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US सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप के खिलाफ क्या है टैरिफ केस?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 5, 2025
in विश्व, व्यापार
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donald trump
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नई दिल्ली। देशों की नीतियां अक्सर स्थिर रहती हैं। संबंधों को आगे बढ़ाने का आधार भी यही नीतियां बनती हैं। किसी देश की आर्थिक नीति यदि स्थिर नहीं रहे तो उसके साथ व्यापार करना मुश्किल होता है। इससे कई तरह की व्यावहारिक और सैद्धांतिक दिक्कतें आने लगती हैं। दरअसल, यहां बात टैरिफ पर अमेरिकी नीति को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते अप्रैल में दुनिया के तमाम सारे देशों पर जिस तरह से ‘मनमाना’ टैरिफ लगाया उससे पूरी दुनिया परेशान है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि टैरिफ को लेकर ट्रंप किसी एक नीति का पालन नहीं कर रहे हैं। किसी देश पर 10 प्रतिशत, किसी पर 25, किसी पर 50 और चीन जैसे देश पर दो सौ से ज्यादा प्रतिशत टैरिफ लगाते हैं। यही नहीं, वह अपनी टैरिफ की बात से पलटे भी हैं। इससे देश अमेरिका पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि आज जो टैरिफ है, वह कल रहेगा या उस पर अतिरिक्त टैरिफ लग जाएगा। इसे लेकर दुनिया पशोपेश में है।

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ट्रंप ने टैरिफ क्यों लगाया?

अपने चुनाव अभियान में ट्रंप ने अमेरिका को फिर से महान बनाने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) का वादा किया था। वह ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। अपने देश के हित के बारे में सोचना, फैसला करना कोई गलत बात नहीं है। हर देश अपने हित में फैसले लेता है लेकिन केवल वही ‘महान’ बने, बाकी देशों का ‘नुकसान’ हो, ऐसा नहीं चल सकता। टैरिफ का इस्तेमाल ‘हथियार’ की तरह करने वाले ट्रंप यह भूल जाते हैं कि डराने, धमकाने और हड़काने की नीति हमेशा कारगर नहीं होती।

दुनिया में भारत, चीन जैसे तमाम स्वाभिमानी देश हैं जो टैरिफ की उनकी एकतरफा नीति को स्वीकार नहीं किए हैं। दूसरा, उन्होंने वादा किया था कि टैरिफ लगाने से ‘मेक इन अमेरिका’ होगा। स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार मिलेगा और अमेरिका अमीर होगा लेकिन अब तक कई रिपोर्टें आ चुकी हैं जिनमें दावा किया गया है कि टैरिफ का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर फिलहाल सकारात्मक असर नहीं पड़ा है, बल्कि महंगाई अलग से बढ़ गई।

टैरिफ पर ट्रंप के फैसलों को छोटी कंपनियों ने दी है चुनौती

सवाल है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति टैरिफ पर इस तरह के ‘मनमाना’ फैसले कर सकते हैं। यानी सुबह कुछ और शाम में कुछ और और अगले कुछ दिन और। टैरिफ पर ट्रंप के फैसलों को छोटी कंपनियों और राज्यों के एक समूह ने चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ पर दो अलग-अलग केस दायर हुए हैं। चुनौती देने वाली कंपनियों का कहना है कि इन फैसलों का आखिर आधार क्या है? क्या टैरिफ लगाने के लिए ट्रंप ने अपने प्रशासन के साथ कोई आधिकारिक बैठक की, टैरिफ लगाने के लिए किसी समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया गया? आखिर वे कौन से आधार हैं जिन पर ट्रंप ने टैरिफ की दर घोषित की।

जाहिर है कि ये सवाल अगर सुप्रीम कोर्ट पूछेगा तो ट्रंप प्रशासन को टैरिफ लगाने वाले फैसले को सही ठहराने के लिए ठोस एवं वैध आधार देने होंगे। सुप्रीम कोर्ट को ट्रंप के फैसले में यदि कोई तार्किकता एवं वैधानिकता नहीं दिखती तो वह टैरिफ पर उनके फैसले को पलट भी सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह ट्रंप के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। देशों पर टैरिफ लगाने वाले ट्रंप के फैसले को कोर्ट यदि पलट देता है तो यह भी हो सकता है कि टैरिफ के जरिए ट्रंप प्रशासन ने जो अरबों डॉलर कमाए हैं, उनमें से कुछ हिस्से को लौटाना भी पड़ सकता है।

कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि जजों का फैसला क्या होगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन अगर फैसला ट्रंप के पक्ष में जाता है, तो यह उन्हें और भविष्य के सभी राष्ट्रपति पद धारकों को और अधिक शक्तिशाली बना देगा। विशेष रूप से, यह मामला उन टैरिफ (आयात शुल्कों) से संबंधित है जो ट्रंप प्रशासन ने 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) का उपयोग करते हुए लगाए थे। व्हाइट हाउस ने इस कानून को इसकी गति और लचीलापन के कारण अपनाया। इस कानून के तहत आपातकाल घोषित कर, राष्ट्रपति तुरंत आदेश जारी कर सकते हैं और लंबे व स्थापित प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सकते हैं।

कानून में टैरिफ शब्द का जिक्र नहीं-विरोधी

ट्रंप ने पहली बार इस कानून का उपयोग फरवरी में किया था, जब उन्होंने चीन, मेक्सिको और कनाडा से आने वाले सामानों पर कर लगाया, यह कहते हुए कि उन देशों से होने वाली ड्रग तस्करी एक आपात स्थिति है। उन्होंने इसे दोबारा अप्रैल में लागू किया, और लगभग हर देश से आने वाले माल पर 10% से 50% तक शुल्क लगाने का आदेश दिया। इस बार उन्होंने कहा कि अमेरिका का व्यापार घाटा यानी जब अमेरिका जितना निर्यात करता है, उससे ज्यादा आयात करता है एक ‘असाधारण और असामान्य खतरा’ है।

विरोधियों का कहना है कि यह कानून राष्ट्रपति को व्यापार नियंत्रित करने का अधिकार देता है, लेकिन इसमें कहीं भी ‘टैरिफ’ शब्द का उल्लेख नहीं है। उनका तर्क है कि संविधान के तहत केवल कांग्रेस ही कर लगाने का अधिकार रखती है। उन्होंने यह भी चुनौती दी है कि व्हाइट हाउस द्वारा बताए गए मुद्दे, खासकर व्यापार घाटा, वास्तव में आपात स्थिति हैं या नहीं।

दोनों दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) के सदस्यों ने यह दावा किया है कि संविधान उन्हें टैरिफ, शुल्क और कर बनाने की जिम्मेदारी देता है। कांग्रेस के दोनों सदनों के 200 से अधिक डेमोक्रेट्स और एक रिपब्लिकन, सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की, ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने तर्क दिया कि आपातकालीन कानून राष्ट्रपति को व्यापार वार्ता में दबाव बनाने के लिए टैरिफ का उपयोग करने का अधिकार नहीं देता।

टैरिफ के खिलाफ नील कत्याल लड़ेंगे केस

भारतवंशी नील कत्याल अमेरिका के सबसे प्रमुख संवैधानिक वकीलों में से एक हैं। उन्होंने देश के सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक मामलों की पैरवी की है। 55 वर्षीय कत्याल अल्पसंख्यक वकीलों में सबसे अधिक सुप्रीम कोर्ट में पेश होने का रिकॉर्ड रखते हैं। कत्याल पहली बार सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने बुश बनाम गोर मामले में पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर के सह-वकील के रूप में काम किया था। इसके बाद उन्होंने काफी ऊंचाइयां हासिल कीं। उन्होंने ओबामा प्रशासन में प्रधान उप सॉलिसिटर जनरल और बाद में कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल के रूप में सेवा दी। इस पद पर वे संघीय सरकार का प्रतिनिधित्व सुप्रीम कोर्ट और अपील अदालतों में करते थे।

सुप्रीम कोर्ट में केस पर ट्रंप ने क्या कहा?

यह मामला राष्ट्रपति ट्रंप के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। रविवार को ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट में उन्होंने लिखा, ‘अगर हम जीतते हैं, तो हम दुनिया का सबसे अमीर और सबसे सुरक्षित देश बनेंगे और अगर हम हारते हैं, तो हमारा देश लगभग तीसरी दुनिया की स्थिति में जा सकता है। भगवान से प्रार्थना करें कि ऐसा न हो।’ ट्रंप ने यह भी कहा कि वे अदालत में उपस्थित नहीं होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ‘मैं बुधवार को अदालत नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं इस फैसले के महत्व से ध्यान भटकाना नहीं चाहता।’

कब आएगा इस मामले में फैसला?

टैरिफ के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने एक एकीकृत सुनवाई में शामिल कर लिया है। इसका फैसला अगले साल की शुरुआत में आने की उम्मीद है। अगर फैसला राष्ट्रपति के खिलाफ जाता है, तो यह ट्रंप के वैश्विक व्यापार युद्ध को रोक सकता है और अमेरिका की व्यापार और आर्थिक नीतियों को पुनः आकार दे सकता है।

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