नई दिल्ली: अमेरिका चीन की काट तलाशने में जुटा है। डोनाल्ड ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने सहयोगी देशों के बीच एक खास क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक बनाने का प्रस्ताव रखा है। वॉशिंगटन में एक हाई-लेवल मिनिस्टीरियल मीटिंग के दौरान अनाउंस हुई इस पहल का मकसद चीन पर ग्लोबल डिपेंडेंस को कम करना है। चीन का रेयर अर्थ एलिमेंट्स और दूसरे स्ट्रेटेजिक मिनरल्स पर दबदबा है। यह अमेरिका और उसके पार्टनर्स की कमजोरी बन रहा है।
यह प्रस्ताव माइनिंग, रिफाइनिंग या प्रोसेसिंग कैपेबिलिटी वाले देशों के एक ग्रुप में प्राइसिंग मैकेनिज्म, ट्रेड रूल्स और सप्लाई चेन इन्वेस्टमेंट को कोऑर्डिनेट करने की कोशिश करता है। भारत इसमें एक खास पार्टिसिपेंट के तौर पर उभरा है। वह मीटिंग में मौजूद 50 से ज्यादा देशों में से एक था। खासकर इसलिए क्योंकि नई दिल्ली अपने घरेलू रेयर अर्थ और सेमीकंडक्टर एम्बिशन को तेज कर रहा है।
अब क्रिटिकल मिनरल्स प्रायोरिटी क्यों हैं?
रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, निकल और कोबाल्ट जैसे क्रिटिकल मिनरल्स मॉडर्न इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजिकल सिस्टम की रीढ़ हैं। ये सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक गाड़ियों, एडवांस्ड वेपन सिस्टम, स्मार्टफोन, रिन्यूएबल एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर और एयरोस्पेस इक्विपमेंट बनाने के लिए जरूरी हैं। हालांकि, ये मटीरियल दुनिया के कई हिस्सों से निकाले जाते हैं। लेकिन, चीन ने कई दशकों में इसमें एक बड़ी जगह बनाई है। कुछ मिनरल के लिए ग्लोबल माइनिंग के ज्यादातर हिस्से और प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग कैपेसिटी के उससे भी बड़े हिस्से को कंट्रोल किया है।
इस कंसंट्रेशन ने बार-बार ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावट डाली है। हाल के सालों में बीजिंग ने एक्सपोर्ट कंट्रोल और रेयर अर्थ पर रेगुलेटरी पाबंदियों का इस्तेमाल एक स्ट्रेटेजिक लीवर के तौर पर किया है। इसने अमेरिका और यूरोप में इंडस्ट्रियल आउटपुट पर असर डाला है। ऑटोमोबाइल प्लांट में प्रोडक्शन में देरी और कुछ समय के लिए बंद होने से यह पता चला कि वेस्टर्न मैन्युफैक्चरिंग कितनी गहराई तक चीन के कंट्रोल वाले इनपुट पर निर्भर है।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि स्केल और सरकार के सपोर्ट वाले प्रोडक्शन के जरिए कीमतों को दबाने की चीन की काबिलियत ने दूसरे सप्लायर के लिए कॉम्पिटिटिव बने रहना मुश्किल बना दिया है। इससे दूसरी जगहों पर माइनिंग और प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। बुधवार को वाशिंगटन में आए मंत्रियों के एक ग्रुप को एड्रेस करते हुए अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने नए प्रपोजल को इन गड़बड़ियों को ठीक करने के तरीके के तौर पर बताया। वेंस ने कहा, ‘हम उस प्रॉब्लम को खत्म करना चाहते हैं जिसमें लोग हमारे मार्केट में सस्ते जरूरी मिनरल्स लाकर हमारे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को कम कीमत पर बेचते हैं।’
यह ट्रेड ब्लॉक कैसा है?
प्लान के मूल में एक कोऑर्डिनेटेड ट्रेडिंग जोन का आइडिया है। इसमें शामिल देश जरूरी मिनरल्स के लिए शेयर्ड प्राइसिंग और ट्रेड मैकेनिज्म पर सहमत होते हैं। यह ब्लॉक प्रोडक्शन चेन में अलग-अलग पॉइंट्स पर एक्सट्रैक्शन से लेकर प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग तक बेंचमार्क प्राइस तय करेगा। वेंस ने बताया, ‘हम प्रोडक्शन के हर स्टेज पर जरूरी मिनरल्स के लिए रेफरेंस प्राइस तय करेंगे। प्रेफरेंशियल जोन के सदस्यों के लिए ये रेफरेंस प्राइस एक फ्लोर के तौर पर काम करेंगे। इसे एडजस्टेबल टैरिफ के जरिए बनाए रखा जाएगा ताकि प्राइसिंग इंटीग्रिटी बनी रहे।’
इस मॉडल के तहत, ब्लॉक के अंदर कीमतों को तय लिमिट से नीचे गिरने से रोकने के लिए टैरिफ को एक साथ एडजस्ट किया जाएगा। इसका मकसद न केवल घरेलू प्रोड्यूसर्स को सस्ती सप्लाई से कम कीमत पर बेचने से बचाना है, बल्कि ऐसे अनुमानित रिटर्न भी देना है जो माइनिंग और प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर में लंबे समय के प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा दे सकें। यह प्रपोजल मार्केट में दखल देने की वाशिंगटन की इच्छा को काफी बढ़ाता है।
हाल के सालों में ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने पहले ही कई मिनरल कंपनियों में इक्विटी स्टेक ले लिए हैं। दूसरे सेक्टर में प्राइसिंग अरेंजमेंट पर बातचीत की है। स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्री को स्टेबल करने के लिए पब्लिक फंड का इस्तेमाल किया है।
कौन से देश बातचीत में शामिल?
यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो के मुताबिक, मिनिस्टीरियल मीटिंग में 55 देशों के रिप्रेजेंटेटिव शामिल हुए। इसमें शामिल होने वालों में वे देश शामिल थे जिनके पास पहले से मौजूद माइनिंग सेक्टर, एडवांस्ड प्रोसेसिंग कैपेबिलिटी या जरूरी मिनरल के स्ट्रेटेजिक रिजर्व हैं। इसमें शामिल देशों में भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो थे। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे कुछ देश कच्चे माल के बड़े एक्सपोर्टर हैं। जबकि जापान और जर्मनी जैसे दूसरे देश डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी में अहम भूमिका निभाते हैं।
रुबियो ने कहा कि सप्लाई का कंसंट्रेशन एक स्ट्रेटेजिक लायबिलिटी बन गया है। उन्होंने कहा कि मिनरल एक ही देश के हाथों में बहुत ज्यादा कंसंट्रेटेड थे। यह इम्बैलेंस जियोपॉलिटिक्स में लेवरेज का टूल बन गया था। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे अमेरिका के बड़े सहयोगी बातचीत में शामिल हुए। हालांकि, ग्रीनलैंड और डेनमार्क नहीं आए। जबकि आर्कटिक आइलैंड में मिनरल की दौलत बहुत ज्यादा है।
अमेरिका के इंटीरियर सेक्रेटरी डग बर्गम ने कहा कि कुछ ही दिनों में क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेड क्लब में 11 और देशों का नाम शामिल किया जाएगा। 20 और देशों ने इसमें शामिल होने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। मीटिंग के दौरान अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने पहले से चल रहे ठोस कदमों के बारे में बताया। इनमें मेक्सिको के साथ एक द्विपक्षीय पहल और यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान को शामिल करते हुए एक त्रिपक्षीय ढांचा शामिल था। इसका मकसद सप्लाई चेन को मजबूत करना और महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित व्यापार नीतियों में तालमेल बिठाना था।
भारत कहां खड़ा है?
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वाशिंगटन में शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसे अमेरिका की अपनी यात्रा का मुख्य मकसद बताया। मीटिंग के बाद मीडिया से बातचीत में जयशंकर ने कहा, ‘चर्चा बहुत अच्छी रही। क्रिटिकल मिनरल्स बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। अमेरिका कुछ सालों से पार्टनर रहा है।’
जयशंकर ने मंत्रिस्तरीय सत्र को भी संबोधित किया। उन्होंने वैश्विक सप्लाई चेन में अत्यधिक कॉन्संट्रेशन के खतरों पर प्रकाश डाला। जोखिम को कम करने के लिए सामूहिक एक्शन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाले संसाधनों तक स्थिर पहुंच सुनिश्चित करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया।
भारत की भागीदारी का समय महत्वपूर्ण है। कुछ ही दिन पहले नई दिल्ली और वाशिंगटन ने एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है। इसने भारतीय आयात पर अमेरिकी टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया है।
भारत क्रिटिकल मिनरल सेक्टर को कैसे बढ़ा रहा है?
2026-27 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महत्वपूर्ण खनिज पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की। संसद में अपना लगातार नौवां बजट पेश करते हुए सीतारमण ने घोषणा की कि सरकार खनिज समृद्ध राज्यों – ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु – को डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर को विकसित करने में सहायता करेगी। ये राज्य अपने खनिज भंडार के लिए जाने जाते हैं। विशेष रूप से तटीय और खनिज बेल्ट क्षेत्रों में और उनके पास पहले से ही बंदरगाह, औद्योगिक क्षेत्र और सहायक बुनियादी ढांचा है।
चीन ने कैसे दी है प्रतिक्रिया?
चीन ने इस सुझाव को खारिज कर दिया है कि उसने ग्लोबल सप्लाई चेन को अस्थिर किया है। वॉशिंगटन बैठक के बारे में सवालों का जवाब देते हुए अमेरिका में चीनी दूतावास ने कहा, ‘चीन ने लंबे समय से महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक औद्योगिक और सप्लाई चेन को सुरक्षित और स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संबंध में सक्रिय प्रयास जारी रखने को तैयार है।’
अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध में हालिया तनाव कम होने के बावजूद रेयर अर्थ पर बीजिंग के निर्यात नियंत्रण ट्रंप के पद संभालने से पहले की तुलना में ज्यादा सख्त हैं।







