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चीन के दुश्मन को भारत कस रहा ‘चाबी’… इस महाप्लान से ड्रैगन चारों खाने चित!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 3, 2025
in राष्ट्रीय, विश्व
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नई दिल्ली। पूरी दुनिया इन दिनों एक नए खजाने के पीछे परेशान है। यह खजाना वैसे तो बेहद दुर्लभ है, मगर इसकी चाहत हर देश रखता है। यह इतनी कीमती चीज है, जिसे पाने के लिए कोई भी देश कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। इसके चलते दुनिया में नए-नए भूसामरिक रिश्ते बन रहे हैं और नई रणनीतियां भी बनाई जा रही हैं। ऐसा ही कुछ एक नया रिश्ता पनप रहा है भारत और ताइवान के बीच, जिसे लेकर चीन बहुत तनाव में है। समझते हैं पूरी बात।

ताइवान ने ऐसा क्या प्रस्ताव रखा, जिससे टेंशन में चीन

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दरअसल, english.cw.com पर छपी एक स्टोरी के अनुसार, भारत की राजधानी नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित ताइवान एक्सपो 2025 में ताइवान ने एक खास प्रस्ताव रखा। वह भारत के दुर्लभ खनिजों (rare earth minerals) तक पहुंच चाहता है और बदले में अपनी सेमीकंडक्टर तकनीक भी देना चाहता है। ताइवान एक्सटर्नल ट्रेड डेवलपमेंट काउंसिल (TAITRA) के उप निदेशक केवेन चेंग ने कहा कि ताइवान को अपने उच्च-तकनीकी उद्योगों, जिनमें इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र शामिल हैं, को बढ़ावा देने के लिए भारत से इन चीजों की जरूरत है। वहीं, रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीन की नई पाबंदियां भारत-ताइवान के रिश्तों के आड़े आ रही हैं।

चीन के नए रेयर अर्थ मिनरल्स नियम कब लागू होंगे

चीन के नए रेयर अर्थ मिनरल्स के नियम दो चरणों में लागू होंगे। 8 नवंबर और 1 दिसंबर को। यह चीन द्वारा अप्रैल में खनन और प्रसंस्कृत दुर्लभ मृदा खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के मद्देनजर लागू किया गया है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी नए प्रतिबंधों ने दुर्लभ मृदा और स्थायी चुंबक निर्यात पर अपने प्रतिबंधों का विस्तार किया है। ये प्रतिबंध वैश्विक रक्षा निर्माण उद्योग को सीधे प्रभावित करते हैं और चीनी वाणिज्य मंत्रालय के बयान के अनुसार, चीन इस मुद्दे पर बहुपक्षीय और द्विपक्षीय निर्यात नियंत्रण वार्ता के लिए तैयार है।

चीन का चुंबकीय तत्वों पर है कब्जा

दुर्लभ मृदा खनिजों की महत्ता और इसके खनन एवं प्रसंस्करण में चीन का वैश्विक प्रभुत्व इन वार्ताओं में चीन के लिए एक बढ़त का संकेत देता है, जिससे सभी के लिए भू-राजनीतिक स्थिति बन जाती है। चीन वैश्विक दुर्लभ मृदा खनन का लगभग 70 प्रतिशत और इसके वैश्विक प्रसंस्करण का 90 प्रतिशत से अधिक प्रबंधन करता है। रेयर अर्थ का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल, स्माटफोन, सेमी कंडक्टर चिप, रॉकेट, मिसाइल और सोलर पैनल बनाने में इस्तेामल किए जाते हैं।

चीन के दबदबे को तोड़ने के लिए यह प्रस्ताव

चीन के साथ करीब 3500 किलोमीटर लंबी अत्यधिक सैन्यीकृत सीमा वाले भारत के लिए ताइवान का यह प्रस्ताव बेहद संवेदनशील हो सकता है। वहीं, ताइवान भी लगातार चीनी आक्रमण के खतरों का सामना कर रहा है। दरअसल, एक्सपर्ट के मुताबिक, भारत और ताइवान की यह साझा बाध्यता भविष्य की सुरक्षा और एक ऐसी चक्रीय अर्थव्यवस्था को डिज़ाइन करने की साझा आवश्यकता को जन्म देती है जो चीनी दुर्लभ मृदा प्रभुत्व को तोड़ सके।

भारत के रेयर अर्थ मिनरल्स में संभावनाएं असीम

convergence-now.com पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 69 लाख मीट्रिक टन रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो इसे ऐसे भंडारों के मामले में दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा देश बनाता है। इसके बावजूद, इन संसाधनों का बड़े पैमाने पर अपर्याप्त उपयोग किया गया है। यदि इनका पूर्ण उपयोग किया जाए, तो ये भारत को इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों, रक्षा प्रणालियों और अन्य उन्नत तकनीकों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण सामग्रियों का एक प्रमुख दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता बना सकते हैं।

ताइवान का भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रवेश

ताइवान, जो वर्तमान में दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत सेमीकंडक्टर का उत्पादन करता है। भारत में भारी निवेश करके अपनी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करना चाहता है। चेंग ने घोषणा की कि पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन (PSMC) अगले साल की शुरुआत में भारत में चिप्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने के लिए टाटा समूह के साथ सहयोग करेगा। ताइवान की कंपनियाँ भारत में सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला का विस्तार करने की योजना बना रही हैं, क्योंकि वे इसके विशाल बाज़ार, प्रचुर प्रतिभा और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति से आकर्षित हैं।

ताइवान चुंबक के लिए चीन पर ज्यादा डिपेंड नहीं

रिपोर्ट में कहा गया है कि एक तरह से, ताइवान के चिप उद्योग पर इन प्रतिबंधों का प्रभाव कम हो सकता है क्योंकि ताइवान का दुर्लभ मृदा (रेयर अर्थ) आयात अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है। यह कुल वैश्विक आयात का केवल 2.49 प्रतिशत है और इनमें से अधिकांश सीधे चीन से आयात नहीं किए जाते हैं। हालांकि, ग्लोबल ताइवान इंस्टीट्यूट के लिए अलायना बोन की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, यह छोटा सा हिस्सा ताइवान की आर्थिक सुरक्षा के लिए रणनीतिक है क्योंकि ताइवान के सबसे सफल विनिर्माण उद्योग इसी पर निर्भर हैं। दुर्लभ मृदा तत्व ताइवान के अर्धचालक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव डालने वाली कोई भी चीज ताइवान के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित होगी।

ताइवान भारतीय रेयर अर्थ क्यों चाहेगा?

ताइवान अपने बढ़ते घरेलू उद्योग के लिए और बढ़ते वैश्विक बाजkर में अपना प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए अपनी रेयर अर्थ आपूर्ति को सुरक्षित रखना चाहेगा। इसके लिए भविष्योन्मुखी निवेश की आवश्यकता होगी। यहीं पर भारतीय रेयर अर्थ ताइवान के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

ताइवान कर सकता है भारत में खनन

भारत ताइवान के लिए ये दोनों कार्य कर सकता है – रेयर अर्थ में ताइवान के निवेश के लिए भारत एक उपयुक्त आधार हो सकता है, जबकि भारत चीन के साथ बातचीत की मेज पर एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकता है। ताइवान इस पर गहरी नजर रख रहा है। उसके पास निवेश के लिए पर्याप्त धन है, जबकि भारत के पास दुर्लभ मृदा खनिजों का पाँचवाँ सबसे बड़ा भंडार है, लेकिन वैश्विक खनन में उसका योगदान केवल एक प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि निवेश की और अधिक आवश्यकता है और भविष्य में विकास की अपार संभावनाएं हैं।

भारत ने बनाई है यह योजना

चीन द्वारा दुर्लभ मृदा खनिजों पर लगाए गए प्रतिबंधों के जवाब में भारत एक राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज भंडार बना रहा है। भारतीय पहल दो महीने का भंडार बनाना चाहती है और इसमें निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित कर रही है। यह कार्यक्रम भारत की रणनीतिक कमजोरियों को दूर करता है और दुर्लभ मृदा खनिजों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के भारत के प्रयासों का पूरक है। ताइवान के पास दुर्लभ मृदा खनिजों का कोई महत्वपूर्ण भंडार नहीं है और भारत का 8.52 मिलियन टन भंडार उसके लिए भी एक अवसर हो सकता है।

 

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