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Home राष्ट्रीय

क्यों हो रहा है भारतीय रुपए का अवमूल्यन!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 6, 2025
in राष्ट्रीय, विशेष, व्यापार
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india economy
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prahlad sabnaniप्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली। माह जनवरी 2025 में भारतीय रुपए का अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य 85.79 रुपया प्रति अमेरिकी डॉलर था। 3 दिसम्बर 2025 को रुपए का बाजार मूल्य लगभग 5 प्रतिशत घटकर 90.19 रुपया प्रति डॉलर हो गया। पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए का बाजार मूल्य लगातार गिर रहा है और हाल ही के समय में रुपए के बाजार मूल्य में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। जबकि, वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में भारत की आर्थिक विकास दर पिछली 8 तिमाहियों में सबसे अधिक रिकार्ड 8.2 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ी है तथा खुदरा मुद्रा स्फीति की दर 0.25 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई है। भारत में वृहद अर्थव्यवस्था के विभिन्न मानदंडो के मजबूत बने रहने के बावजूद एशियाई देशों के बीच भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में सबसे तेज गति से गिरी है।

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दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए की कीमत में गिरावट के मुख्य कारण वैश्विक स्तर पर आर्थिक जगत में घट रही कुछ घटनाओं में छुपे हुए हैं, अन्यथा भारतीय अर्थव्यवस्था तो मजबूत स्थिति में बनी हुई है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका में विभिन्न उत्पादों के होने वाले आयात पर टैरिफ की दरों में वृद्धि किए जाने से वैश्विक स्तर पर विदेश व्यापार में लगातार दबाव बना हुआ है। भारत से अमेरिका को होने वाले उत्पादों के निर्यात पर तो 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया गया है, जिसके चलते भारत से कुछ उत्पादों यथा, रेडीमेड गारमेंट्स, कृषि उत्पाद, लेदर उत्पाद, समुद्री जीवों का उत्पाद, जेम्स एवं ज्वेलरी आदि के अमेरिका को होने वाले निर्यात विपरीत रूप से प्रभावित हो रहे हैं एवं इससे भारत को अमेरिकी डॉलर का अंतरप्रवाह कम हो रहा है और व्यापार घाटे में वृद्धि दर्ज हो रही है।

पिछली तिमाही के दौरान भारत के कुल आयात 18,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रहे हैं जबकि निर्यात केवल 10,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रहे। इस प्रकार, 8,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का व्यापार घाटा दर्ज हुआ है। अक्टोबर 2025 माह में भी भारत का विदेशी व्यापार घाटा 4,100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर के ऊपर रहा है। यह, भारत के लिए अच्छी खबर नहीं कही जा सकती है। इससे, भारत में चूंकि अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ रही है अतः भारतीय रुपए के मूल्य पर दबाव बढ़ रहा है।

दूसरे, विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार में पूर्व में किए गए अपने निवेश पर लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से एवं अपने निवेश को तेजी से उभर रहे अन्य देशों के शेयर बाजार में अपने निवेश को बढ़ाने के उद्देश्य से, पिछले कुछ समय से, भारतीय पूंजी बाजार से लगातार अपने निवेश को निकाल रहे हैं। वर्ष 2025 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1.48 लाख करोड़ रुपए (1,640 करोड़ अमेरिकी डॉलर) मूल्य की निकासी की है।

विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से की जा रही निवेश की निकासे के चलते भी भारतीय रुपए पर दबाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, क्योंकि वे भारत में अमेरिकी डॉलर में किए गए अपने निवेश को अमेरिकी डॉलर में ही निकाल रहे हैं और इससे अमेरिकी डॉलर की कीमत (मांग) बढ़ रही है तथा रुपए की कीमत गिर रही है।

वैसे तो सामान्यतः अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी देश द्वारा अपनी मुद्रा के मजबूत बने रहने की कामना की जाती है क्योंकि इससे मुद्रा बाजार में स्थिरता बनी रहती है एवं विदेशी निवेशक अमेरिकी डॉलर में अपना निवेश बढ़ाने पर विचार पक्का करते हैं। परंतु, इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यदि किसी देश की मुद्रा का अवमूल्यन होने लगता है तो उस देश में आयात होने वाले उत्पादों की कीमत महंगी हो जाती है। परंतु, इससे देश के निर्यातकों को जरूर लाभ होता है क्योंकि अमेरिकी डॉलर के एवज में उन्हें अधिक स्थानीय मुद्रा की प्राप्ति होती है। इस सिद्धांत के अनुसार ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूपए की कीमत के गिरने से भारत द्वारा अन्य देशों से किए जाने वाले विभिन्न उत्पादों के आयातित उत्पाद भारतीय बाजारों में भी महंगे हो सकते हैं इस प्रकार अन्य देशों से मुद्रा स्फीति का आयात भारत में होने लग सकता है।

उदाहरण के लिए भारत द्वारा कच्चे तेल के आयात की कीमत, भारतीय रुपए के अवमूल्यन के चलते, यदि बढ़ जाती है तो इससे भारत में मुद्रा स्फीति की दर भी बढ़ जाएगी क्योंकि भारत में अब कच्चे तेल का आयात उंची दरों पर हो रहा होगा। इसके ठीक विपरीत, भारत के निर्यातकों को अपने विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर अमेरिकी डॉलर के एवज में अधिक रुपए की प्राप्ति होने लगेगी, इससे उन्हें अधिक लाभ होने की सम्भावना बढ़ जाएगा।

इन परिस्थितियों के बीच, सामान्यतः भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भारतीय रुपए के मूल्य में तेज गति से हो रहे अवमूल्यन को रोकने की दृष्टि से अमेरिकी डॉलर की बाजार में उपलब्धता बढ़ाते हुए मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया जाता है। मध्य सितम्बर 2025 की अवधि तक भारतीय रिजर्व बैंक ने 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर बाजार में उपलब्ध कराए थे। परंतु, हाल ही के समय में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस संबंध में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर विदेशी व्यापार में निर्मित हुई अस्थिरता की स्थिति से भारतीय निर्यातकों को बचाने की दृष्टि से भी भारतीय रुपए का अवमूल्यन होने दिया जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए के हो रहे अवमूल्यन के भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले विपरीत प्रभाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के उद्देश्य से भारत के पास 68,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर का मजबूत विदेश मुद्रा भंडार उपलब्ध है। भारतीय रिजर्व बैंक जब भी चाहे इस विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करते हुए भारतीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की उपलब्धता को बढ़ा सकता है। परंतु, यदि लम्बी अवधि की दृष्टि से देखा जाय तो भारत को विभिन्न उत्पादों के आयात घटाकर, विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि करते हुए अपने विदेशी व्यापार घाटे पर नियंत्रण स्थापित करना होगा।

भारत में मुख्य रूप से कच्चा तेल एवं स्वर्ण का सबसे अधिक आयात किया जाता है। कच्चे तेल के आयात को कम करने हेतु एवं अपनी ऊर्जा की लगातार बढ़ती जरूरतों को पूरा करने हेतु भारत को नवीकरणीय ऊर्जा (ग्रीन ऊर्जा) के उत्पादन को बढ़ाना ही होगा। केंद्र सरकार इस संदर्भ में बहुत प्रयास कर रही है एवं अपनी ऊर्जा की जरूरतों को, विंड पावर एवं सौर ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि करते हुए, पूरा करने के प्रयास कर रही है। इसमें बहुत अच्छी सफलता भी मिलती हुई दिखाई दे रही है।

इसी प्रकार, स्वर्ण के उत्पादन को भारत में ही बढ़ाकर इसके आयात को किस प्रकार कम किया जा सकता है, इस विषय पर भी गम्भीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। साथ ही, भारत विभिन्न उत्पादों की लागत को कम कर देश में निर्मित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बना सकता है। इसके लिए, भारत में ही कच्चे माल के उत्पादन को बढ़ाना आवश्यक होगा, ताकि कच्चे माल के आयात को कम किया जा सके। ब्याज दरों को कम करते हुए पूंजी की लागत को कम करना होगा।

भारतीय रिजर्व बैंक ने दिनांक 5 दिसम्बर 2025 को घोषित अपनी मुद्रा नीति (मोनेटरी पॉलिसी) में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की कमी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत से घटाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, दिनांक 21 नवम्बर 2025 से भारत में चार श्रम संहिताओं (वेतन संहिता 2019, औद्योगिक सम्बंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 एवं व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता, 2020) को लागू कर दिया गया है। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत में पूर्व में लागू 29 श्रम कानूनों को आसान और कारगर बनाए जाने का प्रशंसनीय प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किया गया है।

उक्त चार श्रम संहिताओं का लागू किया जाना भारत के श्रमबल के लिए उचित वेतन, श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, उनकी रक्षा एवं उनके बेहतर कल्याण के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की शुरुआत भी माना जा रहा है। इससे भारत में मजबूत उद्योग की नींव रखी जाकर रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित किए जा सकेंगे। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत के श्रमिकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयास भी किया जाएगा एवं उनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा जो अंततः भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगा। चार श्रम संहिताओं को लागू करने के बाद भारतीय श्रमिकों की उत्पादकता में वृद्धि दर्ज होगी जिससे भारत में विभिन्न उत्पादों की उत्पादन लागत कम होकर इनके वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनने की सम्भावना प्रबल होगी।

भारत के विदेशी मुद्रा भुगतान संतुलन को उचित स्तर पर बनाए रखने के लिए देश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा भी दिया जाना चाहिए। जिससे, विदेशी पर्यटक भारत में धार्मिक पर्यटन के लिए आकर्षित हों एवं भारत को विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़े। केंद्र सरकार देश में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से विभिन्न मंदिरों के आसपास मूलभूत/आधारभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने की ओर विशेष ध्यान दे रही है। अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर का निर्माण कर पूरे अयोध्या नगर में आधारभूत सुविधाओं की दृष्टि से आमूलचूल परिवर्तन किए गए हैं। इसी प्रकार, वाराणसी, माता वैष्णोदेवी मंदिर, उज्जैन, प्रयागराज, गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ आदि नगरों में आधुनिक सुख सुविधाओं से युक्त मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। जिससे इन नगरों में श्रद्धालुओं (विदेशी पर्यटकों सहित) की संख्या में अपार वृद्धि दृष्टिगोचर है।

कुल मिलाकर कभी कभी वैश्विक परिस्थितियों बीच कई देश अपनी मुद्रा का अवमूल्यन होने देते हैं और यह कदम अंततः लम्बी अवधि में देश हित में ही माना जाता है।

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