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Home राजनीति

1991 का वो किस्सा… जब नीतीश-लालू दुलारचंद यादव से वोट मांगने ‘टाल’ गए थे!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 3, 2025
in राजनीति, राज्य, विशेष
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


पटना : बिहार की राजनीति में दुलारचंद यादव का नाम बाहुबली नेता के रूप में मशहूर था। वे मोकामा क्षेत्र के प्रभावशाली यादव नेता थे, जिनका असर कई विधानसभा बूथों पर था। हाल ही में 30 अक्टूबर को मोकामा में हुई दो पक्षों के बीच झड़प में उनकी हत्या हो गई, जिसके बाद इलाका सुर्खियों में आ गया। इस घटना के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने फेसबुक पर एक पुराना किस्सा शेयर किया, जो 1991 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है।

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इस किस्से में बताया गया है कि “कैसे तत्कालीन जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दुलारचंद यादव के राजनीतिक प्रभाव का फायदा उठाने उनके पास पहुंचे, लेकिन दुलारचंद ने उन्हें ‘टाल’ दिया। यह घटना दुलारचंद के दबदबे और बिहार की जातिगत-राजनीतिक गतिशीलता को दर्शाती है।

क्या है किस्से की पूरी कहानी

शिवानंद तिवारी ने अपनी पोस्ट में लिखा “पहली मर्तबा 1991 के लोकसभा चुनाव के समय दुलार चंद जी को देखा था। बाढ़ लोकसभा क्षेत्र में बाढ़ के कारण उपचुनाव हो रहा था। जनता दल के उम्मीदवार रामलाल पासवान को हराने के लिए हमलोग बूझपुर प्रखंड के तीन-चार बूथों पर काम कर रहे थे। दुलार चंद जी का वहां बहुत प्रभाव था। नीतीश कुमार उनसे मिलना चाहते थे। उन्होंने लालू जी से कहा, ‘अरे भाई वहां जो तीन चार बूथ है उसको भी प्लग कर दिया जाए।’ लालू जी ने कहा ठीक है।”

दुलारचंद की ‘राजनीतिक ताकत’ का प्रतीक

फिर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ दुलारचंद यादव से मिलने मोकामा पहुंचे। लेकिन दुलारचंद ने उन्हें मिलने के लिए ‘टाल’ दिया। वे न मिले, न ही वोट के समर्थन का कोई वादा किया। तिवारी लिखते हैं कि दुलारचंद का प्रभाव इतना था कि वे किसी के आगे झुकते नहीं थे। अंततः चुनाव में जनता दल को उन बूथों पर मुश्किल हुई, लेकिन दुलारचंद का कद बड़ा हो गया। तिवारी ने इसे दुलारचंद की ‘राजनीतिक ताकत’ का प्रतीक बताया।

1991 का बाढ़ उपचुनाव और दुलारचंद का रोलचुनाव का संदर्भ: 1991 में बिहार के बाढ़ लोकसभा क्षेत्र में बाढ़ प्रभाव से उपचुनाव हुआ। जनता दल (जिसके नेता लालू प्रसाद थे) का उम्मीदवार रामलाल पासवान था। दुलारचंद यादव, जो स्थानीय यादव समुदाय के दबंग नेता थे, के प्रभाव वाले बूझपुर प्रखंड के 3-4 बूथ निर्णायक थे। दुलारचंद का असर न सिर्फ यादवों पर, बल्कि पूरे इलाके पर था।

नीतीश-लालू का प्रयास

उस समय लालू बिहार के मुख्यमंत्री थे, और नीतीश उनके करीबी सहयोगी। दोनों ने दुलारचंद से समर्थन मांगा ताकि बूथों को ‘प्लग’ (कंट्रोल) किया जा सके। लेकिन दुलारचंद ने साफ मना कर दिया, जो उनकी स्वतंत्र छवि को दिखाता है। चुनाव में जनता दल को चुनौती मिली, लेकिन दुलारचंद बाद में लालू के करीब आए। 1991 में ही लालू ने एक रैली में दुलारचंद को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया। हालांकि, बाद में वे आरजेडी के साथ जुड़े और तेजस्वी यादव को समर्थन देते रहे।

दुलारचंद यादव कौन थे? राजनीतिक जीवन

दुलारचंद 1980-90 के दशक के प्रमुख बाहुबली थे। वे कभी विधायक बने, लेकिन उनका प्रभाव मोकामा-बाढ़ क्षेत्र में चुनावी परिणाम तय करता था। वे यादव समाज के प्रतिनिधि के रूप में जाने जाते थे।शुरू में लालू के करीबी रहे, लेकिन बाद में नीतीश के भी समर्थक। वे दोनों को वोट दिलाने में भूमिका निभाते थे, लेकिन कभी किसी एक के अधीन नहीं रहे।

30 अक्टूबर को मोकामा में अनंत सिंह समर्थकों से झड़प में उनकी हत्या हो गई। अनंत सिंह (नीतीश के सहयोगी) पर आरोप लगा, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जमानत मिल गई। यह घटना बिहार चुनाव 2025 से पहले जातिगत तनाव को उभार रही है।

शिवानंद तिवारी का यह किस्सा क्यों महत्वपूर्ण ?

यह किस्सा दिखाता है कि “90 के दशक में बाहुबलियों का चुनावी कद कितना बड़ा था। नीतीश-लालू जैसे बड़े नेता भी स्थानीय प्रभावशाली लोगों के आगे ‘टल’ सकते थे। दुलारचंद की हत्या के बाद तिवारी ने यह पोस्ट शेयर की, जो आरजेडी की रणनीति का हिस्सा लगती है। यह ‘जंगलराज’ के पुराने नैरेटिव को चुनौती देता है, जहां बाहुबली सभी पक्षों के साथ खेलते थे।

क्या है तिवारी की भूमिका !

शिवानंद तिवारी RJD के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। वे लालू-नीतीश के बीच ‘पेंडुलम’ की तरह रहे—कभी जदयू में, कभी RJD में। ऐसे किस्से वे अक्सर शेयर करते हैं, जो बिहार की सियासी स्मृति को ताजा करते हैं। यह किस्सा बिहार की राजनीति की जटिलताओं को उजागर करता है, जहां व्यक्तिगत प्रभाव और जातिगत समीकरण चुनाव तय करते हैं। 2025 के बिहार चुनाव में ऐसे पुराने रिश्ते फिर सुर्खियां बटोर सकते हैं।

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