नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना अपनी बढ़ती रणनीतिक जरूरतों और लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी को देखते हुए एक और बड़ी खरीद की तैयारी में है। भारतीय वायुसेना की लड़ाकू विमानों की संख्या लगातार कम हो रही है। इसी कमी को पूरा करने और देश की हवाई ताकत बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार अब बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है।इस प्रस्ताव के तहत फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदे जाने हैं। इसके अलावा, रूस के पांचवीं पीढ़ी के सुखोई-57 लड़ाकू विमान को भारतीय वायुसेना में शामिल करने को लेकर भी बातचीत चल रही है।
इस रिपोर्ट का इंतजार
इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को अब भी रूस से उस रिपोर्ट का इंतजार है जिसमें भारत में सुखोई-57 विमानों को बनाने में खर्च का आंकलन किया गया है। सुखोई-57 को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। यह रिपोर्ट इसी माह एचएएल को मिलने की संभावना है। फिलहाल इस विमान को भारतीय वायुसेना में शामिल करने पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। उम्मीद है कि HAL को इस महीने के अंत तक रूस की ओर से यह रिपोर्ट मिल जाएगी। इस रिपोर्ट में यह बताया जाएगा कि भारत में इस प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए कितना खर्च आएगा और इसके लिए किस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी।
भारत को से ही अनुभव
भारत को पहले से ही सुखोई लड़ाकू विमान बनाने का अच्छा अनुभव है। साल 2000 में रूस के साथ हुए एक समझौते के तहत भारत में 250 से ज्यादा सुखोई-30MKI बनाए गए थे। ये चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। इन्हें बनाने के लिए जो फैक्ट्रियां, मशीनें और तकनीकी व्यवस्था बनी थी, वह आज भी काफी हद तक मौजूद है। हाल ही में रूस की एक तकनीकी टीम भारत आई थी। इस टीम ने यहां की मौजूदा सुविधाओं का जायजा लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी टीम ने भारतीय अधिकारियों को बताया कि सुखोई-57 बनाने के लिए जरूरी करीब 50 प्रतिशत इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में पहले से ही तैयार है। अब सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) उसी रिपोर्ट का इंतजार कर रही है, ताकि आगे का फैसला लिया जा सके।
फिलहाल हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के नासिक डिवीजन में सुखोई-30MKI की फाइनल असेंबली लाइन काम कर रही है। वहीं, ओडिशा के कोरापुट में स्थित HAL की यूनिट में इसके AL-31FP टर्बोफैन इंजन का लाइसेंस के तहत उत्पादन किया जाता है। इसके अलावा, एवियोनिक्स और दूसरे अहम पुर्जे केरल में HAL की अलग-अलग यूनिट्स में बनाए जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सुखोई-57 को भारत में बनाने से जुड़ा क्षमता और लागत का आकलन HAL की पहल पर किया जा रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह आखिरकार किस पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को चुनेगी। यानि फिलहाल तैयारी और अध्ययन का काम चल रहा है, लेकिन अंतिम फैसला सरकार की ओर से आना बाकी है।
भारत के पास हैं दो ऑपशन
भारत इस समय 4.5-जेनरेशन के राफेल लड़ाकू विमानों के जरिए अपनी वायुसेना को मजबूत कर रहा है। लेकिन जब बात पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट की आती है, तो विकल्प बहुत कम हैं। दुनिया में फिलहाल सिर्फ दो ही ऐसे पांचवीं पीढ़ी के फाइटर उपलब्ध हैं, जिन्हें दूसरे देशों की वायुसेनाएं शामिल कर सकती हैं। इनमें अमेरिका का F-35 और रूस का सुखोई-57 शामिल है। चीन के पास भी अपना पांचवीं पीढ़ी का फाइटर J-20 है, लेकिन यह भारत के लिए उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, दुनिया का कोई और देश इस श्रेणी में अपना स्वदेशी फाइटर जेट इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
भारत खुद भी अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाने पर काम कर रहा है। यह प्रोजेक्ट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के तहत चल रहा है। हालांकि, इस विमान को पूरी तरह तैयार होकर सेवा में आने में अभी समय लगेगा।







