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Home राजनीति

उत्तराखंड में शिक्षा और शराब पर जंग, शराब पर छूट शिक्षा में लूट!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 18, 2025
in राजनीति, राज्य, विशेष
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शिक्षा और शराब
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


देहरादून: उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस खूबसूरत राज्य में दो परस्पर विरोधी मुद्दे—शिक्षा और शराब—लंबे समय से सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का केंद्र बने हुए हैं। एक ओर जहां शिक्षा को समाज के उत्थान और युवाओं के भविष्य का आधार माना जाता है, वहीं शराब की बढ़ती लत और इसके सामाजिक प्रभाव ने उत्तराखंड के गांवों और शहरों में गहरी चिंता पैदा की है। यह स्टोरी इन दोनों मुद्दों के बीच चल रही जंग को उजागर करती है, जिसमें स्थानीय समुदाय, सरकार और सामाजिक संगठन अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

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शिक्षा: उत्तराखंड का मजबूत आधार !

उत्तराखंड शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की साक्षरता दर 78.82% थी, जो राष्ट्रीय औसत 74.04% से अधिक थी। देहरादून, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे शहरों में कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान हैं, जैसे दून स्कूल, वेल्हम गर्ल्स स्कूल, और कुमाऊं विश्वविद्यालय। हाल के वर्षों में, निजी संस्थानों जैसे देहरादून प्रौद्योगिकी संस्थान और रुद्रपुर के सरस्वती प्रबन्धन एवँ प्रौद्योगिकी संस्थान ने तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा को बढ़ावा दिया है।

राज्य सरकार ने भी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड-डे मील’ जैसी योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की पहुंच बढ़ाई है। लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में स्कूलों तक पहुंच, शिक्षकों की कमी, और गरीबी के कारण बच्चों का ड्रॉपआउट रेट शिक्षा के रास्ते में बाधा बन रहा है। खासकर, शराब की लत ने कई परिवारों की आर्थिक स्थिति को इतना कमजोर कर दिया है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

शराब: एक सामाजिक अभिशाप !

उत्तराखंड में शराब की लत एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है। 2022 में आए फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, उत्तराखंड में 32.1% पुरुष शराब का सेवन करते हैं, जो उत्तर भारत के राज्यों में सबसे अधिक है। यह आंकड़ा न केवल पुरुषों तक सीमित है, बल्कि शराब की उपलब्धता और सामाजिक स्वीकार्यता ने युवाओं को भी प्रभावित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं, शराब की लत ने कई परिवारों को आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह कर दिया है।

शराब की लत का सबसे बड़ा प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा की एक ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, शराब के कारण घरेलू हिंसा में वृद्धि हुई है, और कई बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई क्योंकि उनके माता-पिता शराब पर सारा पैसा खर्च कर देते हैं। उदाहरण के लिए, चौरसू गांव की एक महिला ने बताया कि उनके पति की शराब की लत ने परिवार को आर्थिक तंगी में डाल दिया, जिससे उनके बच्चों की स्कूल फीस तक नहीं भरी जा सकी।

उत्तराखंड में शराब का प्रवेश !

रोचक बात यह है कि 1800 के दशक से पहले उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र शराब से पूरी तरह मुक्त थे। अंग्रेजों के आगमन के साथ हिल स्टेशनों का विकास हुआ और शराब की उपलब्धता बढ़ी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुफ्त शराब स्टॉलों के जरिए पहाड़ी समुदायों को शराब का स्वाद चखाया गया, जिसने धीरे-धीरे एक बड़ा बाजार बना लिया। आज, शराब की दुकानें और बार उत्तराखंड के कई हिस्सों में आम हो गए हैं, जिसके खिलाफ स्थानीय समुदाय लगातार विरोध कर रहे हैं।

जंग का मैदान: सामुदायिक और सरकारी प्रयास !

उत्तराखंड में शराब के खिलाफ जंग कोई नई बात नहीं है। ऐतिहासिक रूप से, 1871 में अल्मोड़ा अखबार ने मद्यनिषेध (शराब बंदी) जैसे सामाजिक मुद्दों को उठाया था। आज भी, स्थानीय संगठन और महिला समूह शराब की दुकानों को बंद करने की मांग कर रहे हैं। हाल ही में, रामनगर में महिला एकता मंच के नेतृत्व में महिलाओं ने शराब की दुकान घेरकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया, जिसमें उनकी मांग थी कि “जनता को नशा नहीं, इलाज दो।”

सरकार की ओर से भी कुछ कदम उठाए गए हैं। 2021 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने हरिद्वार और ऋषिकेश में शराब की दुकानों पर रोक लगाने की घोषणा की थी, जिसे साधु-संतों और स्थानीय लोगों ने सराहा। हालांकि, कई लोग मानते हैं कि सरकार की नीतियां दोहरी हैं, क्योंकि एक ओर शराब पर रोक की बात होती है, वहीं दूसरी ओर नई शराब दुकानों को लाइसेंस दिए जा रहे हैं।

शिक्षा और शराब का आपसी संबंध !

शराब की लत और शिक्षा के बीच एक गहरा नकारात्मक संबंध है। शराब के कारण परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब होने से बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां स्कूल पहले ही कम हैं, शराब की लत ने ड्रॉपआउट दर को और बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, शिक्षा को बढ़ावा देकर शराब की लत को कम करने की कोशिश की जा रही है। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए बच्चों और युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है।

क्या है आगे की राह ?

  • उत्तराखंड में शिक्षा और शराब की जंग एक जटिल सामाजिक मुद्दा है, जिसके समाधान के लिए सामुदायिक भागीदारी, सरकारी इच्छाशक्ति, और दीर्घकालिक नीतियों की जरूरत है। कुछ संभावित कदम हो सकते हैं:
  • शराब पर सख्त नियंत्रण: शराब की दुकानों की संख्या और उनके स्थान पर नियंत्रण, साथ ही अवैध शराब तस्करी पर रोक।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार: पहाड़ी क्षेत्रों में स्कूलों की संख्या बढ़ाना और शिक्षकों की नियुक्ति।
  • जागरूकता अभियान: स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में नशामुक्ति के लिए जागरूकता कार्यक्रम।
  • महिलाओं का सशक्तिकरण: महिला समूहों को शराब के खिलाफ आंदोलन में और समर्थन देना।

युवाओं को सशक्त बनाने का रास्ता !

उत्तराखंड में शिक्षा और शराब के बीच की जंग केवल दो मुद्दों का टकराव नहीं है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाने की लड़ाई है। एक ओर जहां शिक्षा उत्तराखंड के युवाओं को सशक्त बनाने का रास्ता है, वहीं शराब की लत इस प्रगति को कमजोर कर रही है। स्थानीय समुदायों का विरोध, सरकार के प्रयास, और शिक्षा के जरिए जागरूकता इस जंग में महत्वपूर्ण हथियार हैं। अगर ये प्रयास सही दिशा में जारी रहे, तो उत्तराखंड न केवल नशामुक्त हो सकता है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी एक मिसाल बन सकता है।

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