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Home राष्ट्रीय

कई देशों पर मंदी की मार, भारत ने कैसे कर दिया कमाल?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 30, 2025
in राष्ट्रीय, व्यापार
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नई दिल्ली। दुनिया के प्रमुख देश आर्थिक मंदी की मार से जूझ रहे हैं। अमेरिका में ट्रंप की नई टैरिफ नीतियों ने महंगाई को भड़का दिया है, यूरोप की अर्थव्यवस्था ठहराव की कगार पर है और चीन की विकास दर नीचे लुढ़क रही है। वैश्विक विकास दर 2025 में 2.3% तक गिरने का अनुमान है, जो 2008 की मंदी के बाद का सबसे कमजोर दौर हो सकता है। लेकिन इसी तूफान के बीच भारत एक अलग ही रंग दिखा रहा है। जुलाई-सितंबर तिमाही (Q2 FY26) में GDP ग्रोथ 8.2% पर पहुंच गई। यह छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है। इसने पूर्वानुमानों (7.2%) को भी पीछे छोड़ दिया है। आइए, इस बंपर ग्रोथ की असली कहानी समझते हैं।

वैश्विक मंदी का खतरा

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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में वैश्विक GDP ग्रोथ 3.2% रहने का अनुमान है, जो 2024 के 3.3% से भी कम है। कारण? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने टैरिफ की बाढ़ ला दी। उन्होंने भारत और ब्राजील जैसे बड़े देशों पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाया है। इससे अमेरिकी विकास दर 1.8% पर सिमट गई, और मंदी की संभावना 40% तक पहुंच गई।

यूरोप में तो हाल और बुरा है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था (-0.2%) ऊर्जा संकट और कमजोर निर्यात की वजह से लगातार दूसरे साल सिकुड़ रही है। चीन की ग्रोथ 4% के आसपास ठहर गई, रियल एस्टेट संकट और कमजोर घरेलू मांग से जूझ रही है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) की रिपोर्ट कहती है कि व्यापारिक अनिश्चितता ऐतिहासिक उच्च स्तर पर है, जिससे वैश्विक व्यापार 2025 में 40% गिर सकता है।

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के 2025 के जीडीपी विकास अनुमान चिंताजनक हैं, जहां अमेरिका की विकास दर टैरिफ नीतियों से प्रेरित महंगाई और मंदी के खतरे के कारण 2% पर सिमटने का अनुमान है। चीन की अर्थव्यवस्था रियल एस्टेट संकट और कमजोर निर्यात के बोझ तले 4.8% की दर से बढ़ेगी, जबकि यूरोपीय संघ ऊर्जा संकट और आर्थिक ठहराव की चुनौतियों से जूझते हुए मात्र 1.2% का विकास दर्ज करेगा।

जापान जनसंख्या संकुचन और निवेश की कमी के कारण 0.9% पर रुकेगा और वैश्विक औसत 3.2% रहने की संभावना है, जो व्यापार युद्धों तथा अनिश्चितताओं से प्रभावित होकर 2008 के बाद का सबसे कमजोर दौर साबित हो सकता है। ये अनुमान आईएमएफ की नवीनतम रिपोर्ट पर आधारित हैं, जो दर्शाते हैं कि वैश्विक सहयोग की कमी से विकास की गति धीमी पड़ रही है।

भारत का ‘कमाल’: 8.2% ग्रोथ का जादू कैसे हुआ?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के अनुसार, Q2 FY26 में रीयल GDP ग्रोथ 8.2% रही, जबकि GVA (ग्रॉस वैल्यू एडेड) 8.1% रहा। जुलाई-सितंबर तिमाही की यह वृद्धि दर पिछली छह तिमाहियों में सबसे अधिक है। इससे पहले उच्चतम वृद्धि 8.4 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2023-24 की जनवरी-मार्च तिमाही में दर्ज की गई थी। इस तीव्र वृद्धि ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में बरकरार रखा है।

इसी दौरान चीन की अर्थव्यवस्था 4.8 प्रतिशत बढ़ी है। इसके साथ वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में भारत की अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी है। पिछले साल की समान अवधि में इसकी वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत रही थी। पहली छमाही के बेहतर प्रदर्शन के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष के वृद्धि लक्ष्य से भी आगे निकल सकती है। जनवरी में पेश आर्थिक समीक्षा में इसके में 6.3-6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया था। लेकिन सवाल वही: वैश्विक तूफान में यह चमत्कार कैसे?

ग्रामीण मांग का सुपरचार्ज: भारत की 40% उपभोग मांग ग्रामीण इलाकों से आती है। अच्छे माॉनसून (2025 में 106% औसत वर्षा) ने खेती को बूस्ट दिया- खाद्यान्न उत्पादन 5% बढ़ा। नतीजा? ट्रैक्टर बिक्री अक्टूबर में 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंची और दो-पहिया वाहनों की ग्रामीण बिक्री 51.8% उछली। न्यूल्सनआईक्यू के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण FMCG बिक्री 12% बढ़ी। यह ‘बॉटम-अप’ ग्रोथ है। यानी किसान अमीर, तो बाजार चमकदार।

सरकारी खर्च का इंजन: केंद्र सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स) बजट का 24.5% Q1 में ही खर्च हो गया, जो पिछले साल के 16.3% से दोगुना है। हाईवे, रेलवे, और बंदरगाहों पर निवेश ने निर्माण क्षेत्र को 7% ग्रोथ दी। IMF कहता है कि इसी इंफ्रास्ट्रक्चर पुश ने नौकरियां पैदा कीं और आय बढ़ाईं।

विनिर्माण का उभार: मैन्युफैक्चरिंग PMI अक्टूबर में 59.2 पर पहुंचा- 57.5 से ऊपर था। ‘मेक इन इंडिया’ और PLI स्कीम्स ने स्मार्टफोन, ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को उकसाया। उत्पादन और नए ऑर्डर में तेजी आई, भले ही US टैरिफ्स का साया हो। निर्यात 6.3% बढ़ा।

सेवाओं का डिजिटल जादू: IT और कंसल्टिंग निर्यात 10% GDP का योगदान दे रहे हैं। डिजिटल इंडिया ने UPI ट्रांजेक्शन को 50% बूस्ट दिया। सेवाओं की ग्रोथ दोगुनी (10% से ऊपर) रही, जो वैश्विक मंदी में भी मजबूत बनी।

सेवा क्षेत्र का भी प्रदर्शन काफी अच्छा रहा

आंकड़ों के मुताबिक, विनिर्माण क्षेत्र ने पिछली तिमाही में 9.1 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दिखाई जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 2.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी। इस दौरान सेवा क्षेत्र का भी प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। बैंकिंग, रियल एस्टेट और अन्य सेवाओं में 10.2 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई जो एक साल पहले 7.2 प्रतिशत थी। हालांकि दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। कृषि क्षेत्र का उत्पादन गिरकर 3.5 प्रतिशत रहा जो एक साल पहले की समान अवधि में 4.1 प्रतिशत था।

दूसरी तिमाही में स्थिर कीमतों पर जीडीपी 48.63 लाख करोड़ रुपये और मौजूदा बाजार मूल्य पर जीडीपी 85.25 लाख करोड़ रुपये रही। इसके साथ पहली छमाही में स्थिर कीमतों पर जीडीपी आठ प्रतिशत बढ़कर 96.52 लाख करोड़ रुपये और मौजूदा बाजार मूल्य पर जीडीपी 8.8 प्रतिशत बढ़कर 171.30 लाख करोड़ रुपये रहा। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इन आंकड़ों पर कहा कि मौजूदा रफ्तार को देखते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के इस वित्त वर्ष में चार लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो जाने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 20224-25 के अंत में जीडीपी का आकार 3.9 लाख करोड़ डॉलर था।

वृद्धि दर उम्मीदों से अधिक रही

वास्तविक निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) ने 7.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। सकल स्थायी पूंजी निर्माण 7.3 प्रतिशत बढ़ा। दूसरी तिमाही में जीडीपी के अनुमान में उपयोग की गई विभिन्न गणना पद्धतियों के बीच अंतर 1.62 लाख करोड़ रुपये का रहा। रेटिंग एजेंसी इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा कि सितंबर तिमाही की वृद्धि दर उम्मीदों से अधिक रही है। इससे दिसंबर 2025 की मौद्रिक नीति समीक्षा में दर कटौती की संभावना कम हो गई है।

हालांकि नायर ने कहा, “अमेरिका की तरफ से लगाए गए उच्च शुल्क और केंद्र सरकार की सीमित पूंजीगत व्यय की गुंजाइश को देखते हुए वृद्धि की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि सात प्रतिशत से अधिक रहने की ही संभावना है।” डेलॉयट की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा कि जीएसटी सुधार और त्योहारी खरीद तीसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियों को गति देंगे और पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर के अनुमान में महत्वपूर्ण सुधार हो सकता है।

आंकड़ों के आकलन की नई पद्धति लागू की जा रही

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा कि जीडीपी गणना के लिए 2011-12 के बजाय 2022-23 को नया आधार वर्ष स्वीकार किए जाने के बाद अर्थव्यवस्था की बेहतर तस्वीर सामने आ पाएगी लेकिन इससे मौजूदा अनुमानों से थोड़ा विचलन भी हो सकता है। दरअसल सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय आर्थिक आंकड़ों की गणना के लिए 2022-23 को नए आधार वर्ष के रूप में संशोधित करने की तैयारी में है।

मंत्रालय ने कहा कि तिमाही जीडीपी के प्रारंभिक अनुमानों में आगे चलकर संशोधन किए जाएंगे, क्योंकि मौजूदा एवं स्थिर कीमतों पर आंकड़ों के आकलन की नई पद्धति लागू की जा रही है। बयान के मुताबिक, नई शृंखला के आधार पर अगली तिमाही के जीडीपी आंकड़े 27 फरवरी, 2026 को जारी किए जाएंगे।

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