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Home राष्ट्रीय

बजट सत्र से पहले राम-राम बोले मोदी, राम का नाम ही काफ़ी !

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 5, 2024
in राष्ट्रीय, विशेष
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PM Modi
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प्रकाश मेहरा


नई दिल्ली: क्या आपने संसद के बजट सत्र से एन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मीडिया उ‌द्बोधन सुना? उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत और समापन ‘राम-राम’ से किया। इसके तत्काल बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के अभिभाषण में भी राम मंदिर का जिक्र आया। क्या केंद्र सरकार राम नाम के भरोसे अगले चुनावी समर में उतरने जा रही है?

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अंतरिम बजट लोक लुभावन रहा

कोई कुछ भी कहे, पर मुझे ऐसा नहीं लगता। भरोसा न हो, तो राष्ट्रपति के अभिभाषण के अगले दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो अंतरिम बजट पेश किया, उस पर नजर डाल देखिए, सब साफ हो जाएगा। मोदी और उनके सहयोगी तीसरे कार्यकाल की प्राप्ति के लिए इतने आश्वस्त हैं कि इस बार कोई लोक-लुभावन घोषणा नहीं की गई। पिछली बार चुनाव से पहले किसानों को प्रति वर्ष छह हजार रुपये की राशि आज देने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा मध्यवर्ग के लिए आयकर की सीमा बढ़ाने के साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को पेंशन का तोहफा दिया गया था। यह दांव काम कर गया था और एनडीए पहले से ज्यादा सदस्यों के साथ लोकसभा पर काबिज हो गया।

प्रधानमंत्री की राम-राम पर केंद्रित

साफ है, प्रधानमंत्री इस बार नई दिल्ली के सर्वोच्च सदन में वापसी के मुद्दे पर पूरी तरह आश्वस्त हैं। आप चाहें, तो अंतरिम बजट को सरकार के आत्मविश्वास का दस्तावेज मान सकते हैं। यही वजह है कि मैं आज की चर्चा चुनाव के बजाय प्रधानमंत्री के ‘राम-राम’ पर केंद्रित रखना चाहता हूं। उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों को जानने वाले जानते हैं कि आपसी अभिवादन के लिए राम-राम से ज्यादा प्रचलित शब्द कोई और नहीं है। आज जिन लोगों को इन अल्फाजों में किसी धर्म विशेष की झलक दिखाई पड़ती है, उन्हें बताने में हर्ज नहीं कि चार दशक पहले तक इस सम्बोधन से किसी को परहेज न था। इस खूबसूरत तथ्य को समझाने के लिए अपने बचपन के एक अनुभव से आपको रूबरू कराना चाहूंगा।

हमारे गांव में महज एक मुस्लिम परिवार रहता था। अलादीन खान साहब उसके मुखिया हुआ करते थे। वे विनम्र स्वभाव, पर रोबीली शख्सियत के स्वामी थे। उनकी ओर से वार्तालाप की शुरुआत हमेशा राम-राम से हुआ करती। पिता ने सिखाया था कि अगर मुस्लिम परिचितों से मिलो, तो उन्हें ‘आदाब’ बोला करो, पर अलादीन साहब आदाब का जवाब भी राम- राम से देते। क्या उन पर कोई सामाजिक दबाव था? कतई नहीं। वे जिस रवायत का हिस्सा थे, वहां ये शब्द सदियों से आम आदमी की भावसत्ता का प्रतीक हुआ करते थे। धार्मिक विभाजनों और विग्रहों का इससे कोई वास्ता नहीं था। तीन दशक पहले हिमाचल प्रदेश में समान अनुभव हुआ था। जकल धर्मशाला के जिला सूचना विभाग में एक चपरासी थे- रामलाल। बेहद शिष्ट और हरदम मदद के लिए तत्पर। बाद में जिला सूचना अधिकारी ने बताया था कि मुसलमान होने के बावजूद वह रामलाल कहलाना पसंद करते हैं।

अफसरों को सैल्यूट करते राम-राम

जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं। भारतीय सेना की कुछ इकाइयों के जवान आज भी अपने अधिकारियों और सहयोगियों का सत्कार इन्हीं दो लफ्जों के साथ करते हैं। धर्म और संप्रदाय इसमें कभी बाधा नहीं बनते।

यहां एक किस्सा याद आता है। सन 1971 की जंग के बाद भारत ने पाकिस्तानी फौज के 90 हजार से ज्यादा सिपाहियों और अधिकारियों को युद्धबंदी बना लिया था। ये लोग देश की विभिन्न छावनियों में रखे गए थे। उसी दौरान एक भारतीय जवान से पाकिस्तानी फौज के वरिष्ठ अफसर ने पूछा कि तुम नाम से तो मुसलमान हो,पर अपने अफसरों को सैल्यूट करते वक्त राम-राम जी बोलते हो। ऐसा क्यों? तुम्हें तो ‘अस्सलाम वालेकुम’ बोलना चाहिए। हमारे जवान का जवाब था कि जब तक में ड्यूटी पर होता हूं, तब तक यही बोलता हूं। यह हमारी रेजीमेंट की परंपरा है और हममें से हर कोई इस पर गर्व करता है। ड्यूटी के बाद मैं किससे क्या बोलूं, इस पर कोई पाबंदी नहीं है।

पाकिस्तानी अधिकारी और उसके सहयोगी इस जवाब पर हक्का-बक्का रह गए थे।

पता नहीं, वे समझ पाए थे या नहीं कि एक सा डीएनए और समान इतिहास के बावजूद इस वैषम्य को सियासी स्वार्थ के लिए जतन के साथ गढ़ा गया था। वे जिनकी संतानें थे, उन्होंने मजहब के आधार पर मुल्क का बंटवारा कुबूल किया था, जबकि हिन्दुस्तानी सैनिक के वालिदैन मौका मिलने के बावजूद अपनी सरजमीं और संस्कारों को छोड़कर नहीं गए। पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना, इसीलिए समय के साथ धार्मिक आग्रह वहां की जेहनियत पर हावी होते चले गए। भारत ने सर्वधर्म समभाव का रास्ता चुना और तमाम मतभेदों के बावजूद इस राह पर आगे बढ़ता गया।

भारत और पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति

भारत और पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति के बीच बढ़ता वैषम्य इसी का नतीजा है।

हो सकता है, आपमें से कुछ दोस्त अलादीन खान साहब और अनाम सिपाही के किस्सों से यह मतलब निकाल बैठें कि हिंदुओं की बहुसंख्या वाले देश में अल्पसंख्यकों को रंग-ढंग बदलना पड़ जाता है। सहोदर पाकिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण है। वहां कई हिंदू अल्पसंख्यक अपने बच्चों का नामकरण ऐसे करते हैं कि अगर कोई सिर्फ नाम से मजहब जानने की कोशिश करे, तो आसानी से समझ न सके कि सामने खड़ा शख्स किस धर्म को मानता है। भारत में ऐसा नहीं है। हम साथ रहते हैं और एक-दूसरे पर असर डालते हैं। 1970 के दशक के आखिर में मेरी ममेरी बहन की शादी एक इंजीनियर से हुई। बहनोई साहब जब पहली बार हमारे घर आए, तो उनका पहला दिन यादगार बन गया। उन्होंने सुबह की शुरुआत ‘आदाब’ से की, क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई थी। किसी ने इसे अस्वाभाविक नहीं माना।

क्या आपको नहीं लगता कि वह मासूमियत रास्ता भटक रही है?

इस लेख की शुरुआत में मैंने इसीलिए 1980 के दशक का उल्लेख किया था। इसी दौरान ‘राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन’ आंरंभ हुआ था। उस जद्दोजहद के दौरान हुई हिंसा और ध्वंस बचाया जा सकता था, अगर सियासतदां इसे ईमानदारी से कानून और अदालतों के हवाले कर सिर्फ अपनी शपथ का पालन करते रहते। ऐसा नहीं किया गया। हमने आस्था को वोट बैंक की राजनीति में बदलने की कोशिश की, जिसका दुष्परिणाम सामने है।

मोदी के सत्ता संभालने पर

तेजी से पनपते हुए इस अलगाव को तभी रोका जा सकता है, जब हम चेहरों पर चस्पां मुखौटों की असलियत पहचान कर आगे का रास्ता निर्धारित करें। नरेंद्र मोदी यही कर रहे हैं। वे जानते हैं, ढकोसलों से किसी का भला नहीं होता। अपनी पहचान को कायम रखते हुए दूसरे की पहचान को स्वीकार करने में भला क्या हर्ज ? यहां याद दिलाना ठीक रहेगा कि अब तक किसी प्रधानमंत्री ने अपना संबोधन राम-राम या सत श्री अकाल से शुरू नहीं किया है। मोदी ने सत्ता संभालने के बाद कई काम पहली बार किए। उनकी यह भाव मुद्रा इस सिलसिले की अगली कड़ी है।


तेजी से पनपते हुए इस अलगाव को तभी रोका जा सकता है, जब हम चेहरों पर चस्पां मुखौटों की असलियत पहचान कर आगे का रास्ता निर्धारित करें। नरेंद्र मोदी यही कर रहे हैं। वे जानते हैं, ढकोसलों से किसी का भला नहीं होता। अपनी पहचान को कायम रखते हुए दूसरे की पहचान को स्वीकार करने में मला क्या हर्ज? : प्रकाश मेहरा

 

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