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Home राष्ट्रीय

स्वदेशी ड्रोन की रेस में कैसे किस्मत आजमा रहीं विदेशी कंपनियां!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 4, 2025
in राष्ट्रीय
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attacker drone
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नई दिल्ली। भारतीय सशस्त्र सेना को जासूसी और हमलावर मिशन के लिए स्वदेश में डिजाइन और विकसित लॉन्ग-रेंज के ड्रोन चाहिए। लेकिन, हालात को देखते हुए लगता नहीं कि पूर्ण रूप से आत्मनिर्भरता वाली इस इच्छा शक्ति को इतनी जल्दी धरातल पर उतारना संभव है। सशस्त्र सेना 87 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन खरीदना चाहती है। यह ₹30,000 करोड़ का ऑर्डर है। इस ऑर्डर को समय पर पूरा करने में सहयोग देने के लिए विदेशी कंपनियां भी अपनी किस्मत आजमाने में जुट चुकी हैं। उन्हें पता है कि यह सौदा उनके लिए सीधे रास्ते मुमकिन नहीं है, इसलिए वह भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करने की पूरजोर कोशिशें कर रही हैं।

स्वदेशी लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन निर्माण की तैयारी

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ET की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सशस्त्र सेना के लिए 87 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन सौदे के लिए भारतीय कंपनियों के लिए मंगलवार को टेंडर जारी किए जा सकते हैं। सरकार चाहती है कि देश में ही अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAE) निर्माण के लिए एक इकोसिस्टम विकसित हो, इसके लिए यह टेंडर सिर्फ भारतीय कंपनियों के लिए ही जारी करने जा रही है। इस तरह के ड्रोन की खासियत है कि यह 30 घंटे तक लगातार अपनी सेवाएं दे सकते हैं।

स्वदेशी ड्रोन बनाने में विदेशी सहयोग का ऑफर

विदेशी कंपनियों को अंदाजा है कि यह सौदा उनके लिए सीधे करना मुमकिन नहीं है। इसलिए वह भारतीय कंपनियों को MALE ड्रोन बनाने में मदद के लिए समझौते करने में जुटी हैं। इस रेस में इजरायली कंपनी एल्बिट (Elbit) और अमेरिका की जेनरल एटोमिक्स (General Atomics) जैसी कंपनियां भी लगी हुई हैं। ये कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल हो रहे ड्रोन को भारत की जरूरतों के हिसाब से मॉडिफाई करके बनाने की पेशकश कर सकती हैं। इसके तहत भारतीय कंपनियां ही मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाएंगी और कोशिश होगी कि ऐसे ड्रोन में लगने वाले 50% से अधिक कल-पु्र्जे और उपकरण भारत में ही बने हों।

पूर्ण स्वदेशी ड्रोन बनाने के लिए समय का अभाव

आइडिया ये है कि इसकी ट्रायल के लिए जिस तरह से सिर्फ 6 महीने का समय मिलने वाला है, अगर कोई स्वदेशी कंपनी पूरी तरह से देश में डिजाइन और विकसित ड्रोन नहीं बना पाईं तो ऐसी कंपनियों को मौका मिल सकता है, तो उन कपंनियों को मौका मिल सकता है, जो विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर भारतीय सशस्त्र सेना की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों।

दो भारतीय कंपनियों को मिल सकता है ठेका

खबरों के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने जो फैसला लिया है, उसके तहत इस बड़े सौदे का ठेका दो कंपनियों को दिया जाएगा। 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का यह ऑर्डर सबसे कम बोली लगाने वाली दो कंपनियों को दिया जाएगा। यह ठेका 64:36 के अनुपात में होगा। इसके अनुसार सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को इसका बड़ा हिस्सा मिलेगा। इसके पीछे सोच यह है कि भविष्य में भारत के पास लंबी दूरी के ड्रोन बनाने के दो अलग-अलग स्वदेशी प्लांट उपलब्ध हों। इससे आवश्यकता पड़ने पर कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा ड्रोन बनाए जा सकेंगे। टेंडर हासिल करने वाली कंपनियों को ड्रोन के मेंटेनेंस के लिए भी 10 साल का ठेका मिलेगा।

ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी निर्माण की कोशिश

यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि कंपनियां इस तरह से काम करें कि ड्रोन का बाहरी ढांचा (aerostructures) और इसके मुख्य हिस्से भारत में ही बनाए जाएं। यहां तक इंजन भी भारत में ही असेंबल हो। इसके अलावा इलेक्ट्रो ऑप्टिकल पेलोड (कैमरे और सेंसर) और सैटेलाइट कम्युनिकेशन के हिस्से भी भारत में बने होने चाहिए। सप्लाई चेन मजबूत रखने के लिए इसे आवश्यक माना जा रहा है। सेना के इस्तेमाल की वजह से सुरक्षा के लिए लिहाज से भी इसकी अहमियत बढ़ जाती है। यही नहीं ड्रोन बनाने वाली कंपनियों को नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम भी स्वदेशी ही इस्तेमाल करने पड़ेंगे।

पूर्ण आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अभी दूर!

विदेशी कंपनियों की वजह से भारतीय कंपनियों को नई तकनीक सीखने का मौका तो मिलेगा, लेकिन जब तक हम खुद ही इन ड्रोन को डिजाइन और विकसित नहीं कर पाए तो आत्मनिर्भरता आंशिक ही रह जाएगी। उम्मीद यही की जा सकती है कि धीरे-धीरे भारतीय कंपनियां पूर्ण आत्मनिर्भरता के लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी।

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