया कि फोटो ब्रिटिश संग्रहालय से लिया हुआ है. इंडियन फॉरेस्ट सर्विस के अफसर परवीन कासवान ने भी ऐसी ही एक तस्वीर शेयर की है. ये फोटो 1854 का बताया गया है. इसमें भी यमुना लाल किले के ठीक सामने नज़र आ रही है.
अगर आप दिल्ली में रहते हैं या राजधानी घूम चुके हैं तो जानते होंगे कि इस बाढ़ से पहले लाल किला और यमुना को आसपास सोचना भी दुश्वार था. तो फिर ये तस्वीरें, ये दावे एक अलग कहानी क्यों बयां कर रहे हैं? क्या सच में यमुना लाल किले के बगल से बहती थी? क्या यमुना अपने पुराने रास्ते पर लौटी है?
इस बात की पुष्टि करने के लिए आजतक के रिपोर्टर कुणाल कुमार ने इतिहासकार और लेखिका राना सफ्वी से बात की. राना ने ‘शाहजहांनाबाद – द लिविंग सिटी ऑफ ओल्ड दिल्ली’ नाम की किताब लिखी है. राना बताती हैं,
‘जिस समय राजधानी बनाने के लिए दिल्ली को चुना जा रहा था, तब शाहजहां के करीबियों ने उन्हें सलाह दी कि लाहौर में नदी नहीं है. इसलिए लालकिले को यमुना के किनारे बनाया जाए.’ इसी बिना पर शाहजहांनाबाद बनाया गया, जो तब के मुग़ल सामराज्य की राजधानी बनी. राना ने ये भी बताया कि उनके उम्र के लोगों को यमुना का पुराना रास्ता याद है. उन्होंने कहा,
‘मेरे उम्र के लोग, यानी महज कुछ दशक पहले तक लोग बताते हैं कि यमुना लालकिले के नजदीक से ही गुजरती थी. 1978 में जब दिल्ली में बाढ़ आई तब भी एजेंसियों ने हालात बदलने की कोशिश की. लेकिन यमुना ने इस साल घर वापसी की और लालकिले के पास आ गई.’
यानी, इस नदी ने लगभग 50 साल पहले अपने रूट बदला था. निर्माण कार्य के साथ यमुना का पानी सूखता गया और इस वजह से ये नदी पतली होती गई और सिमट गई.
कुणाल ने यमुना के इस व्यवहार पर लेखक और इतिहासकार शशांक शेखर सिन्हा से भी बात की. शशांक ने ‘दिल्ली, आगरा, फ़तेहपुर सीकरी’ नाम की चर्चित किताब लिखी है. इसमें उन्होंने मुग़ल सामराज्य के तीनों राजधानियों की कहानी बताई है. शशांक ने आजतक से बात करते हुए बताया,
‘यमुना शुरु से ही चंचल नदी रही है और अपना रुख बदलती रही है. अगर पांडवों की राजधानी (इंद्रप्रस्थ) की बात करें तो वो पुराना किला के आसपास थी. पाषाण काल में यमुना वल्लभगढ़ के पास अरावली पहाड़ों से निकलकर पूर्व की तरफ जाती थी. दिल्ली में इस नदी के पुराने चैनल नजफगढ़, सूरजकुंड और बटकल में दिखते हैं.
हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि यमुना की पेटी यानी रिवर बेड पिछले एक सदी में बहुत ज़्यादा बदली हो. अंग्रेजों की राजधानी कोलकाता से दिल्ली (1911 में) आने का इतिहास भी यमुना से ही जुड़ा है. ऐसा बताया जाता है कि तब अंग्रेज अपनी राजधानी मौजूदा बुराड़ी के पास ही यमुना के किनारे बनाना चाहते थे. हालांकि, ये प्लान बदल दिया गया. इसकी वजह, यमुना की बाढ़ बताई गई. वहां ज्यादा लागत लगना भी एक वजह थी. इसके बाद नई दिल्ली को राजधानी के रूप में चुना गया.’
पुरानी दिल्ली के जानकार फ़िरोज बख़्त अहमद ने कुणाल से बातचीत में बताया कि यमुना सिर्फ लाल किले के पास से ही नहीं गुजरती थी, बल्कि उससे बनाई गई नहरे लाल किले के भीतर और चांदनी चौक में भी पानी पहुंचाने का काम करती थीं. फ़िरोज बख़्त ने ये भी बताया कि लाल किले की बुनियाद में ख़ास किस्म की मलेशियाई लकड़ी लगाई गई है, जिस वजह से वो इतने पानी के बहाव को झेल लेती है.
इस दौरान इतिहासकार ये दावा भी करते हैं कि यमुना और किले के बीच एक रेत का मैदान था. जिसमें हाथियों की लड़ाई होती थी. जिसे राजा-प्रजा अपने किले और घरों से देखती थी.
फिलहाल बाढ़ से घिरी दिल्ली के लिए थोड़ी राहत की खबर आई है. यमुना का जलस्तर में कमी आई है. हालांकि, खबर लिखे जाने तक जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर है.







