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Home राजनीति

बिहार: लड़ाई सिर्फ नेताओं की नहीं, उनकी पहचान की भी!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
September 17, 2025
in राजनीति, राज्य
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पटना. बिहार में बीजेपी के अंदर ‘ओरिजिनल’ और ‘इम्पोर्टेड’ नेताओं का विवाद तेज होता जा रहा है. पार्टी के भीतर आम धारणा यह बन गई है कि 2024 लोकसभा चुनावों में बाहरी नेताओं की वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. अब, संघ और मूल कैडर के प्रतिनिधि इस मुद्दे को जोर देकर उठा रहे हैं. ये बिहार बीजेपी के लिए ‘मूल विचारधारा’ और ‘स्थानीय नेतृत्व’ की बात करते हुए पार्टी में पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी पर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में 2025 विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.

दरअसल, बिहार बीजेपी के अंदर लंबे समय से ‘ओरिजिनल लीडर्स’ और ‘इम्पोर्टेड लीडर्स’ का सवाल गरमाया हुआ है. ‘ओरिजिनल लीडर्स’ वे नेता हैं जो संघ और पार्टी के कोर कैडर से आते हैं. ये पार्टी के पुराने और भरोसेमंद चेहरे माने जाते हैं. इनके विपरीत ‘इम्पोर्टेड लीडर्स’ वे नेता हैं जो अन्य पार्टियों से आए हैं या गैर-स्थानीय उम्मीदवार होते हैं. इन्हें पार्टी में लाने के अपने कारण होते हैं, लेकिन वर्तमान में विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर छिड़ी इस बहस ने बिहार बीजेपी को आंतरिक द्वंद्व में डाल दिया है.

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बता दें कि पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे और बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा जैसे नेता कोर नेताओं की कटेगरी में आते हैं और ये बिहार बीजेपी के ‘ओरिजिनल लीडर्स’ में गिने जाते हैं. ऐसे नेता संघ से जुड़े लंबे समय के कार्यकर्ता हैं और पार्टी की मूल विचारधारा को लेकर उनके स्पष्ट दृष्टिकोण हैं. पिछले कुछ महीनों में इन नेताओं ने खुलेआम उस प्रवृत्ति की आलोचना की है जो बाहरी नेताओं को पार्टी में ज्यादा जगह देने की है. इनका कहना है कि बिहार बीजेपी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं को आगे लाना चाहिए, ताकि पार्टी की नींव मजबूत हो सके.

सम्राट चौधरी और बाहरी नेताओं को लेकर विवाद
बीजेपी बिहार अध्यक्ष सम्राट चौधरी जनता दल (यू) से आए हैं और उनको कई ‘ओरिजिनल’ नेताओं ने ‘आयातित’ नेता बताया है. विजय कुमार सिन्हा समेत कई पुराने कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि पार्टी में बाहरी नेताओं की बढ़ती संख्या से स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर रहा है. ये असंतोष 2024 लोकसभा चुनाव में हार के पीछे एक बड़ी वजह मानी जा रही है.

बिहार बीजेपी में पार्टी के असली संरक्षकों की मांग, ‘ओरिजिनल लीडर्स’ की वापसी पर उठे सवाल, विजय कुमार सिन्हा और संघ ने कोर कैडर मजबूत करने को लेकर प्रयास शुरू किए हैं.

‘बाहरी’ उम्मीदवारों का पार्टी पर नकारात्मक प्रभाव
बता दें कि बीते लोकसभा चुनाव में शाहाबाद क्षेत्र की तीन लोकसभा सीटों पर बीजेपी ने बाहरी उम्मीदवार उतारे थे जो स्थानीय मतदाताओं को रास नहीं आए. मिथिलेश तिवारी, आरके सिंह और शिवेश राम जैसे गैर-स्थानीय चेहरों के कारण बीजेपी को तीनों सीटें हारनी पड़ीं. विपक्ष ने इस ‘बाहरी’ मुद्दे को भुनाया और स्थानीय नेताओं को आगे बढ़ाया. इस हार ने पार्टी के अंदर ‘ओरिजिनल’ नेताओं की आवाज और मजबूत कर दी.

विधानसभा चुनाव पर असर और आगे की रणनीति

पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर छिड़ी बहस आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है. अगर पार्टी ने 2024 की गलतियों से सबक नहीं लिया और बाहरी उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी तो हार की संभावना बढ़ सकती है. हालांकि, बीजेपी अब स्थानीय चेहरों को तवज्जो देने की कोशिश कर रही है. इसी श्रेणी में पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा भी आते है जो हाल में ही बीजेपी में शामिल हुए है. कहा जा रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चल रही रणनीतिक बैठकें भी इसी दिशा में हैं.

‘मूल नेता’ के लिए विक्टिम कार्ड और पार्टी की चुनौती
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा और अन्य ‘ओरिजिनल लीडर्स’ अपने आप को पार्टी के सच्चे वकील मानते हैं जो बाहरी नेताओं के कारण पार्टी के भीतर बढ़ रहे असंतोष और नुकसान के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं. जाहिर है यह एक तरह से ‘विक्टिम कार्ड’ प्ले भी कहा जा सकता है, लेकिन साथ ही यह बीजेपी के अंदरूनी संघर्ष को भी बता रहा है.जाहिर है अगर यह मुद्दा और गर्म हुआ तो आने वाले चुनावों में पार्टी की तस्वीर को प्रभावित कर सकता है.

आयातित नेताओं से घिरी बिहार भाजपा, सम्राट चौधरी और नागमणि जैसे नेताओं को बढ़ावा देने पर बीजेपी के ‘ओरिजिनल लीडर्स’ उठ रहे सवाल.

बिहार बीजेपी के असली चेहरे की वापसी?
बहरहाल, बिहार बीजेपी के लिए यह समय एक चुनौती और अवसर दोनों है. ‘ओरिजिनल लीडर्स’ की मांगें पार्टी की असली ताकत को बता रही हैं, जबकि ‘इम्पोर्टेड’ नेताओं की रणनीति त्वरित विस्तार का जरिया कहा जा रहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे और डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा जैसे पुराने कार्यकर्ताओं की आवाज पार्टी के भविष्य की दिशा तय कर सकती है. 2025 विधानसभा चुनाव से पहले अगर बीजेपी स्थानीय नेतृत्व को महत्व देती है तो वह फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है. ऐसे में कहा जा सकता है कि राजनीति में यह लड़ाई सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि बिहार की जनता और पार्टी की पहचान की भी है.

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