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ऑपरेशन सिंदूर: सर्वदलीय डेलिगशन से बढ़ी ‘सियासी टेंशन’..एकता की जगह विवाद की सुर्खियां !

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 21, 2025
in राष्ट्रीय, विशेष
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all party delegation for operation sindoor
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स्पेशल डेस्क/ नई दिल्ली: ऑपरेशन सिन्दूर, जो 7 मई 2025 को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों पर सटीक एयर स्ट्राइक के रूप में शुरू हुआ था, पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे। इस ऑपरेशन की सफलता के बाद, भारत सरकार ने वैश्विक मंच पर पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को उजागर करने और भारत के “जीरो टॉलरेंस” रुख को स्पष्ट करने के लिए सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को 33 देशों में भेजने का फैसला किया।

इन प्रतिनिधिमंडलों में सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के सांसद शामिल हैं, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों और अन्य प्रमुख साझेदार देशों का दौरा करेंगे। हालांकि, इन प्रतिनिधिमंडलों के सदस्यों के चयन को लेकर तीव्र राजनीतिक विवाद छिड़ गया है, खासकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसे विपक्षी दलों के बीच। आइए इस विवाद का विशेष विश्लेषण एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते है।

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कांग्रेस के सुझाए नामों की अनदेखी ?

केंद्र सरकार ने सभी दलों से प्रतिनिधिमंडल के लिए नाम मांगे थे। कांग्रेस ने चार सांसदों—आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, सैयद नासिर हुसैन, और अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नाम सुझाए थे। लेकिन सरकार ने इनमें से केवल आनंद शर्मा को चुना और चार अन्य कांग्रेस सांसद शशि थरूर, मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद, और अमर सिंह को शामिल किया, जो कांग्रेस की सूची में नहीं थे। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे “सरकार की निष्ठाहीनता” और “सस्ता राजनीतिक खेल” करार दिया, यह आरोप लगाते हुए कि सरकार ने चयन प्रक्रिया को राजनीतिक रंग दिया। कांग्रेस ने यह भी कहा कि वह राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानती है और अपने सांसदों को प्रतिनिधिमंडल में भाग लेने से नहीं रोक रही, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।

शशि थरूर का चयन और विवाद !

सरकार ने शशि थरूर को एक प्रतिनिधिमंडल का नेता नियुक्त किया, जो अमेरिका, पनामा, गुयाना, कोलंबिया, और ब्राजील का दौरा करेगा। कांग्रेस ने दावा किया कि थरूर का नाम उनकी सूची में नहीं था, और इसे सरकार की “शरारती मंशा” का हिस्सा बताया। कांग्रेस नेता उदित राज ने कटाक्ष करते हुए कहा कि “शशि थरूर कांग्रेस में हैं या बीजेपी में, यह समझना मुश्किल हो गया है।” हालांकि, थरूर ने कहा कि वह इस निमंत्रण से सम्मानित महसूस करते हैं और भारत का पक्ष मजबूती से रखेंगे।

TMC का प्रतिनिधिमंडल से बाहर होना

तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सरकार पर आरोप लगाया कि उनके सांसद यूसुफ पठान को बिना पार्टी की सहमति के प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया। टीएमसी अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार को विपक्षी दलों से परामर्श करना चाहिए था, और उनकी पार्टी को नाम सुझाने का कोई औपचारिक अनुरोध नहीं मिला। इसके चलते टीएमसी ने यूसुफ पठान को प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया और इस मिशन से खुद को अलग कर लिया।

समाजवादी पार्टी की अनदेखी ?

समाजवादी पार्टी (सपा), जो लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है, को प्रतिनिधिमंडल में कोई स्थान नहीं मिला। सपा समर्थकों ने इसे संसदीय गरिमा और निष्पक्षता के खिलाफ बताया, यह सवाल उठाते हुए कि ऑपरेशन सिन्दूर जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सभी प्रमुख दलों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं हुआ।

क्या है अन्य दलों की प्रतिक्रिया ?

जेडी(यू), डीएमके, एनसीपी (एसपी), और शिवसेना जैसे दलों के सांसदों को भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया है, और इनमें से कुछ ने सरकार के फैसले का समर्थन किया है। उदाहरण के लिए, जेडी(यू) के संजय झा और डीएमके की कनिमोझी अपने-अपने समूहों का नेतृत्व कर रहे हैं। बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद, अनुराग ठाकुर, और बैजयंत पांडा भी विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व कर रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं, जैसे मनीष तिवारी, ने सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए देशभक्ति का संदेश दिया। तिवारी ने एक देशभक्ति गीत साझा कर कहा कि देश की पुकार का जवाब देना चाहिए।

सेना का राजनीतिकरण !

मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि “सेना प्रधानमंत्री के चरणों में नतमस्तक है,” ने भी विवाद को हवा दी। कांग्रेस ने इसे सेना का अपमान और राजनीतिकरण बताया। वहीं मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार और बीजेपी पहलगाम पीड़िताओं के “सिंदूर की रक्षा” कर पाई। उन्होंने सेना को और स्वतंत्रता देने की मांग की।

सर्वदलीय बैठक की मांग

कांग्रेस ने 22 अप्रैल से सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, लेकिन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया।जयराम रमेश ने कहा कि सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाने से भी इनकार किया, जिससे विपक्ष को लगता है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर पारदर्शिता नहीं दिखा रही।

बीजेपी ने क्या दिया जवाब ?

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि “जब राष्ट्र हित की बात आती है, तो भारत एकजुट होता है।” उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया। बीजेपी ने विपक्ष पर ऑपरेशन सिन्दूर को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया, यह दावा करते हुए कि विपक्ष राष्ट्रीय हितों के बजाय सियासी हितों को प्राथमिकता दे रहा है।

22 मई 2025 से अपनी यात्रा शुरू करेंगे !

ये प्रतिनिधिमंडल ऑपरेशन सिन्दूर की आवश्यकता और पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थन को उजागर करेंगे। यह ऑपरेशन पहलगाम हमले के जवाब में था, जिसमें 9 आतंकी ठिकाने नष्ट किए गए। सात प्रतिनिधिमंडलों में कुल 59 सांसद शामिल हैं, जिनमें 31 एनडीए से और 20 गैर-एनडीए दलों से हैं। प्रमुख नेताओं में रविशंकर प्रसाद (यूके, फ्रांस, जर्मनी), शशि थरूर (अमेरिका, ब्राजील), कनिमोझी (रूस), और सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी) शामिल हैं। ये दल 22 मई 2025 से अपनी यात्रा शुरू करेंगे और 10 दिनों तक विभिन्न देशों में भारत का पक्ष रखेंगे।

राष्ट्रीय हितों के लिए प्रतिनिधिमंडल

कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि वह राष्ट्रीय हितों के लिए प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनेगी, लेकिन सरकार की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना जारी रखेगी। टीएमसी के बाहर होने से विपक्षी इंडिया ब्लॉक में दरार की बात सामने आ रही है, जिसे बीजेपी ने विपक्ष की अंदरूनी कमजोरी के रूप में पेश किया। समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाने की बात कही है। सरकार ने जोर दिया कि यह कूटनीतिक कदम भारत की एकजुटता और आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख को दर्शाता है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस ऑपरेशन का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।

राष्ट्रीय एकता का संदेश देने का प्रयास

ऑपरेशन सिन्दूर पर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का गठन राष्ट्रीय एकता का संदेश देने का प्रयास था, लेकिन सदस्यों के चयन ने इसे सियासी विवाद का केंद्र बना दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने सरकार पर पक्षपात और एकतरफा फैसले लेने का आरोप लगाया, जबकि बीजेपी ने इसे विपक्ष की संकीर्ण सोच बताया। इस बीच, समाजवादी पार्टी जैसे अन्य दलों की अनदेखी ने विवाद को और जटिल कर दिया। यह स्थिति राष्ट्रीय हितों और राजनीतिक हितों के बीच टकराव को उजागर करती है, जो आने वाले दिनों में और तीव्र हो सकता है।

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